(शिमला, मसूरी, नैनीताल, ऊटी, डलहौज़ी, दार्जीलिंग, खज्जियार, कुल्लू, मनाली, श्रीनगर... ये कुछ नाम हैं जो ज़हन में आते हैं जब किसी हिल स्टेशन पर जाकर छुट्टियां बिताने की बात हो। लेकिन इन बड़े-बड़े नामों के अलावा भी कुछ पहाड़ी इलाके हैं जिनका बहुत कम ज़िक्र होता है, ऐसे इलाके जो न सिर्फ़ आबो-हवा बल्कि भोजन, कला व संस्कृति के लिहाज़ से भी ख़ास हैं। इन्हीं में से एक है सापूतारा। कम भीड़ और सुक़ून-भरी इस जगह पर आकर लगता है कि हम एक सदी पीछे चले गए हों।)
मुंबई से हम अलस्सुबह गुजरात एक्सप्रेस से बिलीमोरा स्टेशन के लिए रवाना हुए। हमारे पास तीन ही दिन थे और यह पूरा समय हम प्रकृति के सान्निध्य में बिताना चाहते थे। साढ़े तीन घंटे बाद हम बिलीमोरा जंक्शन पर थे। बिलीमोरा गुजरात के नवसारी ज़िले में है और सापूतारा यहां से 113 किलोमीटर की दूरी पर है। बिलीमोरा से सापूतारा के लिए नैरोगेज लाइन है, जो वघई स्टेशन तक जाती है। लेकिन बिलीमोरा के मुख्य रेलवे स्टेशन पर एक सज्जन ने हमें टॉय ट्रेन न पकड़ने की सलाह दी क्योंकि वो वघई तक पहुंचने में काफी वक़्त ले लेती है। अब सापूतारा जाने के लिए हमारे पास सिर्फ़ बस या टैक्सी का विकल्प बचा था। टैक्सी के बजाय हमने बस का इंतज़ार करना मुनासिब समझा। लेकिन काफी देर बाद भी सापूतारा के लिए कोई बस नहीं मिली तो सब्र जवाब देने लगा। एक बस आई लेकिन वो भी वांसदा तक की थी। हम उसमें चढ़े और वांसदा उतरकर सापूतारा के लिए दूसरी बस ले ली। सापूतारा पहुंचे तो शाम के चार बजे चुके थे। आर्टिस्ट विलेज पहुंचकर कहीं जाने की इच्छा नहीं हुई।
मुंबई से हम अलस्सुबह गुजरात एक्सप्रेस से बिलीमोरा स्टेशन के लिए रवाना हुए। हमारे पास तीन ही दिन थे और यह पूरा समय हम प्रकृति के सान्निध्य में बिताना चाहते थे। साढ़े तीन घंटे बाद हम बिलीमोरा जंक्शन पर थे। बिलीमोरा गुजरात के नवसारी ज़िले में है और सापूतारा यहां से 113 किलोमीटर की दूरी पर है। बिलीमोरा से सापूतारा के लिए नैरोगेज लाइन है, जो वघई स्टेशन तक जाती है। लेकिन बिलीमोरा के मुख्य रेलवे स्टेशन पर एक सज्जन ने हमें टॉय ट्रेन न पकड़ने की सलाह दी क्योंकि वो वघई तक पहुंचने में काफी वक़्त ले लेती है। अब सापूतारा जाने के लिए हमारे पास सिर्फ़ बस या टैक्सी का विकल्प बचा था। टैक्सी के बजाय हमने बस का इंतज़ार करना मुनासिब समझा। लेकिन काफी देर बाद भी सापूतारा के लिए कोई बस नहीं मिली तो सब्र जवाब देने लगा। एक बस आई लेकिन वो भी वांसदा तक की थी। हम उसमें चढ़े और वांसदा उतरकर सापूतारा के लिए दूसरी बस ले ली। सापूतारा पहुंचे तो शाम के चार बजे चुके थे। आर्टिस्ट विलेज पहुंचकर कहीं जाने की इच्छा नहीं हुई।
अगली सुबह गुनगुनी धूप ने हमारा स्वागत किया। गुलाबी ठंड और साफ-सुथरी हवा के बीच तरो-ताज़ा महसूस हो रहा था। नाश्ते के बाद हम घूमने निकल पड़े।
डांग ज़िले में सहयाद्रि पर्वत श्रृंखला से घिरा एक छोटा-सा कस्बा है सापूतारा, जिसकी शोभा में चार चांद लगाती है झील। झील के आस-पास कुछ होटल हैं। सूरत-नासिक हाईवे से जुड़े होने के कारण यहां चहल-पहल रहती है, जो सप्ताहांत में बढ़ जाती है। हाईवे के किनारे खाने-पीने के कई स्टॉल हैं जो देर रात तक खुले रहते हैं। यहां कोई घर या बंगला देखने को नहीं मिला। कुछ दफ़्तर, होटल और व्यवसायिक केन्द्र हैं लेकिन रिहायश नहीं है। करीब तीन किलोमीटर दूर मालेगांव है। यह आदिवासी बहुल क्षेत्र है और सापूतारा में छोटे-मोटे काम करने वाले ज़्यादातर लोग इसी गांव से हैं।
सापूतारा की आबो-हवा ऐसी है कि यहां से लौटने का मन नहीं करता। हर हिल स्टेशन की तरह यहां भी बहुत सारे पॉइंट हैं, जैसे सनराइज़, सनसेट और सुसाइड पॉइंट। खड़ी चढ़ाई के बाद हम एक सपाट मैदान पर पहुंचे तो पता चला कि यह टेबल पॉइंट था, जो कुछ अलग-सा लगा। लगा, जैसे क़ुदरत ने कोई बड़ी मेज़ लाकर यहां रख दी हो। यहीं ‘चुलबुल पाण्डे’ से मिलने का मौक़ा भी मिला। मैं किसी फ़िल्मी चरित्र की नहीं बल्कि रेगिस्तान के हीरो की बात कर रही हूं। चुलबुल उस ऊंट का नाम था जिस पर बैठकर हमने टेबल पॉइंट का चक्कर लगाया।
‘पुष्पक’ पर एक शाम
टेबल पॉइंट के पास ही पुष्पक रोपवे है लेकिन पुष्पक की सवारी आसान नहीं, इसके लिए लंबी लाइन में लगना पड़ता है। दो घंटे कतार में खड़े रहने के बाद हमें पुष्पक में बैठने का अवसर मिला। धीरे-से सरकने वाली ट्रॉली देखते-ही-देखते हवा से बातें करने लगी। आसमान में झूलते हुए कांच की खिड़की से सापूतारा को देखने का अनुभव अलग ही है। कहते हैं सीता को हरने के बाद रावण पुष्पक विमान में ही लंका गया था। पुष्पक रोपवे में बैठे ऐसा लग रहा था जैसे हमें भी कोई चुराकर अपने साथ दूर गगन में लिए जा रहा हो। सापूतारा का विहंगम नज़ारा देखकर दिल नहीं भरा कि चक्कर पूरा हो गया। फिर लाइन में लगने की हिम्मत नहीं थी तो हम वापस लौट आए। सापूतारा में सैलानियों के लिए 'पुष्पक' मुख्य आकर्षण है। यह होटल वेती का निजी रोपवे है। आसमान की सैर के बाद हमने सापूतारा झील में नौकायन का आनन्द लिया। यहां हर तरह की नौकाएं हैं... पैडल से चलने वाली, चप्पू से चलने वाली, दो सीटों वाली और परिवार के लिए बड़ी नौका भी। झील के पिछली तरफ मधुमक्खी पालन केन्द्र है। यहां से ताज़ा शहद ख़रीद सकते हैं। पास ही एक संग्रहालय है, छुट्टी में बंद होने के कारण हम उसे नहीं देख पाए।
‘पुष्पक’ पर एक शाम
टेबल पॉइंट के पास ही पुष्पक रोपवे है लेकिन पुष्पक की सवारी आसान नहीं, इसके लिए लंबी लाइन में लगना पड़ता है। दो घंटे कतार में खड़े रहने के बाद हमें पुष्पक में बैठने का अवसर मिला। धीरे-से सरकने वाली ट्रॉली देखते-ही-देखते हवा से बातें करने लगी। आसमान में झूलते हुए कांच की खिड़की से सापूतारा को देखने का अनुभव अलग ही है। कहते हैं सीता को हरने के बाद रावण पुष्पक विमान में ही लंका गया था। पुष्पक रोपवे में बैठे ऐसा लग रहा था जैसे हमें भी कोई चुराकर अपने साथ दूर गगन में लिए जा रहा हो। सापूतारा का विहंगम नज़ारा देखकर दिल नहीं भरा कि चक्कर पूरा हो गया। फिर लाइन में लगने की हिम्मत नहीं थी तो हम वापस लौट आए। सापूतारा में सैलानियों के लिए 'पुष्पक' मुख्य आकर्षण है। यह होटल वेती का निजी रोपवे है। आसमान की सैर के बाद हमने सापूतारा झील में नौकायन का आनन्द लिया। यहां हर तरह की नौकाएं हैं... पैडल से चलने वाली, चप्पू से चलने वाली, दो सीटों वाली और परिवार के लिए बड़ी नौका भी। झील के पिछली तरफ मधुमक्खी पालन केन्द्र है। यहां से ताज़ा शहद ख़रीद सकते हैं। पास ही एक संग्रहालय है, छुट्टी में बंद होने के कारण हम उसे नहीं देख पाए।
अलग है काठियावाड़ी खाने का स्वाद
अगर आपने काठियावाड़ी खाना नहीं खाया है तो आप कुछ खो रहे हैं। इस खाने का स्वाद एक बार स्वाद-ग्रंथियों तक पहुंच जाए तो फिर भुलाना आसान नहीं, क्योंकि यह आम भारतीय खाने से काफी अलग है। इसका ज़ायका तो अलग है ही, पकाने का तरीका भी जुदा है। काठियावाड़ी खाना बनाने के लिए पारंपरिक विधि उपयोग में लाई जाती है। खाना पकाने में ज़्यादातर लकड़ी की आग का इस्तेमाल होता है। रोटी बनाने के लिए मिट्टी की ‘तवड़ी’ है। तड़के में है... प्याज़, टमाटर और खूब सारे मसालों के साथ तेल व लहसुन का ज़बरदस्त मेल! मसालों की सुगंध और देसी ख़ूशबू के साथ लिपटा स्वादिष्ट भोजन... जो किसी के मुंह में भी पानी लाने के लिए काफी है... है न? हां, यदि आप सादा भोजन पसंद करने वाले हैं या सेहत के फिक्रमंद हैं तो काठियावाड़ी भोजन थोड़ा गरिष्ठ हो सकता है। लेकिन इतना लज़्ज़तदार खाना छोड़ना समझदारी नहीं है और कभी-कभार इसे खा लेने में कोई हर्ज़ भी नहीं! यही सोचकर हमने तीन दिन तक काठियावाड़ी खाने का भरपूर स्वाद लिया। हाईवे के किनारे कई रेस्तरां हैं जहां कम दाम में ठेठ काठियावाड़ी खाने का मज़ा लिया जा सकता है।
ज़रूर चखें
लसनिया बटाका (लहसुनी आलू), उड़द की दाल, भरेला रींगना (भरवां बैंगन) या रींगना भर्थो (बैंगन का भुर्था)... इन व्यंजनों का स्वाद लाजवाब है, जिसे दूना करने के लिए है- सफेद गुड़ व घी के साथ परोसे जाने वाला बाजरना रोटला। आप सोच रहे होंगे कि बाजरना रोटला क्या है! यह है बाजरे की रोटी, जिसे इस अंचल में बड़े शौक से खाया जाता है। रोटी के अलावा काठियावाड़ी मसाला खिचड़ी है। और हां, वघेरला दही (दही तड़का), फरसाण (नमकीन भुजिया), पापड़, तली हुई हरी मिर्च व कांदा (प्याज़) तो खाने के साथ है ही!
...और आर्टिस्ट विलेज
...और आर्टिस्ट विलेज
सापूतारा बस स्टैण्ड से पैदल दूरी पर है गांधर्वपुर आर्टिस्ट विलेज, विज्ञापनों की होड़ और चमक-दमक से दूर। अगर आप यहां सड़क चलते हुए किसी शख़्स से आर्टिस्ट विलेज के बारे में पूछें तो वो शायद ही इसका पता बता पाए। बस-स्टैण्ड से नासिक रोड वाले हाईवे की बाईं तरफ एक छोटी सड़क है जो आर्टिस्ट विलेज की ओर जाती है। बाहर से देखने पर यह शांत, अलसाई हुई जगह लगती है लेकिन अंदर दाख़िल होते ही यक़ीन हो जाता है कि यह कोई आम जगह नहीं बल्कि कला प्रेमियों का ठिकाना है। यहां हम सूर्या गोस्वामी और चन्द्रकान्त परमार से मिले, जिन्होंने दिल खोलकर हमारा इस्तकबाल किया। ये दोनों दोस्त हैं और आर्टिस्ट विलेज के कर्ता-धर्ता भी। बड़ौदा स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स से पढ़ाई के बाद दोनों ने फ़ैसला किया कि वे अपना जीवन कला को समर्पित करेंगे। 25 साल पहले शहर की चकाचौंध और नौकरी का मोह छोड़ इन्होंने सापूतारा में आर्टिस्ट विलेज की नींव रखी। बरसों की मेहनत व कला के प्रति विश्वास रंग लाया, और अब आर्टिस्ट विलेज में बाक़ायदा आर्ट कैम्प लगते हैं।
यहां कलाकारों के लिए स्टूडियो हैं जिनमें वो चित्र, हस्तशिल्प व मूर्तिशिल्प जैसी कलाओं के जौहर दिखाते हैं। फीस मामूली है, यही वजह है कि दूर-दूर से आए कलाकार यहां इत्मीनान से कला साधना करते हैं। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भी यह अच्छा केन्द्र है। ख़ास बात यह है कि आर्टिस्ट विलेज में स्थानीय आदिवासियों को हस्तकला दिखाने का भरपूर मौक़ा मिलता है। इतना ही नहीं, उनके हाथों से बना सामान यहां बेचने के लिए रखा जाता है। विलेज में लोगों के ठहरने की सुविधा भी है।
यहां कलाकारों के लिए स्टूडियो हैं जिनमें वो चित्र, हस्तशिल्प व मूर्तिशिल्प जैसी कलाओं के जौहर दिखाते हैं। फीस मामूली है, यही वजह है कि दूर-दूर से आए कलाकार यहां इत्मीनान से कला साधना करते हैं। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भी यह अच्छा केन्द्र है। ख़ास बात यह है कि आर्टिस्ट विलेज में स्थानीय आदिवासियों को हस्तकला दिखाने का भरपूर मौक़ा मिलता है। इतना ही नहीं, उनके हाथों से बना सामान यहां बेचने के लिए रखा जाता है। विलेज में लोगों के ठहरने की सुविधा भी है।
कुछ ख़ास
सापूतारा के प्राकृतिक सौंदर्य को अप्रतिम नहीं कहा जा सकता लेकिन इसकी अपनी विशेषताएं हैं। पहली बात यह कि सापूतारा को गुजरात का इकलौता हिल स्टेशन होने का गौरव प्राप्त है। दूसरा, यह इलाका भील, डांग और वारली जैसी जनजातियों का बसेरा है। वैसे वारली से कुछ याद आया आपको? जी हां, यह वही जनजाति है जिसने दुनिया भर में मशहूर वारली चित्रकला शैली को जन्म दिया है। आप किसी भी वारली चित्र में इस जनजाति के सरल जीवन की झलक देख सकते हैं। वारली चित्र अमूमन पिसे हुए चावलों की लेई से बनते हैं और उनमें महिलाएं, पुरुष, पेड़ और पक्षी शामिल होते हैं।
यहां एक और कला का ज़िक्र लाज़िमी है। सापूतारा में आख़िरी शाम हमें वो कला देखने को मिली, जिसके बिना हमारी यात्रा अधूरी रहती। हम रात का खाना खाकर लौट रहे थे कि कानों में शहनाई और ढोलक की मद्धम आवाज़ घुलने लगी। आवाज़ कहीं दूर से आ रही थी, जिसके पीछे-पीछे चलते हुए हम आ पहुंचे एक होटल के लॉन में। यहां जो नज़ारा देखने को मिला वो अद्भुत था। भील जनजाति का एक दल हमारे सामने मस्ती से थिरक रहा था। यह डांगी नृत्य था, जिसमें महिलाओं व पुरुषों की संख्या लगभग बराबर रहती है। डांगी नृत्य की ख़ासियत है कि इसमें नाच के साथ-साथ करतब भी ख़ूब होते हैं। ढोलक की थाप और शहनाई के सुर के साथ क़दमताल मिलाते हुए भील ऐसे नाच रहे थे जैसे किसी उत्सव में शरीक़ हों। महिलाओं के बनिस्बत पुरुषों ने ज़्यादा चमकीले वस्त्र पहने हुए थे। जोश से भरा लेकिन सधा हुआ वो नाच हमें मदहोश कर देने के लिए काफी था। लोकधुनों पर लुभावना नृत्य चलता रहा और हम अपलक उसे देखते रहे। तंद्रा तब टूटी जब आस-पास तालियों की गड़गड़ाहट होने लगी। हमने भी तालियों के साथ आदिवासियों का शुक्रिया अदा किया उस शानदार प्रदर्शन के लिए। हमारी सापूतारा यात्रा का आगाज़ बहुत अच्छा नहीं था लेकिन कहते हैं कि अंत भला तो सब भला।
कहीं भी जाने का प्रोग्राम हो, उस जगह के बारे में पहले इंटरनेट पर जानकारी ले लेना बेहतर है। बेशक़, लेकिन कई दफ़ा इंटरनेट से मिली मदद अधूरी होती है या फिर फ़ायदेमंद साबित नहीं होती। इंटरनेट खंगालिए ज़रूर, लेकिन इससे मिली हर जानकारी पर आंख मूंद कर भरोसा करने के लिए नहीं। मसलन, अगर आप इंटरनेट पर सापूतारा के लिए नज़दीकी रेलवे स्टेशन ढूंढते हैं तो वो बिलीमोरा है; वहां से आगे दो रास्ते हैं... एक नेरोगेज लाइन जो वघई स्टेशन तक है, वघई से बस या टैक्सी से सापूतारा पहुंच सकते हैं। दूसरा है... बिलीमोरा स्टेशन से सापूतारा के लिए सीधा सड़क मार्ग। मज़े की बात है कि ज़्यादातर वेबसाइटों पर यही सुझाव मिलता है, यहां तक कि गुजरात टूरिज़्म की साईट पर भी। लेकिन सापूतारा पहुंचने के बाद हमें पता चला कि वहां पहुंचने के लिए नासिक वाला रास्ता ज़्यादा अच्छा है। असल में सापूतारा के लिए नासिक रोड सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन है। यहां से सापूतारा सिर्फ़ 70 किलोमीटर दूर है, बस या टैक्सी लेकर आसानी से पहुंच सकते हैं। यह रास्ता सुविधाजनक है और कम समय लेने वाला भी।
कब व कहां
मानसून में जाएं। बारिश में सापूतारा की छटा देख मन बाग-बाग होना तय है। सापूतारा के आसपास कई झरने हैं। ख़ासतौर पर गिरा जलप्रपात, जो यहां से क़रीब 52 किलोमीटर दूर है। इसके मोहपाश में बंधे बिना आप नहीं रह पाएंगे।
सापूतारा में कई होटल हैं लेकिन हो सकता है कि पीक सीज़न में वो आपके बजट के लिए मुफ़ीद न रहें। कम किराए और बेहतर सुविधा के लिए गुजरात टूरिज़्म का तोरण हिल रिज़ॉर्ट है। लेकिन इसके लिए आपको बुकिंग काफी पहले करानी होगी। मालेगांव में भी रुक सकते हैं। आदिवासियों के साथ रहना निश्चित रूप से एक अलग अनुभव होगा।
सनद रहे...
1. नज़दीकी रेलवे स्टेशन नासिक रोड है।
2. नासिक से नियमित बसें हैं जो दो घंटे में सापूतारा पहुंचा देती हैं।
3. इस इलाक़े में सांप ज़्यादा हैं इसलिए सुनसान जगह पर घूमते हुए सावधानी बरतें।
4. आर्टिस्ट विलेज से आदिवासी हस्तशिल्प की चीज़ें ख़रीद सकते हैं।
5. आर्टिस्ट विलेज में कैम्प के लिए सूर्या गोस्वामी से बात कर सकते हैं। फोन नंबर है- +919426555809
6. एटीएम न होने के कारण समस्या हो सकती है, इसलिए ज़रूरत के मुताबिक नक़दी साथ लेकर चलें।
7. सापूतारा के आस-पास घूमने लायक कई जगह हैं। बच्चे साथ हों तो वांसदा नेशनल पार्क जा सकते हैं।
8. नज़दीकी एयरपोर्ट सूरत है, सापूतारा यहां से 165 किलोमीटर दूर है।
(दैनिक जागरण के 'यात्रा' परिशिष्ट में 27 नवम्बर 2011 को प्रकाशित)