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Monday, February 20, 2012

यात्रा से लौटकर

(थाईलैंड की यात्रा से लौटकर एक कविता,
साथ में एडवर्ड मुंच की 'गर्ल ऑन द बीच')

यात्रा से लौटती हूं 
तो कई दिनों तक 
अस्त-व्यस्त रहता है घर

एक-एक कर अटैची से
बाहर आता है सामान
अपनी पुरानी जगह 
ले लेने के लिए 

कुछ सुखद स्मृतियां 
और 
सघन अनुभव भी 
निकलते हैं 

सामान सहेजती 
हर बार यही सोचती हूं 
यात्राएं कैसे परिष्कृत कर देती हैं 
मनुष्य को भीतर से 

निर्रथक व नगण्य 
लगने लगता है बहुत कुछ 
दृष्टि बदल देता है 
जीवन के प्रति नया कोण 

एक यात्रा से लौट 
मैं दूसरी यात्रा पर 
निकल जाना चाहती हूं। 

('जनसंदेश टाइम्स' में 1 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

Sunday, February 5, 2012

यात्रा से पहले

(यात्रा पर एक कविता, हेनरी मातीस की तस्वीर 
'वूमन विद ए हैट' के साथ)

यात्रा और आत्महत्या से पहले
जहां तक हो सके 

छोड़ना चाहिए सब साफ़
दर्ज है
यात्रा की
किसी किताब में

आत्महत्या कायर करता है
यात्रा साहसी का काम है
और
साफ़ है सब-कुछ
पहले ही

एक अनंत यात्रा से पहले
एक और यात्रा
एक लंबी यात्रा से पहले
एक छोटी यात्रा

मन
कब का गया
श्यामदेश की यात्रा पर
देह सामान बटोर रही है


('जनसंदेश टाइम्स' में 1 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

Saturday, January 21, 2012

पर घर न छूटे

(यात्रा से जुड़ी अदम्य इच्छाओं पर एक कविता, 
साथ में साल्वाडोर डाली का चित्र) 
अनगिन लालसाएं 
अनगिन यात्राओं की 

न कोई पर्वत छूटे 
न जंगल 
न दरिया 
न पठार 

बियाबान छूटे 
सागर 
न रेत 
न तलछट 

न दर्रा छूटे कोई
न कंदरा 
न घाटी 
न आकाश 

न उत्तर छूटे 
न दक्षिण 
न पूरब 
न पश्चिम 

न रंगीनी छूटे 
न वीरानगी 
न आनगी छूटे 
न रवानगी 

अनगिन लालसाएं 
अनगिन यात्राओं की 
कि धरती का 
कोई छोर छूटे 

पर घर न छूटे 
यह संभव कहां! 

('जनसंदेश टाइम्स' में 1 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

Monday, January 9, 2012

स्मृतियों में पहाड़

(कांगड़ा-धर्मशाला में बर्फ़बारी हुई है और मैं यहां मुंबई में तस्वीरें देख-देख चहक रही हूं. फिलहाल कोई दूसरा विकल्प है भी नहीं. बचपन में बड़े-बड़े ओले पड़ते हुए कई बार देखे वहां, लेकिन बर्फ़ 35 साल बाद गिरी है. काश, इस नज़ारे का लुत्फ़ ले पाती! मिसिंग दैट व्हाइट चार्म!!)
 
धौलाधार की पहाड़ियों पर 
बर्फ़ झरी है बरसों बाद 
और कई सौ मील दूर 
स्मृतियों में 
पहाड़ जीवंत हो उठे हैं 

कहीं भी जाओ 
पीछा नहीं छोड़ते पहाड़ 
संग चलते हैं 
जीवन भर  

वही हिम
वही उजास
वही उल्लास

स्मृतियों में उदात्त पहाड़
स्मृतियों में धवल चांदनी
स्मृतियों में निरभ्र शांति 

मैं संतृप्त रहने की चेष्टा में हूं 
स्मृतियों का शोर जारी है। 

('जनसंदेश टाइम्स' में 1 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

Monday, July 4, 2011

उधेड़बुन

छत पर कोने में
टंगी मकड़ी 
देखती रही मुझे 
और मैं उसे 

किसी उधेड़बुन में 
रहे देर तक दोनों 

अन्तर बस इतना 
वो बुन रही थी जाल 
और मैं जीवन। 
-माधवी

Monday, May 16, 2011

उठो जलपरी


उठो जलपरी
डर है
बन न जाओ
तुम प्रस्तर
एक दिन


उठो जलपरी
डर है
हो न जाओ
तुम भग्न
एक दिन


उठो जलपरी
डर है
मिल न जाओ
तुम रेत में
एक दिन


उठो जलपरी
चलो
हो जाएं हम
सदा के लिए

जलमग्न
!
-माधवी 

(तस्वीर तिरुवनंतपुरम से श्याम सुंदर जी के सौजन्य से)

Tuesday, April 19, 2011

हर सुबह देखती हूं

 
हर दिन
बेकल रात को 
बुनती हूं 
इक नया सपना

कुछ सपने सदाबहार हैं 
तितली कोई पकड़कर
बंद करना हौले से मुट्ठी
या उड़ते जाना अविराम 
मीलों ऊपर, दिशाहीन

हर सुबह देखती हूं 
हथेली पर बिखरे 
तितलियों के वो 
रंग अनगिन 
और 
रंग देती हूं तुम्हें

हर सुबह देखती हूं 
हथेली पर ठहरा वो 
आकाश अनन्त 
और 
भर लेती हूं उड़ान 
लिए साथ तुम्हें। 

('जनसंदेश टाइम्स' में 1 अप्रैल 2012 को प्रकाशित)

Tuesday, March 15, 2011

और अपना एक कमरा

कुछ लिखने का मन है
और लिखने के लिए जो असबाब चाहिए
सब है मेरे पास

आराम से इतराता हुआ दिन
विचारावेश से घिरा दिमाग
उथल-पुथल भरा एक दिल

कलम,
कागज़
ज़हीन
ख़याल
बेशुमार दौलत शब्दों की 
अदद आराम कुर्सी भी
 

और मन:स्थिति 
कि लिख सकूं कुछ
अच्छा, अनवरत
 

सब है मेरे पास 
नहीं है बस
ढेर सारा पैस

और एक
अपना कमरा
-माधवी

(वर्जीनिया वूल्फ को समर्पित)

Wednesday, March 2, 2011

एक कविता की मौत

बिलख रही हूं मैं
एक कविता की मौत पर
जन्म लेने से ठीक पहले
दम तोड़ दिया जिसने
अभी-अभी
मेरी कोख में।
-माधवी

Saturday, February 12, 2011

क्योंकि तुम हो

मेरा अथ तुम हो
मेरी इति भी तुम

उल्लास हो, यौवन हो
मेरे चिर-आनन्द का
स्रोत हो तुम

हमक़दम, मेरे गुरूर हो
मर्यादा मेरी
सुरूर हो तुम

प्राण हो, मेरे गान हो
हस्ती हो मेरी
सरपरस्ती भी तुम

जड़ हो, मेरी ज़मीं हो
मेरे आसमां का
ध्रुव तारा हो तुम।
-माधवी 

(For my soulmate, on his birthday)

Thursday, January 27, 2011

वक़्त-वक़्त की बात

सपनीली सुबह 
कभी उनींदी है 
तो कभी 
चटख, मुस्तैद भी

दोपहरी धूप
देह पर दमके कांसे-सी
तो कभी
सिकोड़ देती है पोर-पोर भी 

ढलती सांझ 
लगती रूमानी बेतरह
तो कभी
बेमानी-सी भी

रात स्याह
गुज़रे नीम बेहोशी में
तो कभी
लगाती फिरती है गश्त भी 

आसमां रहता है एक
बदल जाती हैं बस 
खिड़कियां ही।
-माधवी

Sunday, January 23, 2011

अपने साथ

दुर्लभ होते हैं ऐसे पल
सब होता है जब
एकान्त से भरा और
नितान्त निजी

कोई नहीं दिखता आस-पास
पथरीली चुप्पी के सिवा
मैं होती हूं केवल
अपने साथ
वक़्त गुज़ारती हुई

बिखरने लगते हैं मोह-तंतु
टूट-टूट कर जब 
बेतरह अकेला
भीतर का कोई अंश
गर्भनाल तोड़ 
आ बैठता है सामने

और मैं 
और अलमस्त हो जाती हूं
-माधवी

Monday, January 10, 2011

कल की कविता

आने वाले कल के ख़याल
बेचैन करते हैं 
आज को

कल की परवाह 
उठाती है सर
और बौना-सा बन आज
दुबक जाता है किसी
कोने में जाकर

कल की तदबीरें
बेमानी हैं आज के लिए 
वजूद लिए अपना आज
भटकता है 
दर-ब-दर

कल के चक्र में
फंसकर आज 
तोड़ता है दम
थक-हार कर 

कल का इंतज़ार? 
गुज़र जाएंगे आज 
कल, परसों
और फिर बरसों 
लेकिन 
कल नहीं आएगा।
-माधवी

Saturday, December 25, 2010

एक और स्याह दिन

(पेशानी पर हल्की सलवटें, चेहरे पर साफगोई, सूती कुर्ता-पायजामा, और आंखों में चमक.. साल 2007 की शुरुआत में डॉक्टर बिनायक सेन से मुलाक़ात हुई थी, रायपुर, छत्तीसगढ़ में। उस वक़्त यह भान नहीं था कि मैं इतने बड़े समाजसेवी और डॉक्टर से मिल रही हूं। यह भी नहीं पता था कि मानव अधिकारों की रक्षा में जुटे इस मसीहा को एक दिन सलाख़ों के पीछे डाल दिया जाएगा। बस, उन्हें यह कहते हुए सुना था कि नक़्सली समस्या शांतिपूर्ण तरीक़े से सुलझ सकती है- बातचीत और समझौते की बिनह पर। यह कहकर वे मुस्कुराए और चल दिए। सौम्य-सी वो मुस्कान याद आ रही है। और खून खौल रहा है यह सुनकर कि डॉक्टर सेन को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है। यह जानकर कि उन पर देशद्रोह का आरोप है।)

आज का दिन
काला दिन है
एक और मसीह को
घसीट ले जाया गया है सलीब तक

इशारा मिलते ही ठोक दी जाएंगी
उसकी हथेलियों पर कीलें
ताकि उठें न वो हाथ कभी
ग़रीब की मदद के लिए

ठोक दी जाएंगी कीलें
उसके पैरों पर
ताकि चल न सके वह दूर तक
किसी मक़सद के साथ

एक और कील ठोकी जाएगी
गले में 
ताकि ख़ामोश पड़े आवाज़ 
और 
चिर निद्रा में चला जाए वो

आज का दिन काला ही नहीं
शर्मनाक भी है।
-माधवी

Monday, December 20, 2010

विरह की कविता

स्लेट की मेहराब वाला
लकड़ी का घर
हो गया है अब
मकान आलीशान
सुविधाओं से संपन्न
पर
सुक़ून से कोसों परे 

जर्द हो गया है बरगद
आग़ोश में जिसके
गुज़रा बचपन
जवानी और 
जेठ की कई दोपहरें 

तोड़ दिया है दम
गुच्छेदार फूलों से
लदे अमलतास  ने 
सुनहली चादर से 
ढक लेता था जो आंगन
कभी-कभी
मेरे अंधेरों को भी 

उदास रहती है
ब्यास नदी 
बिना कश्ती के 
लांघ लिया है उसे
किसी पुरपेच पुल ने 

मेरा घर, मेरा गांव
मेरा नहीं रहा
मैं भी अब
मैं कहां रही! 

(वागर्थ के अगस्त 2011 अंक में प्रकाशित, चित्र दीपांजना मंडल से साभार)

Thursday, December 2, 2010

रोटी और कविता

मुझे नहीं पता
आटे-दाल का भाव
इन दिनों 

नहीं जानती
ख़त्म हो चुका है घर में 
नमक, मिर्च, तेल और
दूसरा ज़रूरी सामान 

रसोईघर में पैर रख 
राशन नहीं
सोचती हूं सिर्फ़
कविता 

आटा गूंधते-गूंधते
गुंधने लगता है कुछ भीतर
गीला, सूखा, लसलसा-सा 

चूल्हे पर रखते ही तवा 
ऊष्मा से भर उठता है मस्तिष्क 

बेलती हूं रोटियां
नाप-तोल, गोलाई के साथ
विचार भी लेने लगते हैं आकार 

होता है शुरू रोटियों के
सिकने का सिलसिला
शब्द भी सिकते हैं धीरे-धीरे 

देखती हूं यंत्रवत्
रोटियों की उलट-पलट
उनका उफान 

आख़िरी रोटी के फूलने तक
कविता भी हो जाती है
पककर तैयार।

(वागर्थ के अगस्त 2011 अंक में प्रकाशित)

Saturday, November 13, 2010

मुश्किलें हज़ार हैं

लिखने को बहुत कुछ था
लिखने बैठी तो कुछ नहीं

है मुश्किल 
खटखटाते रहना
दरवाज़े उलझे मन के
परत-दर-परत 
बेधड़क

है मुश्किल
जवाब न मिलने पर
घुस जाना ज़बरन 
निकालना ख़यालों की
दो-चार क़तरन 
और चिपका देना 
किसी सफ़्हे पर 
साफ़गोई से

है मुश्किल
बेतरतीब, बेअदब लफ्ज़ों को
समझा-बुझाकर 
सभ्य बनाना और 
पहना देना ख़याली जामा
नफ़ासत के साथ

है मुश्किल
बनाना क़ाबिल
उस क़तरे को इतना
कि हर्फ़ों में सिमटा 
लांघ जाए वो
वक़्त, मुल्क और 
सरहदों को

है मुश्किल लिखना 
उससे भी मुश्किल है
लिखना ख़ुद को

मुश्किलें हज़ार हैं
कोशिशें पुरज़ोर। 

('लमही' के अप्रैल-जून 2011 अंक में प्रकाशित)

Saturday, October 16, 2010

कुछ हाइकु

1.
सिमट गई
बर्फ की रजाई में
शरद ऋतु

2.

चला कोहरा
जाने किस दिशा में
लिए मन को

3.
पहन लिया
चिनार ने भी चोला
बसंत में

4.
मां का पहलू
जाड़े की धूप जैसा
नर्म-ओ-गर्म

5.
ठिठका हुआ
बादल उड़ गया
बरस कर

6.
चलता रहे
दरिया की तरह
जीवन चक्र 

(हिमाचल मित्र के ग्रीष्म अंक 2011 में प्रकाशित)

Friday, October 8, 2010

खुली हुई खिड़की

अंधेरा पसरा हुआ है
खिड़की के बाहर
घुप्प...

बियाबान है पूरी पहाड़ी
मद्धम एक लौ
दूर वीराने से निकल
खेल रही है आंख-मिचौली 

यहां-वहां भटक रही
नन्ही मशालों पर
जा अटकी हैं बोझिल नज़रें 
जाने किस तलाश में है 
टोली जुगनुओं की? 

बेसुर कुछ आवाज़ें
तिलचट्टे और झींगुर की
चीरे जा रही हैं
तलहटी में बिखरे सन्नाटे को 

टिमटिमाते तारों ने
ओढ़ लिया है बादलों का लिहाफ़
और
हवा के थपेड़ों से
झूलने लगा है कमरे से सटा 
देवदार का दरख़्त 

मैं खिड़की बंद कर लेती हूं
...
...
भीतर एक शोर था
सन्नाटे में डूबकर
शांत हो गया है जो।
-माधवी 

('लमही' के अप्रैल-जून 2011 अंक में प्रकाशित)

Saturday, August 7, 2010

कोई-कोई दिन

कोई-कोई दिन कितना
अलसाया हुआ होता है
सुस्त, निठल्ला
नाकाम-सा

लेकिन मैं
कुछ न करते हुए भी
काम कर रही होती हूं 

जैसे 
बिस्तर पर लेटे
करवटें बदलना
कई सौ बार

यादों की पैरहन उधेड़ 
सिल लेना उसमें 
ख़ुद को 

अरसा पुराने ख़्वाबों को
नए डिज़ाइन में
बुनने की कोशिश करना 

फैंटेसी फ्लाइट में
बिना सीट बैल्ट के
बैठना
हिचकोले खाना जमकर
टाइम-अप के डर से
फिर
नीचे उतर आना

ज़हन में कुलबुलाते
उच्छृंखल विचारों पर 
नकेल डालना ताकि 
सब-कुछ बना रहे 
ऐसा ही
ख़ूबसूरत

बहुत सारे काम बाकी हैं 
और आंखें उनींदी हो चली हैं 
शाम का धुंधलका भी 
छा गया है बाहर। 
-माधवी
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