Thursday, July 7, 2011

सुखमय जीवन

(पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 128वीं जयंती पर उनकी कहानी 'सुखमय जीवन'... जो साल 1911 में 'भारत मित्र' में शाया हुई थी।) 

(1) 
परीक्षा देने के पीछे और उसका फल निकलने के पहले दिन किस बुरी तरह बीतते हैं, यह उन्हीं को मालूम है, जिन्हें उन्हें गिनने का अनुभव हुआ है। सुबह उठते ही परीक्षा से आज तक कितने दिन गए, यह गिनते हैं और फिर 'कहावती आठ हफ्ते' में कितने दिन घटते हैं, यह गिनते हैं। कभी-कभी उन आठ हफ्तों पर कितने दिन चढ़ गए, यह भी गिनना पड़ता है। खाने बैठे हैं और डाकिये के पैर की आहट आई- कलेजा मुंह को आया। मुहल्ले में तार का चपरासी आया कि हाथ-पांव कांपने लगे। न जागते चैन, न सोते-सुपने में भी यह दिखता है कि परीक्षक साहब आठ हफ्ते की लंबी छुरी लेकर छाती पर बैठे हुए हैं।
मेरा भी बुरा हाल था। एल-एल.बी. का फल अबकी और भी देर से निकलने को था- न मालूम क्या हो गया था, या तो कोई परीक्षक मर गया था, या उसको प्लेग हो गया था। उसके पर्चे किसी दूसरे के पास भेजे जाने को थे। बार-बार यही सोचता था कि प्रश्नपत्रों की जांच किए पीछे सारे परीक्षकों और रजिस्ट्रारों को भले ही प्लेग हो जाए, अभी तो दो हफ्ते माफ करें। नहीं तो परीक्षा के पहले ही उन सबको प्लेग क्यों न हो गया? रात-भर नींद नहीं आई थी, सिर घूम रहा था, अखबार पढ़ने बैठा कि देखता क्या हूं कि लिनोटाइप की मशीन ने चार-पांच पंक्तियां उल्‍टी छाप दी हैं। बस, अब नहीं सहा गया- सोचा कि घर से निकल चलो; बाहर ही कुछ जी बहलेगा। लोहे का घोड़ा उठाया कि चल दिए। 
तीन-चार मील जाने पर शांति मिली। हरे-हरे खेतों की हवा, कहीं पर चिड़ियों की चहचह और कहीं कुओं पर खेतों को सींचते हुए किसानों का सुरीला गाना, कहीं देवदार के पत्तों की सोंधी बास और कहीं उनमें हवा का सीं-सीं करके बजना- सबने मेरे चित्त को परीक्षा के भूत की सवारी से हटा लिया। बाइसिकिल भी गजब की चीज है। न दाना मांगे, न पानी, चलाए जाइए जहां तक पैरों में दम हो। सड़क में कोई था ही नहीं, कहीं-कहीं किसानों के लड़के और गांव के कुत्ते पीछे लग जाते थे। मैंने बाइसिकिल को और भी हवा कर दिया। सोचा कि मेरे घर सितारपुर से पंद्रह मील पर कालानगर है- वहां की मलाई की बरफ अच्छी होती है और वहीं मेरे मित्र रहते हैं, वे कुछ सनकी हैं। कहते हैं कि जिसे पहले देख लेंगे, उससे विवाह करेंगे। उनसे कोई विवाह की चर्चा करता है तो अपने सिद्धांत के मंडन का व्याख्यान देने लग जाते हैं। चलो, उन्हीं से सिर खाली करें।
खयाल-पर-खयाल बंधने लगा। उनके विवाह का इतिहास याद आया। उनके पिता कहते थे कि सेठ गनेशलाल की एकलौती बेटी से अबकी छुट्टियों में तुम्हारा ब्याह कर देंगे। पड़ोसी कहते थे कि सेठजी की लड़की कानी और मोटी है और आठ ही वर्ष की है। पिता कहते थे कि लोग जलकर ऐसी बातें उड़ाते हैं; और लड़की वैसी हो भी तो क्या, सेठजी के कोई लड़का है नहीं; बीस-तीस हजार का गहना देंगे। मित्र महाशय मेरे साथ-साथ डिबेटिंग क्लबों में बाल-विवाह और माता-पिता की जबरदस्ती पर इतने व्याख्यान झाड़ चुके थे कि अब मारे लज्जा के साथियों में मुंह नहीं दिखाते थे। क्योंकि पिताजी के सामने चीं करने की हिम्मत नहीं थी। व्यक्तिगत विचार से साधारण विचार उठने लगे। हिन्दू-समाज ही इतना सड़ा हुआ है कि हमारे उच्च विचार कुछ चल ही नहीं सकते। अकेला चला भाड़ नहीं फोड़ सकता। हमारे सद्विचार एक तरह के पशु हैं, जिनकी बलि माता-पिता की जिद और हठ की वेदी पर चढ़ाई जाती है। ...भारत का उद्धार तब तक नहीं हो सकता-।
 
फिस्‌स्‌स्‌! एकदम अर्श से फर्श पर गिर पड़े। बाइसिकिल की फूंक निकल गई। कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर। पंप साथ नहीं था और नीचे देखा तो जान पड़ा कि गांव के लड़कों ने सड़क पर ही कांटों की बाड़ लगाई है। उन्हें भी दो गालियां दीं पर उससे तो पंक्चर सुधरा नहीं। कहां तो भारत का उद्धार हो रहा था और कहां अब कालानगर तक इस चरखे को खैंच ले जाने की आपत्ति से कोई निस्तार नहीं दिखता। पास के मील के पत्थर पर देखा कि कालानगर यहां से सात मील है। दूसरे पत्थर के आते-आते मैं बेदम हो लिया था। धूप जेठ की, और कंकरीली सड़क, जिसमें लदी हुई बैलगाड़ियों की मार से छह-छह इंच शक्कर की-सी बारीक पिसी हुई सफेद मिट्टी बिछी हुई। काले पेटेंट लेदर के जूतों पर एक-एक इंच सफेद पॉलिश चढ़ गई। लाल मुंह को पोंछते-पोंछते रूमाल भीग गया और मेरा सारा आकार सभ्य विद्वान का-सा नहीं, वरन्‌ सड़क कूटने वाले मजदूर का-सा हो गया। सवारियों के हम लोग इतने गुलाम हो गए कि दो-तीन मील चलते ही छठी का दूध याद आने लगता है! 

(2)  
'बाबूजी, क्या बाइसिकिल में पंक्चर हो गया है?'
एक तो चश्मा, उस पर रेत की तह जमी हुई, उस पर ललाट से टपकती हुई पसीने की बूंदें, गर्मी की चिढ़ और काली रात की-सी लम्बी सड़क- मैंने देखा ही नहीं था कि दोनों ओर क्या है। यह शब्द सुनते ही सिर उठाया, तो देखा कि एक सोलह-सत्रह वर्ष की कन्या सड़क के किनारे खड़ी है।
 
''हां, हवा निकल गई है और पंक्चर भी हो गया है। पंप मेरे पास है नहीं। कालानगर कुछ बहुत दूर तो है ही नहीं- अभी जा पहुंचता हूं।''
अंत का वाक्य मैंने सिर्फ ऐंठ दिखाने के लिए कहा था। मेरा जी जानता था कि पांच मील, पांच सौ मील के-से दिख रहे थे।
 
"इस सूरत से तो आप कालानगर क्या कलकत्ते पहुंच जाएंगे। जरा भीतर चलिए, कुछ जल पीजिए। आपकी जीभ सूखकर तालू से चिपट गई होगी। चाचाजी की बाइसिकिल में पंप है और हमारा नौकर गोविंद पंक्चर सुधारना भी जानता है।''
"नहीं, नहीं- " 
"नहीं, नहीं, क्या, हां, हां!" 
यों कहकर बालिका ने मेरे हाथ से बाइसिकिल छीन ली और सड़क के एक तरफ हो ली। मैं भी उसके पीछे चला। देखा कि एक कंटीली बाड़ से घिरा बगीचा है, जिसमें एक बंगला है। यहीं पर कोई 'चाचाजी' रहते होंगे, परंतु यह बालिका कैसी- 
मैंने चश्मा रूमाल से पोंछा और उसका मुंह देखा। पारसी चाल की एक गुलाबी साड़ी के नीचे चिकने काले बालों से घिरा हुआ उसका मुखमंडल दमकता था और उसकी आंखें मेरी ओर कुछ दया, कुछ हंसी और कुछ विस्मय से देख रही थीं। बस, पाठक! ऐसी आंखें मैंने कभी नहीं देखी थीं। मानो वे मेरे कलेजे को घोलकर पी गईं। एक अद्भुत कोमल, शांत ज्योति उनमें से निकल रही थी। कभी एक तीर में मारा जाना सुना है? कभी एक निगाह में हृदय बेचना पड़ा है? कभी तारामैत्रक और चक्षुमैत्री नाम आए हैं? मैंने एक सेकंड में सोचा और निश्चय कर लिया कि ऐसी सुंदर आंखें त्रिलोकी में न होंगी और यदि किसी स्त्री की आंखों को प्रेम-बुद्धि से कभी देखूंगा तो इन्हीं को।
"आप सितारपुर से आए हैं। आपका नाम क्या है?" 
"मैं जयदेवशरण वर्मा हूं। आपके चाचाजी-" 
"ओ-हो, बाबू जयदेवशरण वर्मा, बी.ए.; जिन्होंने 'सुखमय जीवन' लिखा है! मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हुए! मैंने आपकी पुस्तक पढ़ी है और चाचाजी तो उसकी प्रशंसा बिना किए एक दिन भी नहीं जाने देते। वे आपसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे; बिना भोजन किए आपको न जाने देंगे और आपके ग्रंथ के पढ़ने से हमारा परिवार-सुख कितना बढ़ा है, इस पर कम से कम दो घंटे तक व्याख्यान देंगे।" 
स्त्री के सामने उसके नैहर की बड़ाई कर दें और लेखक के सामने उसके ग्रंथ की। यह प्रिय बनने का अमोघ मंत्र है। जिस साल मैंने बी.ए. पास किया था उस साल कुछ दिन लिखने की धुन उठी थी। लॉ कॉलेज के फर्स्ट ईयर में सेक्शन और कोड की परवाह न करके एक 'सुखमय जीवन' नामक पोथी लिख चुका था। समालोचकों ने आड़े हाथों लिया था और वर्ष-भर में सत्रह प्रतियां बिकी थीं। आज मेरी कदर हुई कि कोई उसका सराहने वाला तो मिला। 
इतने में हम लोग बरामदे में पहुंचे, जहां पर कनटोप पहने, पंजाबी ढंग की दाढ़ी रखे एक अधेड़ महाशय कुर्सी पर बैठे पुस्तक पढ़ रहे थे। बालिक बोली-
"चाचाजी, आज आपके बाबू जयदेवशरण वर्मा बी.ए. को साथ लाई हूं। इनकी बाइसिकिल बेकाम हो गई है। अपने प्रिय ग्रंथकार से मिलाने के लिए कमला को धन्यवाद मत दीजिए, दीजिए उनके पंप भूल आने को!" 
वृद्ध ने जल्दी ही चश्मा उतारा और दोनों हाथ बढ़ाकर मुझसे मिलने के लिए पैर बढ़ाए।
"कमला, जरा अपनी माता को तो बुला ला। आइए बाबू साहब, आइए। मुझे आपसे मिलने की बड़ी उत्कंठा थी। मैं गुलाबराय वर्मा हूं। पहले कमसेरियट में हेड क्लर्क था। अब पेंशन लेकर इस एकांत स्थान में रहता हूं। दो गौ रखता हूं और कमला तथा उसके भाई प्रबोध को पढ़ाता हूं। मैं ब्रह्मसमाजी हूं; मेरे यहां परदा नहीं है। कमला ने हिंदी मिडिल पास कर लिया है। हमारा समय शास्त्रों के पढ़ने में बीतता है। मेरी धर्मपत्नी भोजन बनाती और कपड़े सी लेती है; मैं उपनिषद् और यागवासिष्ठ का तर्जुमा पढ़ा करता हूं। स्कूल में लड़के बिगड़ जाते हैं, प्रबोद को इसीलिए घर पर पढ़ाता हूं।" 
इतना परिचय दे चुकने पर वृद्ध ने श्वास लिया। मुझे इतना ज्ञान हुआ कि कमला के पिता मेरी जाति के ही हैं। जो कुछ उन्होंने कहा था, उसकी ओर मेरे कान नहीं थे- मेरे कान उधर थे, जिधर से माता को लेकर कमला आ रही थी। 
"आपका ग्रंथ बड़ा ही अपूर्व है। दांपत्य सुख चाहने वालों के लिए लाख रुपए से भी अनमोल है। धन्य है आपको! स्त्री को कैसे प्रसन्न रखना, घर में कलह कैसे नहीं होने देना, बाल-बच्चों को क्योंकर सच्चरित्र बनाना, इन सब बातों में आपके उपदेश पर चलने वाला पृथ्वी पर ही स्वर्ग-सुख भोग सकता है। पहले कमला की मां और मेरी कभी-कभी खटपट हो जाया करती थी। उसके खयाल अभी पुराने ढंग के हैं। पर जब से मैं रोज भोजन के पीछे उसे आध घंटे तक आपकी पुस्तक का पाठ सुनाने लगा हूं, तब से हमारा जीवन हिण्डोले की तरह झूलते-झलते बीतता है।" 
मुझे कमला की मां पर दया आई, जिसको वो कूड़ा-करकट रोज़ सुनना पड़ता होगा। मैंने सोचा कि हिंदी के पत्र-संपादकों में यह बूढ़ा क्यों न हुआ? यदि होता तो आज मेरी तूती बोलने लगती। 
"आपको गृहस्थ-जीवन का कितना अनुभव है! आप सब कुछ जानते हैं! भला, इतना ज्ञान कभी पुस्तकों में मिलता है? कमला की मां कहा करती थी कि आप केवल किताबों के कीड़े हैं, सुनी-सुनाई बातें लिख रहे हैं। मैं बार-बार यह कहता था कि इस पुस्तक के लिखने वाले को परिवार का खूब अनुभव है। धन्य है आपकी सहधर्मिणी! आपका और उसका जीवन कितने सुख से बीतता होगा! और जिन बालकों के आप पिता हैं, वे कैसे बड़भागी हैं कि सदा आपकी शिक्षा में रहते हैं; आप जैसे पिता का उदाहरण देखते हैं।" 
कहावत है कि वेश्या अपनी अवस्था कम दिखाना चाहती है और साधु अपनी अवस्था अधिक दिखाना चाहता है। भला, ग्रंथकार का पद इन दोनों में किसके समान है? मेरे मन में आई कि कह दूं कि अभी मेरा पचीसवां वर्ष चल रहा है, कहां का अनुभव और कहां का परिवार? फिर सोचा, ऐसा कहने से ही मैं वृद्ध महाशय की निगाहों से उतर जाऊंगा और कमला की मां सच्ची हो जाएगी कि बिना अनुभव के छोकरे ने गृहस्थ के कर्तव्य-धर्मों पर पुस्तक लिख मारी है। यह सोचकर मैं मुस्करा दिया और ऐसी तरह मुंह बनाने लगा कि वृद्ध समझा कि अवश्य मैं संसार-समुद्र में गोते मारकर नहाया हुआ हूं। 

(3) 
वृद्ध ने उस दिन मुझे जाने नहीं दिया। कमला की माता ने प्रीति के साथ भोजन कराया और कमला ने पान लाकर दिया। न मुझे अब कालानगर की मलाई की बरफ याद रही और न सनकी मित्र की। चाचाजी की बातों में फी सैकड़े सत्तर तो मेरी पुस्तक और उसके रामबाण लाभों की प्रशंसा थी, जिसको सुनते-सुनते मेरे कान दुख गए। फी सैकड़ा पचीस वह मेरी प्रशंसा और मेरे पति-जीवन और पितृ-जीवन की महिमा गा रहे थे। काम की बात बीसवां हिस्सा थी, जिससे मालूम पड़ा कि अभी कमला का विवाह नहीं हुआ, उसे अपनी फूलों की क्यारी को संभालने का बड़ा प्रेम है, वह 'सखी' के नाम से 'महिला-मनोहर' मासिक पत्र में लेख भी दिया करती है। 
सायंकाल को मैं बगीचे में टहलने निकला। देखता क्या हूं कि एक कोने में केले के झाड़ों के नीचे मोतिये और रजनीगंधा की क्यारियां हैं और कमला उनमें पानी दे रही है। मैंने सोचा कि यही समय है। आज मरना है या जीना है। उसको देखते ही मेरे हृदय में प्रेम की अग्नि जल उठी थी और दिन-भर वहां रहने से वह धधकने लग गई थी। दो ही पहर में मैं बालक से युवा हो गया था। अंगरेजी महाकाव्यों में, प्रेममय उपन्यासों में और कोर्स के संस्कृत नाटकों में जहां-जहां प्रेमिका-प्रेमी का वार्तालाप पढ़ा था, वहां-वहां का दृश्य स्मरण करके वहां-वहां के वाक्यों को घोख रहा था, पर यह निश्चय नहीं कर सका कि इतने थोड़े परिचय पर भी बात कैसे करनी चाहिए। अंत को अंगरेजी पढ़ने वाली धृष्टता ने आर्यकुमार की शालीनता पर विजय पाई और चपलता कहिए, बेसमझी कहिए, ढीठपन कहिए, पागलपन कहिए, मैंने दौड़कर कमला का हाथ पकड़ लिया। उसके चेहरे पर सुर्खी दौड़ गई और डोलची उसके हाथ से गिर पड़ी। मैं उसके कान में कहने लगा- 
"आपसे एक बात कहनी है।" 
"क्या? यहां कहने की कौन-सी बात है?" 
"जब से आपको देखा है तब से-" 
"बस, चुप करो। ऐसी धृष्टता!" 
अब मेरा वचन-प्रवाह उमड़ चुका था। मैं स्वयं नहीं जानता था कि मैं क्या कर रहा हूं, पर लगा बकने- "प्यारी कमला, तुम मुझे प्राणों से बढ़कर हो; प्यारी कमला, मुझे अपना भ्रमर बनने दो। मेरा जीवन तुम्हारे बिना मरुस्थल है, उसमें मंदाकिनी बनकर बहो। मेरे जलते हुए हृदय में अमृत की पट्टी बन जाओ। जब से तुम्हें देखा है, मेरा मन मेरे अधीन नहीं है। मैं तब तक शांति न पाऊंगा जब तक तुम-" 
कमला जोर से चीख उठी और बोली- "आपको ऐसी बातें कहते लज्जा नहीं आती? धिक्कार है आपकी शिक्षा को और धिक्कार है आपकी विद्या को! इसी को आपने सभ्यता मान रखा है कि अपरिचित कुमारी से एकांत ढूंढकर ऐसा घृणित प्रस्ताव करें। तुम्हारा यह साहस कैसे हो गया? तुमने मुझे क्या समझ रखा है? 'सुखमय जीवन' का लेखक और ऐसा घृणित चरित्र! चुल्लू-भर पानी में डूब मरो। अपना काला मुंह मत दिखाओ। अभी चाचाजी को बुलाती हूं।" 
मैं सुनता जा रहा था। क्या मैं स्वप्न देख रहा हूं? यह अग्नि-वर्षा मेरे किस अपराध पर? तो भी मैंने हाथ नहीं छोड़ा। कहने लगा,"सुनो कमला, यदि तुम्हारी कृपा हो जाए, तो सुखमय जीवन-" 
"देखा तेरा सुखमय जीवन! आस्तीन के सांप! पापात्मा!! मैंने साहित्य-सेवी जानकर और ऐसे उच्च विचारों का लेखक समझकर तुझे अपने घर में घुसने दिया और तेरा विश्वास और सत्कार किया था। *प्रच्छन्नपापिन्! *वकदाम्भिक! *बिड़ालव्रतिक! मैंने तेरी सारी बातें सुन ली हैं।" चाचाजी आकर लाल-लाल आंखें दिखाते हुए, क्रोध से कांपते हुए कहने लगे- "शैतान, तुझे यहां आकर मायाजाल फैलाने का स्थान मिला। ओफ! मैं तेरी पुस्तक से छला गया। पवित्र जीवन की प्रशंसा में फार्मों के फार्म काले करने वाले, तेरा ऐसा हृदय! कपटी! विष के घड़े-" 
उनका धाराप्रवाह बंद ही नहीं होता था, पर कमला की गालियां और थीं और चाचाजी की और। मैंने भी गुस्से में आकर कहा, "बाबू साहब, जबान संभालकर बोलिए। आपने अपनी कन्या को शिक्षा दी है और सभ्यता सिखाई है, मैंने भी शिक्षा पाई है और कुछ सभ्यता सीखी है। आप धर्म-सुधारक हैं। यदि मैं उसके गुण और रूपों पर आसक्त हो गया, तो अपना पवित्र प्रणय उसे क्यों न बताऊं? पुराने ढर्रे के पिता दुराग्रही होते सुने गए हैं। आपने क्यों सुधार का नाम लजाया है?" 
"तुम सुधार का नाम मत लो। तुम तो पापी हो। 'सुखमय जीवन' के कर्ता होकर-" 
"भाड़ में जाए 'सुखमय जीवन'! उसी के मारे नाकों दम है!! 'सुखमय जीवन' के कर्ता ने क्या शपथ खा ली है कि जनम-भर क्वांरा ही रहे? क्या उसके प्रेमभाव नहीं हो सकता? क्या उसमें हृदय नहीं होता?" 
"हें, जनम-भर क्वांरा?" 
"हें काहे की? मैं तो आपकी पुत्री से निवेदन कर रहा था कि जैसे उसने मेरा हृदय हर लिया है वैसे यदि अपना हाथ मुझे दे तो उसके साथ 'सुखमय जीवन' के उन आदर्शों को प्रत्यक्ष करूं, जो अभी तक मेरी कल्पना में हैं। पीछे हम दोनों आपकी आज्ञा मांगने आते। आप तो पहले ही दुर्वासा बन गए।" 
"तो आपका विवाह नहीं हुआ? आपकी पुस्तक से तो जान पड़ता है कि आप कई वर्षों के गृहस्थ-जीवन का अनुभव रखते हैं। तो कमला की माता ही सच्ची थीं।" 
इतनी बातें हुई थीं, पर न मालूम क्यों मैंने कमला का हाथ नहीं छोड़ा था। इतनी गर्मी के साथ शास्त्रार्थ हो चुका था, परंतु वह हाथ जो क्रोध के कारण लाल हो गया था, मेरे हाथ में ही पकड़ा हुआ था। अब उसमें सात्विक भाव का पसीना आ गया था और कमला ने लज्जा से आंखें नीची कर ली थीं। विवाह के पीछे कमला कहा करती है कि न मालूम विधाता की किस कला से उस समय मैंने तुम्हें झटककर अपना हाथ नहीं खैंच लिया। मैंने कमला के दोनों हाथ खैंचकर अपने हाथों के सम्पुट में ले लिए (और उसने उन्हें हटाया नहीं!) और इस तरह चारों हाथ जोड़कर वृद्ध से कहा- 
"चाचाजी, उस निकम्मी पोथी का नाम मत लीजिए। बेशक, कमला की मां सच्ची हैं। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां अधिक पहचान कर सकती हैं कि कौन अनुभव की बातें कर रहा है और कौन गप्पे हांक रहा है। आपकी आज्ञा हो तो कमला और मैं दोनों सच्चे सुखमय जीवन का आरंभ करें। दस वर्ष पीछे मैं जो पोथी लिखूंगा, उसमें किताबी बातें न होंगी, केवल अनुभव की बातें होंगी।" 
वृद्ध ने जेब से रूमाल निकालकर चश्मा पोंछा और अपनी आंखें पोंछीं। आंखों पर कमला की माता की विजय होने के क्षोभ के आंसू थे, या घर बैठी पुत्री को योग्य पात्र मिलने के हर्ष के आंसू, राम जाने। 
उन्होंने मुस्कराकर कमला से कहा, "दोनों मेरे पीछे-पीछे चले आओ। कमला! तेरी मां ही सच कहती थी।" वृद्ध बंगले की ओर चलने लगे। उनकी पीठ फिरते ही कमला ने आंखें मूंदकर मेरे कंधे पर सिर रख दिया। 

*जिसके पाप ढके हुए हों
*बगुले की तरह छल करने वाला
*बिल्ली की तरह व्रत रखने वाला

4 comments:

  1. वाह...गुलेरी जी की यह कहानी मैंने नहीं पढ़ी थी...बहुत आनंद आया. उन्हें प्रणाम और आपका आभार.

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  2. शुक्रवार को आपकी रचना "चर्चा-मंच" पर है ||
    आइये ----
    http://charchamanch.blogspot.com/

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  3. वाह क्या बात है.. गुलेरी जी की कहानी स्कूल में पढ़ी थी अब याद नहीं है.. यह कहानी पढ़ कर अच्छा लगा.. गुलेरी जी की कोई पुस्तक अगर आपको मालूम हो तो कृपया मेल करके बताएँ..

    आभार

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  4. पहले भी पढ चुका हूँ, फिर पढना भी अच्छा लगा। जयंती पर गुलेरी जी को नमन!

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