Saturday, December 3, 2011

तेज़ रफ़्तार सड़कें और यादों की टमटम

मैं छोटे-से पहाड़ी गांव में एक छोटी-सी पहाड़ी पर बने एक बड़े-से घर में थी... बचपन से लेकर जवानी के कई साल तक। और अब एक बड़े शहर के एक बड़े-से उपनगर के एक छोटे-से घर में रहती हूं। यहां मेरे पास मेरी यादें हैं, और आस-पास हैं एक अंतहीन दौड़ में तेज़ी से दौड़ते हुए लोग।
महानगर के बच्चों को मेरी यादें किसी जादुई दुनिया के किस्से-कहानियों जैसी लगती हैं। जब उन्हें बताती हूं कि मैं घर में बना हुआ कपड़े का झोला लेकर स्कूल जाती थी तो उन्हें यकीन नहीं होता। एक हाथ में झोला और दूसरे हाथ में ताज़ी गाचनी से लिपी हुई तख़्ती। हम सारे रास्ते तख़्ती को झुलाते हुए जाते। हमारा तख़्ती का एक गीत था, जिसका हिन्दी अनुवाद कुछ यूं है- फट्टी-फट्टी सूख जा, सूख के तू ख़ुशियां ला, कलम से मैं करूं लिखाई, मास्टर जी ना करें पिटाई। लकड़ी की इस तख़्ती को हम मुल्तानी मिट्टी यानी गाचनी से घिसकर सुखाते, फिर बांस की बनी कलम को रोशनाई में डुबो-डुबोकर तख़्ती पर लिखते। उन दिनों सरकारी स्कूलों में न के बराबर सुविधाएं थीं। हम ज़मीन पर टाट बिछाकर बैठते थे, टाट न होने पर मिट्टी में ही बैठ जाते। इन सब बातों पर शहर के बच्चों को यकीन नहीं होता। वो इसे एक कहानी से ज़्यादा कुछ नहीं समझते। पर उन्हें यह कहानी लगती बड़ी दिलचस्प है।
घर से स्कूल का रास्ता ढाई किलोमीटर का था। छोटी और ऊंची-नीची, पथरीली गलियों से होकर गुजरता था। पैदल चलते-चलते यह सफर कब तय हो जाता, पता ही नहीं चलता था। और रास्ते में हर तरह की कसरत होती। बच्चों के बीच रेस लगती तो जॉगिंग की कमी पूरी होती। पेड़ पर चढ़ते तो स्ट्रेचिंग हो जाती। पूरा रास्ता एक ट्रैक की तरह था, सो ट्रैकिंग भी हो जाती थी। स्कूल के रास्ते में एक नदी पड़ती थी। नदी का किनारा, जहां पानी उथला था
, कई बार हम लोगों का स्विमिंग पूल बन जाता। मैंने उसी नैचुरल स्विमिंग पूल में हाथ-पैर मारने सीखे। कुल मिलाकर सब बच्चे फिट थे। जहां तक मुझे याद पड़ता है, स्कूल में एक-आध बच्चा ही मोटापे का शिकार था। नदी जब नीची होती तो हम उसे हंसते-खेलते पार कर जाते। लेकिन बरसात के दिनों में जब नदी लबालब भरी होती, तो कश्ती लेनी पड़ती। 10 पैसे में एक छोर से दूसरे छोर तक पहुंचते, लेकिन स्कूल जाने वाले बच्चों से मल्लाह कभी-कभी 10 पैसे भी नहीं लेता। रास्ते में पेड़-पौधे और जानवर हमारे साथी होते। स्कूल से ज़्यादा मज़ा स्कूल पहुंचने में आता था। जब स्कूल पहुंचते तो हमारी जेबें कभी बेर, कभी जामुन तो कभी अमरूद से भरी होतीं। अब ये बेर, जामुन, अमरूद महानगर के बाज़ार में ऊंचे दाम पर बिकते हुए देखती हूं तो बड़ा अजीब लगता है। बचपन में ये सारे फल मुफ़्त में खाए थे। इसलिए काफी समय तक इन्हें 100 रुपए किलो में खरीदने की हिम्मत नहीं हुई, लेकिन जल्द ही समझ आ गया कि अगर फल खाने हैं तो खरीदने ही पड़ेंगे। खरीदे, लेकिन बचपन में खाए फलों जैसा स्वाद आज तक नहीं मिल पाया है।
शहर में बच्चों को देखती हूं, सुबह-सुबह स्कूल के लिए तैयार हुए। फिर एक बड़े पिंजरे जैसी बस आती है और बच्चे उसमें चले जाते हैं चिड़ियों की तरह चीं-चीं करते हुए। इनके रास्ते में पेड़ नहीं, बड़ी-बड़ी इमारतें हैं। धूल है, धुआं है... पर इन चिड़ियों ने वो पानी, वो हवा, वो पेड़ देखे नहीं। स्कूल जाते हुए इमारतें ही उनकी साथी हैं। इन बच्चों को स्कूल पहुंचने में उतना ही वक़्त लगता है जितना हमें लगता था; और बहुत बार तो उससे भी ज़्यादा। यह अलग बात है कि इनका ज़्यादातर समय हरी बत्ती का इंतज़ार करती या ट्रैफिक में फंसी हुई गाड़ी में बीतता है, जबकि हमारा पेड़ों पर चढ़ने व उछल-कूद मचाने में बीतता था।
बिल्डिंग के बच्चों को खेलते हुए देखती हूं तो अपने बचपन के खेल याद आते हैं... खो-खो, विष-अमृत, छुपन-छुपाई, लोहा-लक्कड़, चोर-सिपाही और स्टैपू। शहरों के बच्चे भी बहुत-से खेल खेलते हैं, लेकिन इनके बहुत-से खेल जगह की कमी ने बदल दिए हैं। जिन खेलों के लिए बहुत-सी जगह चाहिए वो इन बिस्कुटनुमा बिल्डिंगों में चाहकर भी नहीं खेले जा सकते।
घर में सुख-सुविधा की तमाम चीज़ें मौजूद हैं। लेकिन ये आधुनिक चीज़ें देखकर पता नहीं क्यों मन ख़ुशी की वो उड़ान नहीं भर पाता जो कभी अचानक किसी छोटी-सी पुरानी चीज़ को देखकर भरता है। पुरानी वस्तुओं से मेरा मोह कम नहीं हुआ बल्कि समय के साथ बढ़ता गया है। बचपन में इकट्ठी की गई चीज़ों की तरफ मन अक़्सर भागता है। चिड़ियों के रंग-बिरंगे पंख, नदी से इकट्ठे किए गए पत्थर व सीपियां, कंचे, माचिस के कवर, डाक-टिकट और खोटे सिक्के... ये चीज़ें आज भी मेरे दिल के उतने ही क़रीब हैं जितनी तब थीं। बल्कि अब मैं उन्हें ज़्यादा अहमियत देने लगी हूं। यह ऐसा अमूल्य ख़ज़ाना है, जिसे मैंने सालों से सहेजकर रखा है। कुछ दुर्लभ सिक्के और डाक-टिकट आज भी मेरे पास हैं। ये चीज़ें मुझे मेरे बीते वक़्त से जोड़े रखती हैं। या कहें कि उन चिड़ियों से, नदी से, पहाड़ से और बेर-अमरूद के पेड़ों से। जब इन चीज़ों को देखती हूं तो गांव का वो बड़ा-सा घर शहर के इस छोटे-से घरौंदे में इठलाता हुआ चला आता है। आज घर में मौजूद सुख-सुविधाएं आराम पहुंचाती हैं, वहीं बचपन में सहेजी ये छोटी-छोटी चीज़ें सुक़ून के पल दे जाती हैं।
डाक-टिकट के नाम से मुझे अपने गांव के डाकिये की याद आ गई। सरदारा राम की सायकिल की घंटी बजती तो भरी दोपहरी में हम भी भागते हुए घर के बाहर आ खड़े होते। जिस घर की चिट्ठी होती, सरदारा उस घर के सामने घंटी बजाता। सरदारा को देख हम फूले नहीं समाते। वो हमारे सुख-दुख का साथी रहा। लेकिन अब लगता है कि चिट्ठी का ज़माना बीत चुका। अब मुझे नहीं मालूम कि हमारी बिल्डिंग में कौन-सा डाकिया आता है। आता है तो वो गेट पर ही सबकी चिट्ठियां देकर चला जाता है। हां, कूरियर वाले ज़रूर फ्लैट के दरवाज़े तक आकर घंटी बजाते हैं, लेकिन हर बार नया चेहरा सामने होता है।
आजकल मैं टेलीविज़न नहीं देख पाती। टीवी ऑन रहता है और मैं चैनल बदलती रहती हूं। इसे टीवी देखना नहीं, चैनल सर्फिंग कहते हैं। इतने ज़्यादा चैनल हैं कि कोई करे भी तो क्या। क़दम-क़दम पर ब्रेक है और हाथ अनायास रिमोट की तरफ बढ़ जाता है। अगले दिन कुछ याद नहीं होता कि क्या देखा था। पहले केवल एक चैनल था और उस पर हफ़्ते में एक फिल्म आती थी और उसे लगभग सब लोग देखते थे। अगले दिन उस फ़िल्म पर चर्चा होती। फ़िल्म का खुमार कई दिन तक नहीं उतरता था। बच्चे हफ़्ते भर के लिए कभी धर्मेन्द्र तो कभी जितेन्द्र बने नज़र आते थे। 'चित्रहार' के गाने सबकी ज़ुबान पर होते थे। रविवार सुबह आने वाली गीतों की 'रंगोली' आधे घंटे के लिए जीवन में रंग भर देती थी। 'साप्ताहिकी' देखना एक ज़रूरत थी। यह एक ऐसा प्रोग्राम था, जिसमें टेलीविज़न पर आने वाले हफ़्ते में कौन-कौन से कार्यक्रम आएंगे, उनका ब्योरा दिया जाता था। और वो पुराने धारावाहिक... मालगुडी डेज़, हम लोग, बुनियाद, सुरभि, नुक्कड़, उड़ान! सोचती हूं कि जीवन में हमेशा ज़्यादा मिलने पर ही ख़ुशी हो, यह ज़रूरी नहीं। ख़ुशी मन-मुताबिक मिलने में है। अब भरपूर मिलता है पर मन नहीं भरता। पहले थोड़ा-बहुत मिलता था और ज़्यादा ख़ुशी देकर जाता था। सच ही कहते हैं कि ज़्यादा खाना देखकर कई बार भूख मर जाती है।
रेडियो की बात किए बिना यादों का यह झरोखा अधखुला है। 'बिनाका संगीतमाला' को कौन भूल सकता है। रेडियो सिलोन के इस प्रोग्राम से फ़िल्मी-संगीत के काउंट डाउन की शुरुआत हुई थी। 'बिनाका संगीतमाला' शुरु होते ही घर में पास-पड़ोस के लोगों का जमघट लग जाता। कौन-से पायदान पर कौन-सा गाना है, यह सारे गांव को पता होता था। अमीन सयानी की रेशमी आवाज़ और उनके दिलक़श अंदाज़ का हर कोई दीवाना था। अब इतने रेडियो चैनल आ गए हैं कि कौन-सा स्टेशन लगाएं, यही तय करना मुश्किल है। उस पर कहीं किसी चैनल पर ठहर जाएं तो लगातार चलने वाली बक-बक सिर में दर्द करती है। किसी एक रेडियो चैनल को देर तक सुनना मुमकिन नहीं लगता अब। अगर कोई आपके फेवरेट आरजे या उद्घोषक का नाम पूछे, तो आप यक़ीनन सोच में पड़ जाएंगे। उद्घोषक इतने सारे हैं कि किसी एक का नाम याद रखना मुश्किल है।
बचपन में पढ़ी पत्र-पत्रिकाओं और कॉमिक्स के नाम आज तक नहीं भूले हैं। कितनी बेसब्री से इंतज़ार रहता था डायमंड कॉमिक्स और मनोज चित्रकथा के नए सेट का। जेब-खर्च से एक-एक पैसा जोड़कर पूरा का पूरा सेट एक साथ पढ़ने की होड़! घर में कॉमिक्स किराए पर लाने के बजाय दुकान पर ही बैठकर पढ़ने में कम पैसे लगते थे। छोटी-सी दुकान के एक कोने में टाट पर बैठकर मैं कब एक सांस में सारी कॉमिक्स पढ़ जाती, पता नहीं चलता था। बिल्लू, पिंकी, चाचा चौधरी, लम्बू-मोटू, फौलादी सिंह, राजन-इकबाल, नागराज और साबू मेरे प्रिय पात्र थे। जब कभी मां-पिताजी कॉमिक्स पढ़ने पर टोकते तो लगता कि पता नहीं क्यों वे मुझे ऐसा करने से रोकते हैं। फिर मन-ही-मन सोचती कि जब मैं उनके जितनी बड़ी हो जाऊंगी तब भी कॉमिक्स पढ़ना नहीं छोडूंगी और अपने बच्चों को भी कॉमिक्स पढ़ने से कभी मना नहीं करूंगी। जिस उम्र में कॉमिक्स पढ़ती थी, उस उम्र के बच्चों का आजकल कई-कई सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर अकाउंट हैं और वो रात-दिन उन पर चैटिंग करते हैं। वे नए-नए मोबाइल फोन और वीडियो गेम्स के सुपरहीरो की बात करते हैं। कॉमिक्स की जगह अब प्ले-स्टेशन और एक्स-बॉक्स के गेम्स ने ले ली है। मुझे तो अभी तक ये गेम्स समझ ही नहीं आए। कभी-कभार हुआ तो कम्प्यूटर पर फ्री-सेल या सॉलिटेयर खेल ली, बस। वैसे, मैं बोर होने पर आज भी कोई किताब खोलना ही पसंद करती हूं। लेकिन महानगर के बच्चे बोर होने पर हमेशा कंप्यूटर का स्विच ऑन करते हुए ही नज़र आते हैं।
मुझे याद है जब मेरे पिताजी ने पक्का घर बनवाया था। यह काम लगभग एक साल तक चला, पर अपना घर बनते हुए देखना और पिता की आंखों में हर जुड़ती ईंट के साथ एक ख़ुशी जुड़ते हुए देखना अविस्मरणीय है। अपनी ज़मीन, अपनी छत और अपना आंगन था। लेकिन अब मेरे घर का पता गुलेरी जी का घर नहीं है। फ्लैट नंबर, विंग नंबर, प्लॉट नंबर, सेक्टर नंबर... तरह-तरह के नंबरों के बाद मेरे घर का पता मिलता है। अब हम फ्लैट में टंगे हैं और लोग पूछते हैं कि कौन से फ्लोर पर रहते हो। छत पर जाना अलाउड है? दरवाज़ा पूरब की ओर खुलता है? धूप आती है? अब क्या बताऊं कि धूप आती तो है, पर मेरे घर के सामने खड़ी एक दूसरी बड़ी इमारत पर। धूप कोई भेदभाव नहीं करती, वो सब पर जमकर बिखरना चाहती है। लेकिन महानगर में दाम तय करता है कि किसको कितनी धूप मिलेगी। यह हक़ीकत है, इसी हक़ीकत को बयां करता जावेद अख़्तर का एक शेर है- "ऊंची इमारतों से मकां मेरा घिर गया, कुछ लोग मेरे हिस्से का सूरज भी खा गए" 
तारों की झिलमिल चादर के नीचे खुली छत पर सोना अब किसी दिवास्वप्न से कम नहीं लगता। महानगर में तारों से भरा हुआ आकाश नहीं दिखता। प्रदूषण और रोशनी की चकाचौंध तारों की चमक फीकी कर देती है। एक-आध ज़िद्दी ध्रुव तारा या फिर कभी शुक्र ग्रह दिख जाता है। कभी किसी ख़ुशकिस्मत रात को सप्तऋषि के दर्शन भी हो जाते हैं, पर धुएं की परत के पार उसकी चमक फीकी-सी दिखती है। मेरे गांव में मोतियों-जड़ा आकाश इतना साफ और चमकीला नज़र आता था कि मैं कई बार मां-पिताजी से किसी तारे को घर ले आने की ज़िद कर बैठती। और मज़े की बात यह कि मां-पिताजी वो तारा ले आने का आश्वासन भी दे देते। सब बच्चों का एक फेवरेट तारा होता था और मेरे ऑल टाइम फेवरेट थे- सप्तऋषि। एक टेबल फैन और उसके सामने बिछी पूरे परिवार की चारपाइयां! कभी-कभार भिन-भिन करता हुआ कोई मच्छर, मच्छरदानी की अभेद दीवार को न तोड़ पाने की झल्लाहट में झुंझलाकर लौट जाता! सुबह-सुबह सूरज की थपकी, हल्की गुनगुनी धूप, और थोड़ा और सो लेने का लालच! कभी-कभार रात को अचानक पड़ने वाली बारिश की फुहार, फिर आनन-फानन में वो बिस्तर समेटकर घर के भीतर भागना! अब ये सब यादें ही रह गई हैं। सुदर्शन फ़ाकिर का एक गीत अकसर याद आता है... "ये दौलत भी ले लो, ये शोहरत भी ले लो, भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी, मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो काग़ज़ की कश्ती, वो बारिश का पानी..."
आज के दौर को मैं कम आंकते हुए नहीं देखना चाहती, पर मेरी यादें हैं कि पीछा नहीं छोड़तीं। या कहूं कि मैं ही उन्हें छोड़ना नहीं चाहती। और छोडूं भी क्यों, वो मेरे दौर की निधि हैं। मेरी धरोहर हैं। और चाहे किस्से-कहानियों के रूप में ही सही, यह धरोहर अगली पीढ़ी तक पहुंचेगी ज़रूर। 
-माधवी

(दैनिक भास्कर की पत्रिका 'अहा ज़िंदगी' के विशेष वार्षिक अंक 2011 में प्रकाशित
)

11 comments:

  1. 'अहा! जिंदगी' के वार्षिक विशेषांक में इसे पढ़ा था। यहां देखकर खुशी हुई। यूँ लगा कि लेखक तो अपने घर के हैं। आपका लिखा और पढ़ने को मिलेगा जानकर खुशी हुई।
    ..यादों की यह धरोहर अगली पीढ़ी तक पहुंचाने के लिए आपके योगदान प्रशंसनीय है।..आभार इस सुंदर लेख के लिए।

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  2. कितनी अच्छी अच्छी प्यारी यादें हैं...:)

    आपके बचपन की तो बात रहने दीजिए, जब मैं अपने बचपन की बातें बताता हूँ आज के बच्चों को तो वो उसमे भी ताज्जुब करते हैं!!

    और यादों से पीछा छुड़ाना कैसा, मैं तो यादों को पकड़े रखता हूँ..कहीं दूर जाने ही नहीं देता! :)

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  3. यादों की टमटम में बैठ हाँ भी घूम आए अपने बचपन में .... लगता है की हमारे ज़माने के बच्चों का बचपन एक सा ही रहा है ..बहुत सुन्दर प्रस्तुति

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  4. बेहतरीन और सार्थक पोस्ट.....

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  5. तख्ती,मुल्तानी मिट्टी, सरकंडे की कलम से लेकर चाचा चौधरी फ़ौलादी सिंह राजन इकबाल, घर से लेकर फ़्लैट तक काफ़ी कुछ समेंट दिया आपने पोस्ट में। सब चलचित्र सा घूम रहा है आंखों के सामने से।

    साधुवाद साधुवाद

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  6. अहा! क्या दिन थे.. अब यादों में ही जीते हैं..

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  7. बहुत आभार... आप सभी का!

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  8. Bahut sundar...loved it Madhavi...Koshish karti hun ki apne bachhon ko jitna sambhav hai, aisa jeevan de sakun.

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  9. muskra rhi hun.teen article pdh chuki.isliye bhi aur 'guleri' pdhkr bhi.unki fan hain ya koi sambandh hai ??? achchha likhti ho.aha!zindagi pdhti hun pr naam pr dhyan nhi gaya.:)
    blog priwar se ho..........apni hi ho.:)

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  10. Ati sundar. Aisa lag raha hai jaise mera bachpan meri aankhon ke aage ghum gaya ho. Sach hi to hai ye baten ab kisse kahaniyon ki tarah hi lagte hain. Main aaj bhi jab apne mayke jati hun to un jagahon par jarur jati hun jahan mera bachpan bita tha.

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