Wednesday, May 2, 2012

यात्री

(अज्ञेय की कविता 'यात्री' से एक अंश, और 
एस एल हलदनकर की 'ग्लो ऑफ होप'.)
मंदिर से, तीर्थ से, यात्रा से
हर पग से, हर सांस से
कुछ मिलेगा, अवश्य मिलेगा 

पर उतना ही, जितने का
तू है अपने भीतर से दानी।

4 comments:

  1. बहुत सुंदर................
    haldankar is one of my favourites.

    regards.
    anu

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  2. आपकी पोस्ट कल 19/4/2012 के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें

    चर्चा - 861:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

    ReplyDelete

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