Monday, August 8, 2011

कवि रूमी को पढ़ते हुए

(आज रूसी कवि अनातोली परपरा की एक कविता)

कवि ने कहा मुझसे
"अन्धकार है मूर्खता 
और 
प्रकाश बुद्धिमत्ता"

कोई अन्त नहीं जिनका
लेकिन जब नहीं होती
जीवन में कविता

बुद्धिमत्ता बदल जाती है 
मूर्खता में
और मूर्खता
ले लेती है जगह मूर्खता की। 

(अनुवाद: लीलाधर मंडलोई)

10 comments:

  1. अच्छी प्रस्तुति

    अंतिम दो पंक्तियाँ शायद इतनी गहन हैं कि सोचना पड़ गया ...
    और मूर्खता
    ले लेती है जगह मूर्खता की।

    मूर्खता ही मूर्खता कि जगह ले लेती है ..अभी तक उलझी हुई हूँ इसमें

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  2. मुझे तो लगता है कि अंतिम पंक्ति में कोई त्रुटि है ?

    ब्लॉग का शीर्षक भी समझ में नही आया...

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  3. ब्लॉग नहीं,पोस्ट का शीर्षक समझ में नही आया ...

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  4. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
    चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  5. बहुत ही सुन्दर....

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