Thursday, June 30, 2011

पुनर्जन्म

मैं रास्ते भूलता हूं 
और इसीलिए नए रास्ते मिलते हैं 

मैं अपनी नींद से निकलकर 
प्रवेश करता हूं 
किसी और की नींद में 
इस तरह पुनर्जन्म होता रहता है

एक ज़िन्दगी में 
एक ही बार पैदा होना 
और एक ही बार मरना 
जिन लोगों को शोभा नहीं देता 
मैं उन्हीं में से एक हूं

फिर भी नक्शे पर जगहों को 
दिखाने की तरह ही होगा 
मेरा जि़न्दगी के बारे में कुछ कहना 

बहुत मुश्किल है बताना 
कि प्रेम कहां था किन-किन रंगों में 
और जहां नहीं था प्रेम 
उस वक्त वहां क्या था

पानी, नींद और अंधेरे के भीतर 
इतनी छायाएं हैं और 
आपस में प्राचीन दरख़्तों की जड़ों की तरह 
इतनी गुत्थम-गुत्था 
कि एक-दो को भी निकाल कर 
हवा में नहीं दिखा सकता

जिस नदी में गोता लगाता हूं 
बाहर निकलने तक 
या तो शहर बदल जाता है 
या नदी के पानी का रंग 

शाम कभी भी होने लगती है 
और उनमें से एक भी दिखाई नहीं देता 
जिनके कारण चमकता है 
अकेलेपन का पत्थर। 
-चन्द्रकांत देवताले 

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