Saturday, March 10, 2012

शव पिताजी

(प्रख्यात कवि वीरेन डंगवाल की कविता और एडवर्ड मुंच 
की कलाकृति द स्क्रीम.)
चार दिन की दाढ़ी बढ़ी हुई है 
उस निष्‍प्राण चेहरे पर 
कुछ देर में वह भी जल जाएगी
पता नहीं क्‍यों और किसने लगा दिए हैं
नथुनों पर रूई के फाहे 
मेरा दम घुट रहा है

बर्फ़ की सिल्‍ली से बहते पानी से लथपथ है दरी
फर्श लथपथ है
मगर कमरा ठण्‍डा हो गया है
कर्मठ बंधु-बांधव तो बाहर लू में ही
आगे के सरंजाम में लगे हैं

मैं बैठा हूं या खड़ा हूं या सोच रहा हूं 
या सोच नहीं रहा हूं 
य र ल व श श व ल र य 
ऐसी कठिन उलटबांसी जीवन और शव की।

4 comments:

  1. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  2. गहन भाव अभिव्यक्ति.....

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  3. ला-जवाब कविता..
    बहुत बहुत शुक्रिया आपका, इसे पोस्ट करने के लिए!

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  4. क्या गज़ब लिखा है..
    अक्षरों का खेल! :)

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