Wednesday, January 29, 2014

ओ मेरे पिता

(मृत्यु पर कविताएं पढ़ते हुए कवि एकांत श्रीवास्तव की यह कविता हाथ लगी. 
साथ में गुस्ताव क्लिम्ट की कलाकृति 'ट्री ऑफ लाइफ'.) 
मायावी सरोवर की तरह 
अदृश्‍य हो गए पिता 
रह गए हम
पानी की खोज में भटकते पक्षी
 

ओ मेरे आकाश पिता
टूट गए हम
तुम्‍हारी नीलिमा में टंके
झिलमिल तारे
 

ओ मेरे जंगल पिता
सूख गए हम
तुम्‍हारी हरियाली में बहते
कलकल झरने
 

ओ मेरे काल पिता
बीत गए तुम
रह गए हम
तुम्‍हारे कैलेण्‍डर की
उदास तारीखें
 

हम झेलेंगे दुःख
पोंछेंगे आंसू
और तुम्‍हारे रास्‍ते पर चलकर
बनेंगे सरोवर, आकाश, जंगल और काल
ताकि हरी हो घर की एक-एक डाल।

4 comments:

  1. अत्यंत हृदयविदारक ....कैसे मन को सांत्वना दूँ ...??समय के साथ धीरज धर चलना है बस ....!!

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  2. ब्लॉग बुलेटिन की 750 वीं बुलेटिन 750 वीं ब्लॉग बुलेटिन - 1949, 1984 और 2014 मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बहुत ही मार्मिक व प्रभावशाली कविता है माधवी जी ।

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