Tuesday, August 23, 2011

मैं उसे

(अशोक वाजपेयी के संग्रह 'उम्मीद का दूसरा नाम से' 
एक प्रेम कविता)

मैं उसे पुकारना चाहता हूं 
संसार की हज़ारों भाषाओं और बोलियों में 
मैं हरेक भाषा में उसके नाम का
अनुवाद करना चाहता हूं

मैं संसार की तमाम भाषाओं में
प्रेम, प्रतीक्षा, कामना के 
पर्याय खोजकर 
उनका उच्चारण करना चाहता हूं

ताकि उससे हज़ारों शब्दों में प्रेम
हज़ारों शब्दों से उसकी प्रतीक्षा
और कामना कर सकूं
उस अकेली अद्वितीया को
हज़ारों नामों से घेर सकूं।

12 comments:

  1. हर बात के खत्म हो जाने के बाद, हर बात के शुरू होने से पहले कि यही एक अकेली चाह है, इसे दुनिया की हज़ार भाषाओं में पुकार लो और सचमुच हज़ारों नामों से घेर दो। बहुत सुंदर कविता है।

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  2. वाह.. प्रेम बयां हो तो ऐसे!

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  3. बहुत अच्छी अभिव्यक्ति...

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  4. हज़ारों शब्दों से उसकी प्रतीक्षा
    और कामना कर सकूं-

    Sundar...

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  5. प्रेममय कविता साझा करने के लिए बहुत आभार !

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  6. कल 31/08/2011 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  7. प्रेम बयान करने के लिए कितनी ही भाषा हो कितने ही शब्द हों कम पढ़ जातें हैं /बहुत ही प्रेममई प्रस्तुति /बधाई आपको /



    please visit my blog
    www.prernaargal.blogspot.com thanks.

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  8. prem.......jiskii vyaakhyaa asambhav see hai....sundar rachnaa.

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  9. बहुत खूबसूरत रचना |

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  10. अशोक बाजपेयी काफी खराब कवि हैं .... इस लिए उम्हे पढ़ने मे मज़ा बहुत आता है :) :)

    मज़ेदार कविताएं !

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