Monday, February 20, 2012

यात्रा से लौटकर

(थाईलैंड की यात्रा से लौटकर एक कविता,
साथ में एडवर्ड मुंच की 'गर्ल ऑन द बीच')

यात्रा से लौटती हूं 
तो कई दिनों तक 
अस्त-व्यस्त रहता है घर

एक-एक कर अटैची से
बाहर आता है सामान
अपनी पुरानी जगह 
ले लेने के लिए 

कुछ सुखद स्मृतियां 
और 
सघन अनुभव भी 
निकलते हैं 

सामान सहेजती 
हर बार यही सोचती हूं 
यात्राएं कैसे परिष्कृत कर देती हैं 
मनुष्य को भीतर से 

निर्रथक व नगण्य 
लगने लगता है बहुत कुछ 
दृष्टि बदल देता है 
जीवन के प्रति नया कोण 

एक यात्रा से लौट 
मैं दूसरी यात्रा पर 
निकल जाना चाहती हूं। 

('जनसंदेश टाइम्स' में 1 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

32 comments:

  1. अक्सर यात्रा पर जाकर घर की कीमत पता लगती है..

    अच्छी रचना...

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  2. bahut achichi kavita madhavi

    यात्राएं परिष्कृत कर देती हैं ...

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  3. बहुत अच्छी प्रस्तुति, सुंदर रचना.....
    शिवरात्रि की हार्दिक शुभकामनायें!

    MY NEW POST ...सम्बोधन...

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    Replies
    1. धीरेन्द्र जी, आपको भी शिवरात्रि की शुभकामनाएं. धन्यवाद.

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  4. Replies
    1. मज़ा आता है यात्राओं के साइड इफेक्ट्स से जूझने में!

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  5. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा आज के चर्चा मंच
    पर की गई है। चर्चा में शामिल होकर इसमें शामिल पोस्ट पर नजर डालें और इस मंच को समृद्ध बनाएं.... आपकी एक टिप्पणी मंच में शामिल पोस्ट्स को आकर्षण प्रदान करेगी......

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  6. विचारनीय एवं गंभीर कविता

    आभार

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  7. अनुपम भाव संयोजन लिए
    कल 22/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्‍वागत है !
    '' तेरी गाथा तेरा नाम ''

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  8. सुन्दर कविता...
    हार्दिक बधाई..

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  9. आज ही अश्वनी बता रहा था की आजकल कविताए लिखने का मन नहीं करता...अब पता चला बंद मैदान छोड़कर क्यों भागा :) बहोत अच्छे.

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    Replies
    1. बंदा मैदान छोड़कर नहीं भागा पंकज जी, कविता-ए-वतन साथियों के हवाले कर सुस्ताने बैठा है दो घड़ी :)

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    2. ...अरे, शुक्रिया कहना तो भूल ही गई :')

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  10. अच्छी अभिव्यक्ति..

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  11. आपकी हर यात्रा का हासिल हमारे लिए एक और खूबसूरत कविता हो.इस यात्रा के सघन अनुभवों पर भी यहाँ कुछ पढ़ने को जल्द मिल सकता है?

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  12. यात्रा से यात्रा के बीच का केनवास ... लाजवाब लगा ...

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    Replies
    1. बहुत शुक्रिया, दिगम्बर जी!

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  13. कुछ सुखद स्मृतियां
    और
    सघन अनुभव भी
    निकलते हैं
    और यही हमरे खजानों में शुमार होते जाते हैं ....सच्ची अभिव्यक्ति !!!

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    Replies
    1. और यही ख़ज़ाने असल पूंजी होते हैं जीवन की... शुक्रिया!

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  14. अरे गज़ब...एकदम सेम-टू-सेम, डिट्टो ऐसा ही होता है :)

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  15. माधवी जी .. आपके ब्लॉग पर आना सुखद लग रहा है ..वटवृक्ष पत्रिका के माध्यम से आपके बारे में जानने का मौका मिला ...आप शिमला हिमाचल से हैं तब तो और भी अपनापन लगा ..अब आना होता रहेगा ...

    आपकी रचना बहुत सरल से शब्दों में बहुत कुछ कहती है ..जिंदगी ऐसी ही है एक यात्रा..एक डगर से दूसरी डगर ...

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  16. आज पहली बार आपके ब्लॉग पर आना हुआ। आपकी रचनाओं ने खासा प्रभावित किया है। आपकी भाषा दिल से निकली हुई सच्ची और पवित्र भाषा है ...बहुत बहुत बधाई सभी अनुपम रचनाओं के लिए।

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