Friday, April 18, 2014

अनंत यात्री हैं हम

(यात्रा... रोज़मर्रा की ज़िंदगी से निकाले ख़ुद के लिए सुकून के कुछ पल। संभवत: हर व्यक्ति अपने जीवन में यात्रा तो करता ही है। आख़िर किसका मन नहीं करता फिर से नई उमंग से जीने का! कोई मन के अंतहीन आकाश में किसी परिंदे की तरह स्वच्छंद उड़ान भरता है तो कोई मन के सागर की गहराइयों से मोती ढूंढ लेता है। कोई पहाड़ की चोटियों पर 'ख़ुद' को तलाशता है तो कोई जीवन-पथ की पगडंडियों पर लड़खड़ाते, गिरते, फिर संभलते हुए 'ख़ुद' को खोजता है... आख़िर 'चलते रहना' ही तो जीवन की बड़ी यात्रा है...।)
हम हर पल चल ही तो रहे हैं। कभी पैरों पर, तो कभी मन के पंखों पर सवार होकर। कभी वास्तविक संसार में तो कभी आभासी दुनिया में। जीवन का अर्थ ही चलते जाना है। ...और रुक जाना मृत्यु। यानी, अगर हम जीवित हैं, सांस ले रहे हैं, प्राणवान् हैं, तो हम सब लगातार यात्रा में होते हैं। एक जीवन-यात्रा! पर क्या इस जीवन-यात्रा की परिभाषा केवल घर की देहरी छोड़ने में निहित है, क्या स्थान छोड़कर दूसरे स्थान पर जाना ही जीवन का सार है? एक गंतव्य से दूसरे गंतव्य तक जाना तो इस जीवन-यात्रा का एक ही पहलू हुआ। शायद एक बहुत छोटा-सा पहलू, क्योंकि हर रोज गंतव्य बदलना आसान नहीं है। तो क्या हम उस दौरान ज़िंदा नहीं रहते, जब हम घर की चहारदीवारी के भीतर होते हैं, या किसी शहर की सीमाओं में बंधे रहकर जीवन गुजार रहे होते हैं? क्या यह संभव है कि हम हर पल, हर दिन जगह बदलते रहें? संभवत: नहीं। व्यावहारिक तौर पर ऐसा हो पाना कदापि संभव नहीं है। फिर भी हम जीते जाते हैं, हमारी जीवन-यात्रा निर्बाध चलती जाती है। तो फिर हम कहां जाते हैं, कहां भ्रमण करते हैं? असल में हम अपने भीतर की यात्राओं पर निकलते रहते हैं। वो यात्राएं जिन्हें हमारा शरीर नहीं, बल्कि मन करता है। शरीर की सीमाओं के भी पार जा आता है मन, उन हदों को छू आता है जहां शारीरिक यात्राओं के ज़रिए जाना संभव ही नहीं है। ऐसी यात्रा हम हर पल करते हैं। सोते हुए करते हैं, खुली आंख के साथ करते हैं, खाते हुए करते हैं, कुछ पढ़ते हुए करते हैं, गुनगुनाते हुए करते हैं, सोचते हुए करते हैं, दोस्तों-साथियों के साथ बतियाते हुए करते हैं, अकेले विचरते हुए करते हैं। यानी, भीतर की यात्रा के लिए न तो कोई विशिष्ट समय चाहिए, न कोई विशेष अवसर। हर कोई अपने मन, ज़रूरत एवं परिस्थिति के हिसाब से यात्रा करता है। कोई लंबी यात्रा पर निकलता है तो कोई छोटी-छोटी यात्राओं पर। कोई आगे ही आगे चलता चला जाता है, तो कोई कुछ दूर जाकर लौट आता है। कोई विरक्ति के लिए यात्रा करता है, तो कोई संयोग-भाव का अहसास लेने के लिए अपने भीतर विचरने निकलता है। सबकी अपनी अलग-अलग यात्राएं हैं, सबके मंतव्य अलग-अलग हैं। बचपन से लेकर बूढ़े होने तक हम इन यात्राओं का सुख, या कहें, अनुभव लेते हैं। लेकिन एक बात जो सबकी साझी है, वो यह कि हम लगातार यात्रा करते ज़रूर हैं। ...और अगर कोई विरला ऐसी यात्रा नहीं करता, वो? तो फिर वो जी नहीं रहा है, वो केवल सांस ले रहा है। 
एक चीनी कहावत है कि दस हज़ार किताबें पढ़ने से बेहतर है दस हज़ार मील की यात्रा करना। ...और जब हम भीतर की यात्राएं करते हैं तो फिर दस हज़ार मील हों या दस लाख मील, कोई हिसाब कहां रहता है। हम चलते जाते हैं, बिना किसी बाधा या रोक-टोक के। कहां रुकना है, कहां पड़ाव डालना है, कहां से कदम वापस खींचने हैं, यह कोई दूसरा नहीं बल्कि हम ही तय करते हैं। इन अंतर्मना यात्राओं के दौरान हम सुख-दुख बीनते जाते हैं, अनुभव समेटते जाते हैं, समृद्ध होते जाते हैं, और एक तरह से लगातार हल्के होते जाते हैं। यह समृद्धता हमें अपने जीवन दर्शन में दिखाई देती है, रिश्ते-नातेदारों के साथ हमारे व्यवहार में नज़र आती है। हम क्या वही होते हैं, जैसे पहले थे? यक़ीनन नहीं। हम बदले होते हैं, हमने मन के ज़रिए दुनिया की सच्चाई से आंख मिला ली होती है। 
एक कवि को यह समृद्धता अपनी कविताओं में नज़र आती है। एक कवि भी तो यात्री ही है। बिना यात्रा के कविता नहीं हो सकती, फिर चाहे वो किसी स्थान की यात्रा हो या मन के भीतर की परतों की। कवि को तो बहुत गहरी यात्रा करनी पड़ती है। अच्छी या बुरी कविता में अंतर बता पाना सरल होता है। अच्छी कविता में लम्बी यात्राओं का निचोड़ दिखाई देता है और बुरी कविता में स्थिरता एवं सतहीपन प्रतिबिम्बित होता है। जहां न पहुंचे रवि, वहां पहुंचे कवि में कवि का पहुंचना शारीरिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक होता है। कवि अपने मन की खिड़की खोलता है और बिना किसी वीज़ा या पासपोर्ट के अनन्त यात्राएं कर लेता है। उसे न तो कोई सीमा रोक पाती है, न कोई सागर, न कोई दीवार। वह जब लौटता है तो इस तरह के अनुभवों का पिटारा लेकर लौटता है कि लेखनी के ज़रिए वह पिटारा पूरी मानवता के सामने उड़ेल कर रख देता है। 
कवि के अलावा एक चित्रकार, एक फिल्मकार और कला-संसार से जुड़े दूसरे लोग भी अपनी कला के माध्यम से हमें विविध यात्राओं पर ले चलते हैं। क्या कभी किसी ने सोचा होगा कि घर बैठे-बैठे टेलीविज़न पर जुरासिक पार्क जैसी फ़िल्म देखते हुए हम उस जुरासिक काल में पहुंच जाएंगे जहां डायनासोर इस धरती पर विचरते थे! फ़िल्मकार हमारा गाइड है जो हमारा हाथ पकड़कर हमें उस काल की यात्रा पर ले जाता है, जिसके बारे में हमने कभी कल्पना तक नहीं की थी। परदे पर उतरने से पहले यह यात्रा उस फ़िल्मकार के मन में हुई होगी, क्योंकि वो ख़ुद भी उस जुरासिक काल में नहीं गया था। उसने अपने मन में एक जुरासिक पार्क गढ़ा होगा। पहले ख़ुद उसमें टहला होगा, घूमा होगा, फिर उसे मूर्त रूप दिया होगा। ...और अपनी इस यात्रा के ज़रिए वह दुनिया के करोड़ों लोगों को अपने साथ उस प्रागैतिहासिक काल की यात्रा पर ले गया होगा। 
किसी चित्रकार की कूची से निकलकर कैनवास पर फैले रंगों को निहारिए। कल्पना कितने ही विविध रूपों में आंखों के सामने साकार नजर आती है। कभी सोचा है कि कैसे वो रंग अलग-अलग आकृतियों के माध्यम से एक पूरी कहानी कह देते हैं, एक लंबे-चौड़े सफर पर ले जाते हैं? कैनवास पर एक दृश्य उकेरने के लिए उसने मन को कहां-कहां नहीं भटकाया होगा। ऐसा संभव कहां है कि कूची से झरते रंग जो आकार लेते हैं, उन सबको चित्रकार ने अपनी आंखों से देखा हो। यकीनन, वो मन की उंगली पकड़कर उन जगहों पर घूमा है, जहां उसके कदम कभी नहीं पड़े हैं। एक छोटे बच्चे के हाथों हुई कलाकारी ही देख लीजिए। कागज़ पर आड़ी-तिरछी रंगीन रेखाओं के पीछे एक बाल मन की यात्राएं ही तो छुपी होती हैं। वो यात्राएं जिन्हें एक बालक अपनी कल्पनाओं का हाथ पकड़कर तय करता है। 
पर्याप्त हैं भीतर की यात्राएं? 
एक बड़ा सवाल मन में ज़रूर घुमड़ता है कि क्या केवल भीतर की यात्रा करना काफी है, स्वयं की सोच को समृद्ध करने के लिए? क्या शारीरिक तौर पर बिना गंतव्य बदले मन को कल्पनाओं के आकाश में परिंदा बनाकर उड़ाते रहने से अनुभवों का वह खज़ाना मिल पाना संभव है, जिसके ज़रिए हम बाकी लोगों को भी समृद्ध कर सकें। शायद नहीं। मन की उड़ान के लिए ज़रूरी है कि आंखों ने भी ज़्यादा-से-ज़्यादा अनुभव लिए हों। भीतर की यात्रा के साथ-साथ भौतिक यात्रा के फ़ायदे को कैसे भूला जा सकता है। कवियों में भी जो कवि ज़्यादा घूमा-फिरा होगा, जिसने देशाटन किया होगा, उसकी कविताएं निखरी हुई होंगी। इसलिए, क्योंकि उनकी कल्पनाओं में यथार्थ के रंगों का समावेश भी होगा। जब हर तरह के रंग मिलेंगे तो रचनाएं ज़्यादा लोगों से, ज़्यादा गहरे तक जाकर जुड़ पाएंगी। हालांकि, कुछ कवि ऐसे हैं जो जेल की बंद कोठरी में रहकर भी ऐसी यात्राएं कर गए कि क्या कहने! नाज़िम हिकमत के जीवन का एक बड़ा हिस्सा जेल में बीता। उस दौरान उन्होंने सबसे ज़्यादा कविताएं लिखीं। उनकी कविताएं जेल की सारी हदें तोड़ती रहीं। उनके प्रेमी-हृदय की यात्रा को नहीं रोक पाई जेल की चहारदीवारी। नाज़िम का प्रेमी मन अपनी यात्रा में सतत् लगा रहा। जेल में रहकर उन्होंने वसन्त देखा, पेड़-पौधे देखे, आसमान देखा, गांव देखे और निरन्तर देखा अपनी प्रेयसी को। दैहिक रूप में वो साथ नहीं थी लेकिन भावनाओं की यात्रा में वो हिकमत के साथ हमेशा रही। एक कविता में हिकमत कहते हैं कि मैं तुम्हें छू रहा हूं मेरी प्रिये! कमाल की है यह मन की यात्रा! 
घुटनों के बल झुका देख रहा हूं धरती 
देख रहा हूं नीली चमकती कोंपलों से भरी शाखाएं 
वसन्त भरी पृथ्वी की तरह हो तुम, मेरी प्रिया! 
मैं तुम्हें ताक रहा हूं। 
चित्त लेटा मैं देखता हूं आसमान 
तुम वसन्त के मानिन्द हो, आसमान के समान 
प्रिया मेरी! मैं तुम्हें देख रहा हूं। गांव में, रात को सुलगाता हूं आग मैं, छूता हूं लपटें 
तारों तले दहकती आग की तरह हो तुम 
प्रिये! मैं तुम्हें छू रहा हूं।
मन के बंधनों से आज़ाद करती हैं 
हम सब एक बात तो स्वीकार करेंगे कि, रात को सोते समय दिमाग को जो उलझनें जकड़े रखती हैं, सुबह होने तक वो सब उलझनें ख़ुद-ब-ख़ुद सुलझ चुकी होती हैं। सोए रहने के दौरान मन जाने कहां-कहां भटक आता है और हल्का होता जाता है। अनजानी-सी दुनिया की वो यात्राएं हमारा मन हमें बिना बताए स्वयं करता है। लेकिन यही यात्राएं हम जागृत अवस्था में करें, तो? हम जितना विचरण करेंगे अपने भीतर, उतने साफ होते जाएंगे, निर्मल होते जाएंगे। मन की बहुत-सी गुत्थियां स्वयमेव खुलती चली जाएंगी। यह घुमक्कड़ी इन्सान को बेहतर बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती। विख्यात यायावर एवं लेखक राहुल सांकृत्यायन ने ऐसी ही बात बाहर की यात्राओं के लिए कही, लेकिन वह किसी भी तरह की यात्रा के लिए सटीक बैठती है। वे लिखते हैं- "घुमक्कड़ असंग और निर्लेप रहता है, द्यपि मानव के प्रति उसके हृदय में अपार स्‍नेह है। यही अपार स्‍नेह उसके हृदय में अनंत प्रकार की स्‍मृतियां एकत्रित कर देता है। वह कहीं किसी से द्वेष करने के लिए नहीं जाता। ऐसे आदमी के अकारण द्वेष करने वाले भी कम ही हो सकते हैं, इसलिए उसे हर जगह से मधुर स्‍मृतियाही जमा करने को मिलती हैं।" सांकृत्यायन जी ने जब घुमक्कड़ शास्त्र की रचना की तो उनकी समस्त यात्राओं का निचोड़ ही उनके महावाक्यों का आधार बना। यानी, बाहर की यात्राएं उनके लिए अपने मन को खंगालने का ज़रिया बनती चली गईं। जितना वे बाहर घूमे, उससे कहीं ज़्यादा अपने मन के भीतर विचरण कर आए। इस विचरण के दौरान जहां-जहां उन्हें मैल दिखा, उसे वे साफ करते चले गए। मन की यात्राएं उन्हें निर्मल करती चली गईं। 
चमत्कार से कम नहीं 
रामायण के रचयिता महर्षि वाल्मिकी की कहानी तो सुनी होगी। वे पहले रत्नाकर डाकू के नाम से जाने जाते थे, जो लोगों की हत्या करके उन्हें लूट लेता था। एक बार उसने नारद जी को लूटने का प्रयत्न किया। नारद जी ने उनसे पूछा कि वह ऐसी लूटपाट किसलिए करते हैं। रत्नाकर ने उत्तर दिया कि परिवार का पेट पालने के लिए। तब नारद जी ने उनसे पूछा कि क्या उनका परिवार उनके पापों का फल भोगने में उनका भागीदार बनने को तैयार है। नारद जी की बात सुनकर रत्नाकर ने अपने परिवार से बात की तो किसी ने भी उनके पापों का बोझ अपने सिर लेने से मना कर दिया। इस पर रत्नाकर सोच में पड़ गए। उन्होंने विचार करना शुरू किया, अपने मन को खंगालना शुरू किया तो उन्हें सत्य की अनुभूति हुई। इसके बाद उन्होंने अपना पूरा ध्यान ईश्वर की भक्ति में लगाया और कालांतर में महर्षि वाल्मिकी के नाम से प्रसिद्ध हुए। 
डाकू रत्नाकर ने जब अपने मन के भीतर विचरण किया तो उस स्थान को पाया जिसके बारे में उन्होंने पहले कभी सोचा तक न होगा। भीतर की यात्रा ने चमत्कार किया और वे बदलते चले गए। यकीनन, मन की यात्राओं पर जाना मोक्ष को पाने जैसा है, ख़ासकर जब हम अपने विचारों के पहिये पर लगातार घूमते जाते हैं। घूमने-फिरने की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि हम एक सुलझे एवं निखरे हुए इंसान के रूप में लौट कर आते हैं। कुछ ऐसा ही अनुभव लेखक, विचारक एवं यायावर कृष्णनाथ को स्पीति घाटी में मिलता है, जब कल्पनाओं में उन्हें अपना शव दिखने लगता है। अपने संस्मरण स्पीति में बारिश में वे लिखते हैं- शांत चित्त से रोहतांग को देखता हूं। बर्फ़ की फिसलन के बीच रास्ता है। यहां हिम मणि की तरह भास्वर नहीं है, मृत्यु की तरह धूसर है। जहां आकाश की छाया पड़ती है वहां नीला, बैंगनी है। चाहे शब्द, अर्थ की वासना का आरोप हो, मुझे लगा कि हिमानी कब्रगाह है जहां अनाम शव बिछे हुए हैं जिन पर न कोई 'क्रॉस' है, पट्टियां हैं। अनाम, अकाल मूरत अजूनी। मरणस्मृति होती है। जो मर गए हैं उनकी स्मृति, जो मरने वाले हैं उनकी स्मृति और उन सब शवों के आगे है मेरा शव। मैं अपने कन्धे पर चढ़ अपना शव देखता हूं। शव स्थान देखता हूं। रोटांग देखता हूं। इस शव के स्थान पर भी एक मढ़ी है। पत्थर का जमाव। गुहा मानुष, अमानुष के लिए एक द्वार है। एक भोट परिवार है। जो शायद आने-जाने वालों के लिए चाय-शाय दे सकता है। पेट पालने के लिए आदमी-जन कहां-कहां रहते हैं! इसके आगे एक मोड़ आता है। बायीं ओर बर्फ़  की चट्टान है। जैसे थक्का की थक्का जमायी हुई पीली पड़ती हुई हड्डियां हैं। इन्हें काटकर रास्ता है। रास्ता यहां संकरा है। संकरा है वह रास्ता जो जिन्दगी की ओर जाता है। चौड़ा है वह रास्ता जो मृत्य की ओर जाता है। रास्ते पर फिसलन है। जीप फिसले तो मृत्यु के उस चौड़े रास्ते पर जाए। अभी तो जिन्दगी के संकरे रास्ते पर हैं। तीसरा पहर है। काल का और जिन्दगी का भी। फिर भी मौसम बहुत अच्छा है। शायद रोहतांग इस ऋतु में, इस वेला में, इतना अच्छा कम ही होता है। फिर यह समय आए, न आए। बर्फ़ पर चलने का, फिसलने का, गिरने, गिर कर फिर उठने, चलने का मन होता है। हम रोहतांग जोत के शीर्ष पर हैं। एक पट बताता है रोहतांग, समुद्र सतह से ऊंचाई 13050 फ़ीट। 
ऐसा नहीं है कि कृष्णनाथ को ये सब अनुभव शारीरिक यात्राओं के दौरान हुए। उन्होंने तो अपने भीतर की आंखों से ये सब देखा। अपने मन को उन्होंने बंधनमुक्त किया और उनका मन उड़ता चला गया रोहतांग दर्रे के ऊपर से। मन की आंखों से जो उन्होंने देखा, वो शायद शारीरिक यात्रा के ज़रिए संभव ही नहीं था। ...और जब एक बार उन्होंने मृत्यु का साक्षात् अनुभव कर लिया तो सोचिए ज़िंदगी को उन्होंने किस शानदार तरीके से जिया होगा। उनके लिए यह यात्रा चमत्कार से कम नहीं थी। 
ख़ुद को खोकर ख़ुद को खोजना 
पीको अय्यर कहते हैं, हम शुरू में ख़ुद को खोने के लिए यात्रा करते हैं और फिर ख़ुद को खोजने के लिए। यात्राओं से न सिर्फ़ हमारा दिल और आंखें खुली रहती हैं बल्कि हम दुनिया को बेहतर जान पाते हैं। यात्राओं का अर्थ स्वयं को पाना ही तो है। आत्मविश्लेषण के लिए मन के भीतर घूम आने से अच्छा विकल्प और कोई नहीं। इन यात्राओं से जो आत्मचिंतन, आत्मावलोकन और व्यापक अंतर्दृष्टि उपजती है, वह सोच को विराम देकर कहां संभव है! बुद्ध का कमंडल में कृष्णा सोबती की लेह यात्रा के अलौकिक अनुभव हैं। मैं गाड़ी से उतरकर टहलती हूं। फिर आगे बढ़कर नीचे देखती हूं। पहाड़ों से लगीं सिन्ध दरिया की छोटी बहनियां जन्सकार में मुक्त हो आराम से बह रही हैं। जाने कब से और जाने मैं भी यहां कब से हूं। एक लम्हा, एक युग। लगा, मैं अब मैं नहीं हूं- सीमान्तों के इस भूमिखंड पर कोई और ही खड़ी है। कुछ कदम पर नीचे देखती हूं, और हजारों साल पीछे जा पहुंचती हूं। हजारों-हजार वर्षों से पहले की पर्वत-श्रेणियां और उनके बीच में पहाड़ों से लगी बह रही जन्सकार-नीलाहटी छटा देती। ऊपर तिर रही हैं धूप की रुपहली लहरें और आसपास सब स्तब्ध है। मौन है। मैं नदी तल से मीलों ऊपर हूं कि पानी की तलछट आवाज यहां तक नहीं पहुंचती। मैं खड़ी-खड़ी किसी प्राचीन अन्तर्मन से अपने होने को अनुभव करती हूं। अपनी बात के अंत में कृष्णा सोबती जो कहती हैं, वह अपने मन के भीतर टहलने के असर को बखूबी बयां करती है। अपने अंतर्मन से वे अपने अस्तित्व को तलाशती हैं, वे ख़ुद को ढूंढ़ने जा निकलती हैं। 
आंतरिकता और आनंद का भंडार 
हम ख़ुशी के बहाने ढूंढते रहते हैं। कई बार अच्छा खाना खाकर ख़ुश होते हैं तो कभी ढेर सारी शॉपिंग करके। कभी मनपसंद संगीत सुनकर, तो कभी पसंदीदा फ़िल्म देखते हुए। कभी सैलून में जाकर रिलैक्स होते हैं तो कभी एक लंबी वॉक हमें ऊर्जा और प्रसन्नता से भर देती है। ये छोटे-छोटे पुरस्कार हैं जो हम गाहे-बगाहे ख़ुद को देते हैं। यात्रा भी तो एक पुरस्कार ही है। एक ऐसा पुरस्कार जिसका प्रभाव चिर-स्थाई है। हम किसी यात्रा के दौरान जो देखते हैं, महसूस करते हैं, आत्मसात करते हैं... वो हमारी जीवन भर की पूंजी हो जाती है। वो अनुभव जो हमने घर से निकलकर बटोरे वो हमारे भीतर जगह बना लेते हैं। महातीर्थ के अंतिम यात्री के लेखक बिमल डे एक यात्रा में वह चरम आनंद पा जाते हैं, जिसकी कामना मनुष्य जीवन भर करता रहता है। 
पहाड़ की दीवाल पर और भी चित्र थे। असंख्य देव-देवियों के चित्र व मूर्तियों को देखकर हम तृप्त हुए, वे हमें आशीर्वाद देते हुए लग रहे थे। बहुत दूर लासा के मठ व मंदिर दिख रहे थे, वह शहर इतनी दूर से किसी रहस्य-लोक की तरह लग रहा था। नदी के किनारे-किनारे और आगे जाकर हमें पुन: रुकना पड़ा, नदी के मध्य में वेदी बनाकर उस पर भगवान बुद्ध की विशाल मूर्ति स्थापित की गई थी। काले ग्रेनाइट पत्थर की वह शांत, सौम्य मूर्ति मानो समस्त बौद्ध दर्शन व धर्म की सजीव प्रतिमा थी। वहां आसपास दैत्याकार चट्टानें थीं जिन्हें नदी की तीव्र धारा हिला न सकी थी। लगता था कि नदी का प्रवाह और पत्थर के स्थायित्व की बीच वहां अनादि काल से संग्राम चलता आ रहा था। ऐसे स्थान में मूर्ति गढ़कर शायद कलाकार ने यह बताना चाहा है कि सदाचंचल संग्रामरत विश्व में जगतपिता महामुनि भगवान बुद्ध ही स्थिर हैं। सड़क पर लेटकर हमने इस मूर्ति को भी प्रणाम किया। आगे छोटे-छोटे चोरतेन थे, पताकाएं तो थी हीं। महातीर्थ के पथ में यात्रियों को यहां स्नान कर पूजा करनी पड़ती थी। अत: हम भी अपनी दूसरी अंजलि देने के लिए रुक गए। नीयांग नदी के प्रपात के पास हम प्रथम अंजलि दे आए थे। मुझे स्वयम् पर गर्व होने लगा था। उतनी दूर आ सका हूं, यही मेरा गर्व था। इसलिए नहीं कि पथ कठिन था, इसलिए कि ऐसी यात्रा में बहुत कम लोग आते हैं। मन में निश्चय था, तभी न मुझे यह पुरस्कार मिला। इस पुरस्कार का कोई भौतिक मूल्य भले न हो, आंतरिकता, पवित्रता और आनंद का भंडार तो मुझे मिल ही गया। 
सम्पूर्ण सृष्टि का हर इंसान एक यात्रा पर निकला हुआ है परन्तु यात्रा यात्रा में अंतर है। कोई अपनी मेहनत, सोच-विचार, दिल-दिमाग और कल्पना से इस यात्रा को चरम आनन्द से भरता चला जाता है तो कोई आलस्य, कुंठा, संकुचन और कल्पनाहीनता की वजह से इस यात्रा को असहनीय बना लेता है। सब-कुछ हम पर निर्भर करता है... एक सच्चे यात्री की तरह अनंत प्रसन्नचित बने रहें या अपनी यात्रा को बोझ बना लें! 

(दैनिक भास्कर की मासिक पत्रिका 'अहा ज़िंदगी' के अप्रैल 2014, यात्रा विशेषांक में प्रकाशित)

5 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन १८ अप्रैल का दिन आज़ादी के परवानों के नाम - ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. http://bulletinofblog.blogspot.in/2014/04/blog-post_30.html

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  3. वाकई यात्रा चाहे अंदर की ओर हो या बाहर की ओर उसका अपना ही महत्त्व है। धन्यवाद।

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  4. आपको सपरिवार नव वर्ष की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ .....!!

    http://savanxxx.blogspot.in

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