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Thursday, July 9, 2015

सोऽहम्

(परसों, 7 जुलाई को गुलेरी जी की 132वीं जयंती थी. परदादा को याद करते हुए 
यहां उनकी एक व्यंग्यात्मक कविता, जो 'सरस्वती' पत्रिका में साल 1907 में प्रकाशित हुई थी.)
करके हम भी बी. ए. पास
हैं अब ज़िलाधीश के दास
पाते हैं दो बार पचास
बढ़ने की रखते हैं आस

ख़ुश हैं मेरे साहिब मुझ पर
मैं जाता हूं नित उनके घर
मुफ़्त कई सरकारी नौकर
रहते हैं अपने घर हाज़िर

पढ़कर गोरों के अख़बार
हुए हमारे अटल विचार 
अंग्रेज़ी में इनका सार
करते हैं हम सदा प्रचार

वतन हमारा है दो-आब
जिसका जग में नहीं जवाब
बनते-बनते जहां अजाब
बन जाता है असल सवाब

ऐसा ठाठ अजूबा पाकर
करें किसी का क्यों मन में डर
खाते-पीते हैं हम जी भर
बिछा हुआ रखते हैं बिस्तर 

हमें जाति की ज़रा न चाह
नहीं देश की भी परवाह
हो जावे सब भले तबाह
हम जावेंगे अपनी राह।

-चंद्रधर शर्मा गुलेरी

Monday, July 7, 2014

गुलेरी जी की 131वीं जयंती पर

हिंदी कथाजगत में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी एक ऐसे कथाकार हुए जो कुछ ही कहानियां लिखकर अमर हो गए। उनकी कहानियां आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं जितनी अपने समय में रहीं। कथा साहित्य को गुलेरी जी ने नई दिशा और आयाम प्रदान किए। वह उच्च कोटि के निबंधकार और प्रखर समालोचक भी थे। 
गुलेरी जी के पूर्वज मूलत: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा ज़िले के गुलेर के निवासी थे। इनके पिता पंडित शिवराम शास्त्री आजीविका के सिलसिले में जयपुर चले गए। गुलेरी जी का जन्म 7 जुलाई, 1883 को हुआ था। अपनी मां लक्ष्मी के प्रति गुलेरी जी सदैव श्रद्धावनत रहे। उनकी ख्याति प्रकांड विद्वान के रूप में थी। संस्कृत, पाली, प्राकृत, हिंदी, बांग्ला, अंग्रेज़ी, लैटिन और फ्रेंच भाषाओं पर उनकी अच्छी पकड़ थी।  
सन् 1904 में गुलेरी जी अजमेर के मेयो कॉलेज में अध्यापक भी रहे। अध्यापक के रूप में उनका बड़ा मान-सम्मान था। अपने शिष्यों में वह लोकप्रिय तो थे ही, अनुशासन और नियमों का भी वह सख्ती से अनुपालन करते थे। उनकी असाधारण योग्यता से प्रभावित होकर पंडित मदनमोहन मालवीय ने उन्हें बनारस बुलाया और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर का पद दिलाया।
गुलेरी जी कवि भी थे
, यह बहुत कम लोग जानते हैं। एशिया की विजय दशमी’, ‘भारत की जय’, ‘अहिताग्नि’, ‘झुकी कमान’, ‘स्वागत’, ‘ईश्वर से प्रार्थनाऔर सुनीतिइनकी कतिपय श्रेष्ठ कविताएं हैं। ये रचनाएं गुलेरी विषयक संपादित ग्रंथों में संकलित हैं। उनकी खड़ी बोली की कविताओं में राष्ट्रीय जागरण और उद्बोधन का स्वर अधिक मुखर हुआ है। अपनी रचनाओं में उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य की कटु आलोचना की थी। 

उन्होंने साहित्य की सभी विधाओं में जमकर लिखा है, मगर उन्हें ख्याति कथाकार के रूप में मिली। उनकी लिखी तीन कहानियां ही प्रामाणिक हैं- सुखमय जीवन’, ‘बुद्धू का कांटातथा उसने कहा था। इन तीनों में उसने कहा थासर्वाधिक चर्चित हुई। यह कहानी सन् 1915 में सरस्वतीपत्रिका में छपी थी। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इस कहानी की प्रशंसा करते हुए अपनी इतिहास की पुस्तक में लिखा है- ‘‘घटना उसकी ऐसी है जैसी बराबर हुआ करती है, पर उसके भीतर से प्रेम का एक स्वर्गीय स्वरूप झांक रहा है। केवल झांक रहा है, निर्लज्जता के साथ पुकार या कराह नहीं रहा। इसकी घटनाएं ही बोल रही हैं, पात्रों के बोलने की अपेक्षा नहीं।" 
गुलेरी जी की कहानियों की सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि वह युग से आगे बढ़कर अपनी कहानियों में रोमांस और सेक्स को ले आए। उस आदर्शवादी युग में इस प्रकार का वर्णन समाज को स्वीकार्य नहीं था, परंतु वह सेक्स के नाम पर झिझकने वाले पंडितों में से नहीं थे। उन्होंने जीवन के यथार्थ का खुलकर वर्णन किया।
जिन दिनों हिंदी कहानी घुटनों के बल सरक रही थी,
गुलेरी जी की कहानियां पांव के बल चलकर चौकड़ी भरने में समर्थ थीं। उन्होंने अनुपम कलापूर्ण कहानियां लिखकर युग को प्रेरित और गतिमान किया। वह बहुमुखी प्रतिभा के धनी और हिंदी कथा-साहित्य के मसीहा थे। ऐसे बहुमुखी प्रतिभा संपन्न साहित्यकार का 39 वर्ष की अल्पायु में 12 सितंबर 1922 को काशी में निधन हो गया। 

(पंजाब केसरी से साभार)

Sunday, February 2, 2014

सौ साल पहले उसने कहा था

('उसने कहा था' कहानी पर बनी फ़िल्म का एक पोस्टर)
पांचवीं कक्षा में थी जब मुझे पहली बार उसने कहा था कहानी पढ़ने को दी गई, तब केवल यह पता था कि यह कहानी मेरे परदादा पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने लिखी है। फिर दो-तीन साल बाद दूरदर्शन पर उसने कहा था फ़िल्म देखने का अवसर मिला। फिर कई बार कहानी पढ़ी और हर बार इससे एक नई समझ और नई दृष्टि मिली।
उसके बाद उसने कहा था और गुलेरी जी की शेष रचनाओं को पढ़ने का जो सिलसिला चला, वो आज तक जारी है। उसने कहा था इतनी बार पढ़ी है कि उसके किरदार परिवार का हिस्सा लगते हैं। किसी कहानी का इस तरह गहरे प्रभावित कर जाना कम होता है। यह भी कमाल की बात है कि 100 साल पहले लिखी गई किसी कहानी का आकर्षण और प्रासंगिकता आज भी कायम है। उसने कहा था मेरे लिए मात्र एक कहानी नहीं, जीती-जागती कलाकृति है। 

(अमर उजाला के 'धरोहर' कॉलम में 2 फरवरी 2014 को प्रकाशित)

Sunday, July 7, 2013

गुलेरी जयंती पर विशेष

(साहित्य के पुरोधा पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की आज 130वीं जयंती है। गुलेरी जी की रचनाओं के बारे में इतना सब लिखा, पढ़ा व सुना जा चुका है कि कुछ और कहना सूरज को दीया दिखाने समान है। दो साल पहले पैतृक घर गुलेर जाना हुआ तो मैं गुलेरी जी की निजी डायरी अपने साथ मुंबई ले आई थी। यह वह डायरी है जिसे गुलेरी जी के पौत्र यानी मेरे पिता डॉ. विद्याधर शर्मा गुलेरी अपनी सबसे बड़ी संपत्ति मानते थे। परदादा जी की डायरी पढ़ते हुए उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानने का सौभाग्य मुझे मिला, वहीं उनके अपने शब्दों में उनका परिचय पाकर मैं अभिभूत हो उठी। इसे हिन्दी-साहित्य का दुर्भाग्य माना जाना चाहिए कि पाठकवर्ग गुलेरी जी की उन अधिकांश रचनाओं से वंचित रहा है, जो वे 39 वर्ष की अल्पायु में लिखकर चले गए। प्रतिभापुत्र गुलेरी जी मुख्यतया उसने कहा था कहानी से साहित्य-प्रेमियों में अपनी पहचान रखते हैं, लेकिन कहानी लेखन के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी उनका योगदान अप्रतिम है। भाषा एवं साहित्य से इतर दर्शन, इतिहास, पुरातत्व, धर्म, ज्योतिष, पत्रकारिता व मनोविज्ञान जैसे अनेक विषयों पर गुलेरी जी की गहरी पैठ थी। गुलेरी जी के रचनाकर्म को पाठक अच्छे से जान पाएं, इस कामना के साथ उनका यह लेख, जो मूल अंग्रेजी से अनूदित है।)
गुलेरी जी अपने शब्दों में
मैं पंजाब प्रांत के काँगड़ा जिले में गुलेर नामक ग्राम निवासी सारस्वत ब्राह्मणों के सम्मान्य कुल का वंशज हूँ। ज्योतिष के विद्वान और पंचांग विद्या के कर्ता के रूप में मेरे प्रपितामह की प्रसिद्धि उन दिनों में पटियाला और बनारस तक फैली हुई थी। हमारे वंश के लोग माफी और जागीर की भूमि का उपभोग करते हैं और हम इतिहास-प्रसिद्ध गुलेर के राजा कटोच क्षत्रियों के मुख्य पुरोहित और गुरु हैं। गुलेर के राजा ने मेरे पिताजी को गुरु के रूप में पालकी, गद्दी और ताजीम का सम्मान प्रदान किया था और उनके बाद मुझे भी वही प्रतिष्ठा प्राप्त है।
मेरे पिता पंडित शिवरामजी, अपने समय में बनारस के विशिष्ट संस्कृत विद्वान माने जाते थे और जयपुर के स्वर्गीय महाराजा रामसिंह जी बहादुर ने अपने दरबार के राजपंडित पद के लिए उनका चयन किया था। वे जयपुर दरबार के वरिष्ठ पंडित थे और लगभग 48 वर्ष तक जयपुर के संस्कृत कॉलेज में उपाध्यक्ष एवं संस्कृत, व्याकरण, भाषा विज्ञान और वेदान्त, दर्शन के आचार्य पर प्रतिष्ठित रहे। स्वर्गीय एवं वर्तमान महाराजा तथा समाज के सभी वर्गों के लोगों से प्रखर पाण्डित्य तथा निर्मल चरित्र के कारण उनको महान समादर प्राप्त था। वे जयपुर में संस्कृत अध्ययन के आद्य प्रवर्तकों में थे और उनकी शिष्य मण्डली में देश के बहुत से प्रसिद्ध पंडित हैं तथा तीन को तो भारत सरकार द्वारा महामहोपाध्याय का सम्मान भी प्राप्त हो चुका है।
मेरा जन्म जयपुर में ही हुआ और मैंने महाराज कॉलेज में शिक्षा पाई। स्कूल व कॉलेज की सभी कक्षाओं में मैं सर्वोच्च स्थान एवं पारितोषिक पाता रहा। मैंने माध्यमिक परीक्षा 1897 ई. में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1899 ई. में मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एण्ट्रेन्स परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और विश्वविद्यालय की इस परीक्षा के वरिष्ठता क्रम में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। जयपुर राज्य में शिक्षा के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व अवसर था। अत: महाराजा साहिब बहादुर की ओर से सार्वजनिक शिक्षा विभाग द्वारा मुझे स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। साथ ही, मैंने उसी वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1901 ई. में मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रथम वर्ष कला परीक्षा में द्वितीय श्रेणी प्राप्त करके उत्तीर्ण हुआ। इस परीक्षा में अंग्रेजी के अतिरिक्त मेरे विषय तुर्क, ग्रीक और रोमन इतिहास, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, संस्कृत और सामान्य एवं उच्चतर गणित रहे थे। इसके साथ ही मैंने हिन्दी में मौलिक रचना प्रस्तुत करके वैकल्पिक परीक्षा में सफलता प्राप्त की। मेरे एक आचार्य द्वारा मेरे नाम लिखे गये पत्र के उद्धरण से ज्ञात होगा कि मैंने कलकत्ता के सभी परीक्षार्थियों में अंग्रेजी गद्य-लेखन में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था।
विद्यार्थी अवस्था में ही स्वर्गीय कर्नल स्विन्टन जैकब और कैप्टन ए.एफ. गैरट आर.ई.एम. ने मुझे जयपुरस्थ ज्योतिष यंत्रालय के यंत्रोद्धार के निमित्त सहायक के रूप में चुन लिया था। कठिन एवं मौलिक कार्य में मैंने जो सहायता की, उसमें मेरी सफलता को प्रमाणित करते हुए राज्य की ओर से मुझे 200 रु. का पारितोषिक प्रदान किया गया। इसके लिए ऊपरिलिखित दोनों महानुभावों ने जो संलग्न प्रमाणपत्र प्रदान किए हैं, वे साक्षीभूत हैं।
अंग्रेजी, मानसिक एवं नैतिक विज्ञान और संस्कृत विषय लेकर मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1903 ई. में बी.ए. परीक्षा पास की और विश्वविद्यालय के सफल परीक्षार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। जयपुर के महाराजा कॉलेज अथवा राजपूताना के किसी भी कॉलेज से कोई भी परीक्षार्थी अब तक ऐसी सफलता प्राप्त नहीं कर सका था। अत: इन शिक्षालयों के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना थी। राज्य की ओर से मुझे पुन: स्वर्णपदक और 300 रु. के मूल्य की पुस्तकें प्रदान करके पुरस्कृत किया गया। उस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने के नाते मैंने नॉर्थ ब्रुक स्वर्णपदक भी प्राप्त किया।
मनोविज्ञान एवं कर्तव्यशास्त्र विषय लेकर मैंने एम.ए. उपाधि के लिए परीक्षा के निमित्त आवश्यकता से भी अधिक अध्ययन किया परन्तु स्वास्थ्य की गड़बड़ी ने मुझे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया।
संस्कृत के विश्रुत विद्वान अपने पिताजी से कई वर्षों तक स्वतंत्र रूप से अध्ययन करने का असाधारण सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था। मैं संस्कृत बहुत अच्छी तरह जानता हूँ और उच्चतर एवं मौलिक शोध को लक्ष्य में रखकर मैंने वैदिक, पौराणिक, साहित्यिक एवं वेदान्तक विषयक संस्कृत साहित्य के अंगों का विशिष्ट अध्ययन किया है। मैंने संस्कृत का आरम्भिक अध्ययन प्राचीन पद्धति से किया जो बहुत ठोस होता है। अंग्रेजी शिक्षा ने मुझे वह कसौटी प्रदान कर दी है जिसका कि पाश्चात्य विद्वान प्राचीन भाषा में संशोधन के उद्देश्य के लिए प्रयोग करते हैं।
मैंने इण्डियन एन्टीक्वेरी एवं अन्य संस्कृत और हिन्दी सावधिक पत्र-पत्रिकाओं को बहुत से विद्वतापूर्ण लेखों द्वारा योगदान दिया है। इण्डियन एन्टीक्वेरी में प्रकाशित मेरे लेखों की विशिष्ट प्राच्य विद्याविदों ने प्रशंसा की है। जब महामहिम ब्रिटिश सम्राट भारत आये तो मैंने उनके लिए संस्कृत में स्वागत गान की रचना की। सुप्रसिद्ध डच विद्वान डॉ. कैलेण्ड (उद्वेच निवासी) ने एतन्निमित्त मेरी बहुत प्रशंसा की। मैंने कतिपय आद्यावधि अप्रकाशित संस्कृत ग्रन्थों की समीक्षा एवं व्याख्यात्मक प्रस्तावना और टिप्पणियों सहित सम्पादन कार्य भी हाथ में लिया है। जयपुर राज्य द्वारा संचालित संस्कृतोपाधि की परीक्षाओं में मैं साहित्य, धर्मशास्त्र और व्याकरण विषयों का परीक्षक होता हूँ तथा राजपूताना मिडिल स्कूल और जयपुर मिडिल स्कूल परीक्षाओं में भी मुझे परीक्षक नियुक्त किया जाता है।
सन् 1904 ई. में कर्नल टी.सी. पियर्स, आई.ए. तत्कालीन रेजीडेन्ट जयपुर की सहमति से मुझे खेतड़ी के अल्पव्यस्क राजा का अभिभावक, अध्यापक नियुक्त किया गया। पियर्स साहब का कश्मीर से लिखा हुआ प्रशंसा-पत्र इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि मेरी कार्यप्रणाली के विषय में उनके मन में कैसी धारणा थी। जब जयपुर दरबार ने मेयो कॉलेज अजमेर के मोतमिद् (रियासत के सामन्तों और प्रशिक्षणार्थियों के अभिभावक) पद का स्तर ऊँचा करने का निर्णय किया तो 1907 ई. में इस पद के लिए मुझे चुना गया। यह चुनाव करते समय रियासत की स्टेट कौंसिल के सचिव ने रेजीडेन्ट जयपुर के नाम यह पत्र लिखा था-
संख्या 2254
जयपुर, दिनांक 21 अक्टूबर, 1916
मेयो कॉलेज के मोतमिद् पद पर किसी अधिक योग्य व्यक्ति की नियुक्ति करके उसका स्तर बढ़ाने का प्रश्न कुछ समय से जयपुर दरबार के विचाराधीन है। अब कौंसिल ने राजा जी खेतड़ी के शिक्षक पं. चन्द्रधर गुलेरी बी.ए. को लाला मिट्ठन लाल के स्थान पर मेयो कॉलेज के मोतमिद् पद को ग्रहण करने के लिए चुना है। पं. चन्द्रधर गुलेरी एक बहुत ही योग्य व्यक्ति हैं और उन्होंने अपने कर्तव्यों का सम्यक पालन करते हुए प्रिंसिपल मेयो कॉलेज को सदैव सन्तुष्ट किया है और अब तक इस संस्था का बहुत कुछ अनुभव प्राप्त कर लिया है, अत: कौंसिल को विश्वास है कि इनकी नियुक्त के विषय में प्रिंसिपल मेयो कॉलेज, अजमेर की सहमति प्राप्त हो जायेगी।
मेयो कॉलेज में लगभग 15 वर्ष बहुत लंबे समय तक में विविध श्रेणियों को अवैतनिक रूप से विभिन्न विषय पढ़ाता रहा हूँ। तदन्तर सन् 1916 में मुझे महामहोपाध्याय पंडित शिवनारायण के स्थान पर हैड पंडित मेयो कॉलेज के पद पर नियुक्ति के लिए चुना गया और हिन्दी व संस्कृत का अध्यापन कार्य मुझे सौंपा गया। कक्षा में, छात्रावास में और क्रीड़ा-क्षेत्र में अपने विद्यार्थियों के मानसिक, नैतिक, बौद्धिक और शारीरिक विकास की दिशा में मैंने जिस परिणाम में और जिस स्तर पर कार्य किया है उसके विषय में प्रिंसिपल महोदय ही अपना मत दे सकते हैं कि वह उनके मनोनुकूल है या नहीं।
मैंने प्राचीन एवं आधुनिक गद्य तथा पद्यात्मक हिन्दी सहित्य का विशिष्ट अध्ययन किया है और पाली, प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं से इसके विकास के संबंध में भी अनुशीलन किया है। इतिहास और पुरातत्व विषयों में मेरी अभिरुचि है और अपने नाम से, बिना नाम के अथवा अन्य विद्वानों के साथ जो लेख आदि प्रकाशित किए हैं, वे सर्वनिवेदित हैं।
मैं हिन्दी का प्रसिद्ध लेखक हूँ और साहित्यिक जगत में आलोचक और विद्वान के रूप में मेरी ख्याति है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी की प्रबंधकारिणी परिषद् का मैं कई वर्षों तक सदस्य रहा हूँ। जयपुर के रेजीडेन्ट कर्नल शावर्स द्वारा लिखित नोट्स ऑन जयपुर’ पुस्तक में मेरा यथेष्ट योगदान है। युद्ध काल में मैंने सम्राट की सेनाओं की विजय के सम्बन्ध में एक संस्कृत प्रार्थना लिखी थी जो प्रति दिन विद्यालयों में दोहराई जाती थी। युद्धकाल में प्रिंसिपल मेयो कॉलेज पब्लिसिटी बोर्ड, अजमेर मेरवाड़ा बार गजट में हिन्दी संस्करण के सम्पादन में अकेले ही उनकी सहायता की थी और साथ ही अंग्रेजी संस्करण में भी लेख लिखता था। अजमेर मेरवाड़ा गजट के हिन्दी संस्करण की शैली और साहित्यिक स्तर का अपेक्षाकृत अधिक समादर था।
चन्द्रधर गुलेरी
जुलाई 8, 1917 


(दैनिक जागरण और दिव्य हिमाचल में क्रमश: 7 व 8 जुलाई, 2013 को प्रकाशित)

Saturday, July 7, 2012

परदादा को याद करते हुए

पुराने ज़माने में लोग आज के मुक़ाबले जल्दी विवाह बंधन में बंध जाते थे। ज़ाहिर है, लोग अपने पोते-पोतियों, यहां तक कि उनके बच्चों को देखकर दुनिया से विदा लेते थे। लेकिन गुलेरी जी न तो हमें देख पाए और न हम उन्हें। 39 वर्ष की अल्पायु में गुलेरी जी ने संसार त्याग दिया। लेकिन मुझे प्रतीत होता है कि वे भले ही सशरीर हमारे साथ नहीं हैं, उनकी देह हमें छोड़ गई है, लेकिन उनका प्रभामंडल और उनका वरदहस्त हमेशा हमारे परिवार पर रहा है। मेरे दादा योगेश्वर शर्मा गुलेरी उनके पुत्र के रूप में, मेरे पिता विद्याधर शर्मा गुलेरी उनके पौत्र के रूप में जाने जाते रहे.... मैं और मेरा बड़ा भाई विकास उनके प्रपौत्री और प्रपौत्र के रूप में। यह हमारे लिए गौरव की बात रही है। 
जब हम बच्चे कहानी सुनने-समझने लायक हुए तो उसने कहा था, बुद्धू का कांटा और सुखमय जीवन हमें घुट्टी की तरह पिलाई गई। यक़ीनन, बड़ी मीठी लगती थी यह घुट्टी! न जाने कितनी बार इन कालजयी रचनाओं को पढ़ा है और हर बार गुलेरी जी और उनकी विद्वत्ता अवचेतन में रहे हैं।
यूं तो गुलेरी जी की कार्यस्थली जयपुर रही, लेकिन उनका पैतृक आवास गुलेर गांव में है। चन्द्र भवन ...जो उनके नाम और रचनाकर्म से आलोकित है। जहां कालान्तर में मुझे भी पलने-बढ़ने और रहने का सौभाग्य मिला। गुलेरी जी से विरासत में बहुत कुछ पाया है। घर में उनके कई हस्तलिखित पत्र, पांडुलिपियां, तसवीरें, पोर्ट्रेट्स और उनके रोज़मर्रा के इस्तेमाल का सामान मिला है जो किसी धरोहर से कम नहीं।
एक वाक़या याद आ रहा है बचपन का... एक दफ़ा दिल्ली से एक बड़े लेखक हमारे घर, गुलेर आए। उस वक्त मैं बहुत छोटी थी। उनका नाम तो मुझे याद नहीं लेकिन उन्होंने घर आकर गुलेरी जी की तसवीरों, उनके पत्रों, उनकी वस्तुओं को बड़े मनोयोग से देखा। गुलेरी जी से मुत्तालिक बहुत-सी बातें कीं मां-पापा के साथ। जाते-जाते उन्होंने हमारे कच्चे घर को नमन किया और देहरी से मिट्टी उठाकर माथे पर लगाई। उस वक़्त मुझे एहसास हुआ कि गुलेरी परिवार में जन्म लेने का क्या महत्व है।
एक सुखद संयोग यह हुआ कि 1994 में हरिपुर में, जो गुलेर से दो किलोमीटर दूर है, गुलेरी जी के नाम पर एक कॉलेज की स्थापना हुई। श्री चन्द्रधर गुलेरी डिग्री महाविद्यालय... जहां मैंने बड़े गर्व से दाख़िला लिया। ग्रेजुएशन वहीं से की। उसके बाद पारिवारिक और व्यावसायिक बाध्यताओं के चलते मुझे दिल्ली जाना पड़ा। दिल्ली में आगे की पढ़ाई और फिर दूरदर्शन, सहारा समय जैसे न्यूज़ चैनलों के साथ काम किया। इस दौरान अपने पैतृक गांव और राज्य से तो नाता टूटा ही, साहित्य से भी नाता टूटता-सा लगा। क़रीब सात साल तक पत्रकारिता की नौकरी में जीवन यंत्रचालित ही रहा। गुलेरी जी की साहित्यिक परंपरा को पापा ने कुछ हद तक आगे बढ़ाने की कोशिश की थी। उन्होंने गुलेरी जी पर शोध किया, गुलेरी साहित्य शोध संस्थान की स्थापना की, कई किताबें लिखीं। लेकिन मैं थी कि चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रही थी।
2009 में मेरा विवाह हुआ और मैं मुंबई आ गई। शादी पर पतिदेव ने मुझे उसने कहा था फ़िल्म की डीवीडी तोहफ़े के रूप में दी। उन्हें भान था कि मेरे लिए इससे अनमोल और यादगार भेंट और कोई नहीं हो सकती। मुंबई आने के बाद छह महीने तक वही न्यूज़ चैनल की मशीनी ज़िंदगी चलती रही। लेकिन एक दिन मन कड़ा करके उस ज़िंदगी को अलविदा कह दिया। इस्तीफ़े के बाद चिंतन-मनन का समय मिला तो लिखने-पढ़ने का सिलसिला भी फिर शुरू हुआ। लेकिन इस बार यह लेखन किसी चैनल की मांग पर नहीं बल्कि नितांत मेरे अपने लिए था। शुरुआत कविता लेखन से हुई। फिर लेख-आलेख व संस्मरण लिखने शुरू किए जो प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे। 
मुंबई में ही कवि अनूप सेठी से मुलाक़ात हुई। अनूप जी के ज़रिए हिमाचल की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से मैं फिर वाबस्ता हुई, और अपनी जड़ों के प्रति मेरा प्रेम एक बार फिर हिलोरें लेने लगा। हाल में उन्होंने ‘हिमाचल मित्र’ के लिए गुलेरी वंश वृक्ष बनाने का आग्रह किया और यह ऐतिहासिक, ज़िम्मेदाराना काम करते हुए मैं फूली नहीं समाई।
फिलवक़्त उसने कहा था ब्लॉग का संचालन कर रही हूं, जो पूजनीय परदादा जी को समर्पित है। निकट भविष्य में गुलेरी जी पर एक वेबसाइट शुरू करने की योजना है। जितनी साहित्य रचना गुलेरी जी ने की, उसका अंशमात्र भी नहीं कर पाई हूं.... लेकिन कलम चल रही है तो लगता है कि कहीं-न-कहीं उनकी प्रपौत्री होने को जस्टीफाई कर पा रही हूं। उम्मीद है, और इच्छा भी कि कम-से-कम एक कहानी तो ऐसी लिखूं जो गुलेरी जी की कहानियों का आभास-मात्र ही पढ़ने वालों को दे जाए। 
-माधवी
(यह संस्मरण गुलेरी जयंती के अवसर पर फ़िल्मकार विवेक मोहन द्वारा शिमला में पढ़ा गया।)

Thursday, July 7, 2011

सुखमय जीवन

(पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की 128वीं जयंती पर उनकी कहानी 'सुखमय जीवन'... जो साल 1911 में 'भारत मित्र' में शाया हुई थी।) 

(1) 
परीक्षा देने के पीछे और उसका फल निकलने के पहले दिन किस बुरी तरह बीतते हैं, यह उन्हीं को मालूम है, जिन्हें उन्हें गिनने का अनुभव हुआ है। सुबह उठते ही परीक्षा से आज तक कितने दिन गए, यह गिनते हैं और फिर 'कहावती आठ हफ्ते' में कितने दिन घटते हैं, यह गिनते हैं। कभी-कभी उन आठ हफ्तों पर कितने दिन चढ़ गए, यह भी गिनना पड़ता है। खाने बैठे हैं और डाकिये के पैर की आहट आई- कलेजा मुंह को आया। मुहल्ले में तार का चपरासी आया कि हाथ-पांव कांपने लगे। न जागते चैन, न सोते-सुपने में भी यह दिखता है कि परीक्षक साहब आठ हफ्ते की लंबी छुरी लेकर छाती पर बैठे हुए हैं।
मेरा भी बुरा हाल था। एल-एल.बी. का फल अबकी और भी देर से निकलने को था- न मालूम क्या हो गया था, या तो कोई परीक्षक मर गया था, या उसको प्लेग हो गया था। उसके पर्चे किसी दूसरे के पास भेजे जाने को थे। बार-बार यही सोचता था कि प्रश्नपत्रों की जांच किए पीछे सारे परीक्षकों और रजिस्ट्रारों को भले ही प्लेग हो जाए, अभी तो दो हफ्ते माफ करें। नहीं तो परीक्षा के पहले ही उन सबको प्लेग क्यों न हो गया? रात-भर नींद नहीं आई थी, सिर घूम रहा था, अखबार पढ़ने बैठा कि देखता क्या हूं कि लिनोटाइप की मशीन ने चार-पांच पंक्तियां उल्‍टी छाप दी हैं। बस, अब नहीं सहा गया- सोचा कि घर से निकल चलो; बाहर ही कुछ जी बहलेगा। लोहे का घोड़ा उठाया कि चल दिए। 
तीन-चार मील जाने पर शांति मिली। हरे-हरे खेतों की हवा, कहीं पर चिड़ियों की चहचह और कहीं कुओं पर खेतों को सींचते हुए किसानों का सुरीला गाना, कहीं देवदार के पत्तों की सोंधी बास और कहीं उनमें हवा का सीं-सीं करके बजना- सबने मेरे चित्त को परीक्षा के भूत की सवारी से हटा लिया। बाइसिकिल भी गजब की चीज है। न दाना मांगे, न पानी, चलाए जाइए जहां तक पैरों में दम हो। सड़क में कोई था ही नहीं, कहीं-कहीं किसानों के लड़के और गांव के कुत्ते पीछे लग जाते थे। मैंने बाइसिकिल को और भी हवा कर दिया। सोचा कि मेरे घर सितारपुर से पंद्रह मील पर कालानगर है- वहां की मलाई की बरफ अच्छी होती है और वहीं मेरे मित्र रहते हैं, वे कुछ सनकी हैं। कहते हैं कि जिसे पहले देख लेंगे, उससे विवाह करेंगे। उनसे कोई विवाह की चर्चा करता है तो अपने सिद्धांत के मंडन का व्याख्यान देने लग जाते हैं। चलो, उन्हीं से सिर खाली करें।
खयाल-पर-खयाल बंधने लगा। उनके विवाह का इतिहास याद आया। उनके पिता कहते थे कि सेठ गनेशलाल की एकलौती बेटी से अबकी छुट्टियों में तुम्हारा ब्याह कर देंगे। पड़ोसी कहते थे कि सेठजी की लड़की कानी और मोटी है और आठ ही वर्ष की है। पिता कहते थे कि लोग जलकर ऐसी बातें उड़ाते हैं; और लड़की वैसी हो भी तो क्या, सेठजी के कोई लड़का है नहीं; बीस-तीस हजार का गहना देंगे। मित्र महाशय मेरे साथ-साथ डिबेटिंग क्लबों में बाल-विवाह और माता-पिता की जबरदस्ती पर इतने व्याख्यान झाड़ चुके थे कि अब मारे लज्जा के साथियों में मुंह नहीं दिखाते थे। क्योंकि पिताजी के सामने चीं करने की हिम्मत नहीं थी। व्यक्तिगत विचार से साधारण विचार उठने लगे। हिन्दू-समाज ही इतना सड़ा हुआ है कि हमारे उच्च विचार कुछ चल ही नहीं सकते। अकेला चला भाड़ नहीं फोड़ सकता। हमारे सद्विचार एक तरह के पशु हैं, जिनकी बलि माता-पिता की जिद और हठ की वेदी पर चढ़ाई जाती है। ...भारत का उद्धार तब तक नहीं हो सकता-।
 
फिस्‌स्‌स्‌! एकदम अर्श से फर्श पर गिर पड़े। बाइसिकिल की फूंक निकल गई। कभी गाड़ी नाव पर, कभी नाव गाड़ी पर। पंप साथ नहीं था और नीचे देखा तो जान पड़ा कि गांव के लड़कों ने सड़क पर ही कांटों की बाड़ लगाई है। उन्हें भी दो गालियां दीं पर उससे तो पंक्चर सुधरा नहीं। कहां तो भारत का उद्धार हो रहा था और कहां अब कालानगर तक इस चरखे को खैंच ले जाने की आपत्ति से कोई निस्तार नहीं दिखता। पास के मील के पत्थर पर देखा कि कालानगर यहां से सात मील है। दूसरे पत्थर के आते-आते मैं बेदम हो लिया था। धूप जेठ की, और कंकरीली सड़क, जिसमें लदी हुई बैलगाड़ियों की मार से छह-छह इंच शक्कर की-सी बारीक पिसी हुई सफेद मिट्टी बिछी हुई। काले पेटेंट लेदर के जूतों पर एक-एक इंच सफेद पॉलिश चढ़ गई। लाल मुंह को पोंछते-पोंछते रूमाल भीग गया और मेरा सारा आकार सभ्य विद्वान का-सा नहीं, वरन्‌ सड़क कूटने वाले मजदूर का-सा हो गया। सवारियों के हम लोग इतने गुलाम हो गए कि दो-तीन मील चलते ही छठी का दूध याद आने लगता है! 

(2)  
'बाबूजी, क्या बाइसिकिल में पंक्चर हो गया है?'
एक तो चश्मा, उस पर रेत की तह जमी हुई, उस पर ललाट से टपकती हुई पसीने की बूंदें, गर्मी की चिढ़ और काली रात की-सी लम्बी सड़क- मैंने देखा ही नहीं था कि दोनों ओर क्या है। यह शब्द सुनते ही सिर उठाया, तो देखा कि एक सोलह-सत्रह वर्ष की कन्या सड़क के किनारे खड़ी है।
 
''हां, हवा निकल गई है और पंक्चर भी हो गया है। पंप मेरे पास है नहीं। कालानगर कुछ बहुत दूर तो है ही नहीं- अभी जा पहुंचता हूं।''
अंत का वाक्य मैंने सिर्फ ऐंठ दिखाने के लिए कहा था। मेरा जी जानता था कि पांच मील, पांच सौ मील के-से दिख रहे थे।
 
"इस सूरत से तो आप कालानगर क्या कलकत्ते पहुंच जाएंगे। जरा भीतर चलिए, कुछ जल पीजिए। आपकी जीभ सूखकर तालू से चिपट गई होगी। चाचाजी की बाइसिकिल में पंप है और हमारा नौकर गोविंद पंक्चर सुधारना भी जानता है।''
"नहीं, नहीं- " 
"नहीं, नहीं, क्या, हां, हां!" 
यों कहकर बालिका ने मेरे हाथ से बाइसिकिल छीन ली और सड़क के एक तरफ हो ली। मैं भी उसके पीछे चला। देखा कि एक कंटीली बाड़ से घिरा बगीचा है, जिसमें एक बंगला है। यहीं पर कोई 'चाचाजी' रहते होंगे, परंतु यह बालिका कैसी- 
मैंने चश्मा रूमाल से पोंछा और उसका मुंह देखा। पारसी चाल की एक गुलाबी साड़ी के नीचे चिकने काले बालों से घिरा हुआ उसका मुखमंडल दमकता था और उसकी आंखें मेरी ओर कुछ दया, कुछ हंसी और कुछ विस्मय से देख रही थीं। बस, पाठक! ऐसी आंखें मैंने कभी नहीं देखी थीं। मानो वे मेरे कलेजे को घोलकर पी गईं। एक अद्भुत कोमल, शांत ज्योति उनमें से निकल रही थी। कभी एक तीर में मारा जाना सुना है? कभी एक निगाह में हृदय बेचना पड़ा है? कभी तारामैत्रक और चक्षुमैत्री नाम आए हैं? मैंने एक सेकंड में सोचा और निश्चय कर लिया कि ऐसी सुंदर आंखें त्रिलोकी में न होंगी और यदि किसी स्त्री की आंखों को प्रेम-बुद्धि से कभी देखूंगा तो इन्हीं को।
"आप सितारपुर से आए हैं। आपका नाम क्या है?" 
"मैं जयदेवशरण वर्मा हूं। आपके चाचाजी-" 
"ओ-हो, बाबू जयदेवशरण वर्मा, बी.ए.; जिन्होंने 'सुखमय जीवन' लिखा है! मेरा बड़ा सौभाग्य है कि आपके दर्शन हुए! मैंने आपकी पुस्तक पढ़ी है और चाचाजी तो उसकी प्रशंसा बिना किए एक दिन भी नहीं जाने देते। वे आपसे मिलकर बहुत प्रसन्न होंगे; बिना भोजन किए आपको न जाने देंगे और आपके ग्रंथ के पढ़ने से हमारा परिवार-सुख कितना बढ़ा है, इस पर कम से कम दो घंटे तक व्याख्यान देंगे।" 
स्त्री के सामने उसके नैहर की बड़ाई कर दें और लेखक के सामने उसके ग्रंथ की। यह प्रिय बनने का अमोघ मंत्र है। जिस साल मैंने बी.ए. पास किया था उस साल कुछ दिन लिखने की धुन उठी थी। लॉ कॉलेज के फर्स्ट ईयर में सेक्शन और कोड की परवाह न करके एक 'सुखमय जीवन' नामक पोथी लिख चुका था। समालोचकों ने आड़े हाथों लिया था और वर्ष-भर में सत्रह प्रतियां बिकी थीं। आज मेरी कदर हुई कि कोई उसका सराहने वाला तो मिला। 
इतने में हम लोग बरामदे में पहुंचे, जहां पर कनटोप पहने, पंजाबी ढंग की दाढ़ी रखे एक अधेड़ महाशय कुर्सी पर बैठे पुस्तक पढ़ रहे थे। बालिक बोली-
"चाचाजी, आज आपके बाबू जयदेवशरण वर्मा बी.ए. को साथ लाई हूं। इनकी बाइसिकिल बेकाम हो गई है। अपने प्रिय ग्रंथकार से मिलाने के लिए कमला को धन्यवाद मत दीजिए, दीजिए उनके पंप भूल आने को!" 
वृद्ध ने जल्दी ही चश्मा उतारा और दोनों हाथ बढ़ाकर मुझसे मिलने के लिए पैर बढ़ाए।
"कमला, जरा अपनी माता को तो बुला ला। आइए बाबू साहब, आइए। मुझे आपसे मिलने की बड़ी उत्कंठा थी। मैं गुलाबराय वर्मा हूं। पहले कमसेरियट में हेड क्लर्क था। अब पेंशन लेकर इस एकांत स्थान में रहता हूं। दो गौ रखता हूं और कमला तथा उसके भाई प्रबोध को पढ़ाता हूं। मैं ब्रह्मसमाजी हूं; मेरे यहां परदा नहीं है। कमला ने हिंदी मिडिल पास कर लिया है। हमारा समय शास्त्रों के पढ़ने में बीतता है। मेरी धर्मपत्नी भोजन बनाती और कपड़े सी लेती है; मैं उपनिषद् और यागवासिष्ठ का तर्जुमा पढ़ा करता हूं। स्कूल में लड़के बिगड़ जाते हैं, प्रबोद को इसीलिए घर पर पढ़ाता हूं।" 
इतना परिचय दे चुकने पर वृद्ध ने श्वास लिया। मुझे इतना ज्ञान हुआ कि कमला के पिता मेरी जाति के ही हैं। जो कुछ उन्होंने कहा था, उसकी ओर मेरे कान नहीं थे- मेरे कान उधर थे, जिधर से माता को लेकर कमला आ रही थी। 
"आपका ग्रंथ बड़ा ही अपूर्व है। दांपत्य सुख चाहने वालों के लिए लाख रुपए से भी अनमोल है। धन्य है आपको! स्त्री को कैसे प्रसन्न रखना, घर में कलह कैसे नहीं होने देना, बाल-बच्चों को क्योंकर सच्चरित्र बनाना, इन सब बातों में आपके उपदेश पर चलने वाला पृथ्वी पर ही स्वर्ग-सुख भोग सकता है। पहले कमला की मां और मेरी कभी-कभी खटपट हो जाया करती थी। उसके खयाल अभी पुराने ढंग के हैं। पर जब से मैं रोज भोजन के पीछे उसे आध घंटे तक आपकी पुस्तक का पाठ सुनाने लगा हूं, तब से हमारा जीवन हिण्डोले की तरह झूलते-झलते बीतता है।" 
मुझे कमला की मां पर दया आई, जिसको वो कूड़ा-करकट रोज़ सुनना पड़ता होगा। मैंने सोचा कि हिंदी के पत्र-संपादकों में यह बूढ़ा क्यों न हुआ? यदि होता तो आज मेरी तूती बोलने लगती। 
"आपको गृहस्थ-जीवन का कितना अनुभव है! आप सब कुछ जानते हैं! भला, इतना ज्ञान कभी पुस्तकों में मिलता है? कमला की मां कहा करती थी कि आप केवल किताबों के कीड़े हैं, सुनी-सुनाई बातें लिख रहे हैं। मैं बार-बार यह कहता था कि इस पुस्तक के लिखने वाले को परिवार का खूब अनुभव है। धन्य है आपकी सहधर्मिणी! आपका और उसका जीवन कितने सुख से बीतता होगा! और जिन बालकों के आप पिता हैं, वे कैसे बड़भागी हैं कि सदा आपकी शिक्षा में रहते हैं; आप जैसे पिता का उदाहरण देखते हैं।" 
कहावत है कि वेश्या अपनी अवस्था कम दिखाना चाहती है और साधु अपनी अवस्था अधिक दिखाना चाहता है। भला, ग्रंथकार का पद इन दोनों में किसके समान है? मेरे मन में आई कि कह दूं कि अभी मेरा पचीसवां वर्ष चल रहा है, कहां का अनुभव और कहां का परिवार? फिर सोचा, ऐसा कहने से ही मैं वृद्ध महाशय की निगाहों से उतर जाऊंगा और कमला की मां सच्ची हो जाएगी कि बिना अनुभव के छोकरे ने गृहस्थ के कर्तव्य-धर्मों पर पुस्तक लिख मारी है। यह सोचकर मैं मुस्करा दिया और ऐसी तरह मुंह बनाने लगा कि वृद्ध समझा कि अवश्य मैं संसार-समुद्र में गोते मारकर नहाया हुआ हूं। 

(3) 
वृद्ध ने उस दिन मुझे जाने नहीं दिया। कमला की माता ने प्रीति के साथ भोजन कराया और कमला ने पान लाकर दिया। न मुझे अब कालानगर की मलाई की बरफ याद रही और न सनकी मित्र की। चाचाजी की बातों में फी सैकड़े सत्तर तो मेरी पुस्तक और उसके रामबाण लाभों की प्रशंसा थी, जिसको सुनते-सुनते मेरे कान दुख गए। फी सैकड़ा पचीस वह मेरी प्रशंसा और मेरे पति-जीवन और पितृ-जीवन की महिमा गा रहे थे। काम की बात बीसवां हिस्सा थी, जिससे मालूम पड़ा कि अभी कमला का विवाह नहीं हुआ, उसे अपनी फूलों की क्यारी को संभालने का बड़ा प्रेम है, वह 'सखी' के नाम से 'महिला-मनोहर' मासिक पत्र में लेख भी दिया करती है। 
सायंकाल को मैं बगीचे में टहलने निकला। देखता क्या हूं कि एक कोने में केले के झाड़ों के नीचे मोतिये और रजनीगंधा की क्यारियां हैं और कमला उनमें पानी दे रही है। मैंने सोचा कि यही समय है। आज मरना है या जीना है। उसको देखते ही मेरे हृदय में प्रेम की अग्नि जल उठी थी और दिन-भर वहां रहने से वह धधकने लग गई थी। दो ही पहर में मैं बालक से युवा हो गया था। अंगरेजी महाकाव्यों में, प्रेममय उपन्यासों में और कोर्स के संस्कृत नाटकों में जहां-जहां प्रेमिका-प्रेमी का वार्तालाप पढ़ा था, वहां-वहां का दृश्य स्मरण करके वहां-वहां के वाक्यों को घोख रहा था, पर यह निश्चय नहीं कर सका कि इतने थोड़े परिचय पर भी बात कैसे करनी चाहिए। अंत को अंगरेजी पढ़ने वाली धृष्टता ने आर्यकुमार की शालीनता पर विजय पाई और चपलता कहिए, बेसमझी कहिए, ढीठपन कहिए, पागलपन कहिए, मैंने दौड़कर कमला का हाथ पकड़ लिया। उसके चेहरे पर सुर्खी दौड़ गई और डोलची उसके हाथ से गिर पड़ी। मैं उसके कान में कहने लगा- 
"आपसे एक बात कहनी है।" 
"क्या? यहां कहने की कौन-सी बात है?" 
"जब से आपको देखा है तब से-" 
"बस, चुप करो। ऐसी धृष्टता!" 
अब मेरा वचन-प्रवाह उमड़ चुका था। मैं स्वयं नहीं जानता था कि मैं क्या कर रहा हूं, पर लगा बकने- "प्यारी कमला, तुम मुझे प्राणों से बढ़कर हो; प्यारी कमला, मुझे अपना भ्रमर बनने दो। मेरा जीवन तुम्हारे बिना मरुस्थल है, उसमें मंदाकिनी बनकर बहो। मेरे जलते हुए हृदय में अमृत की पट्टी बन जाओ। जब से तुम्हें देखा है, मेरा मन मेरे अधीन नहीं है। मैं तब तक शांति न पाऊंगा जब तक तुम-" 
कमला जोर से चीख उठी और बोली- "आपको ऐसी बातें कहते लज्जा नहीं आती? धिक्कार है आपकी शिक्षा को और धिक्कार है आपकी विद्या को! इसी को आपने सभ्यता मान रखा है कि अपरिचित कुमारी से एकांत ढूंढकर ऐसा घृणित प्रस्ताव करें। तुम्हारा यह साहस कैसे हो गया? तुमने मुझे क्या समझ रखा है? 'सुखमय जीवन' का लेखक और ऐसा घृणित चरित्र! चुल्लू-भर पानी में डूब मरो। अपना काला मुंह मत दिखाओ। अभी चाचाजी को बुलाती हूं।" 
मैं सुनता जा रहा था। क्या मैं स्वप्न देख रहा हूं? यह अग्नि-वर्षा मेरे किस अपराध पर? तो भी मैंने हाथ नहीं छोड़ा। कहने लगा,"सुनो कमला, यदि तुम्हारी कृपा हो जाए, तो सुखमय जीवन-" 
"देखा तेरा सुखमय जीवन! आस्तीन के सांप! पापात्मा!! मैंने साहित्य-सेवी जानकर और ऐसे उच्च विचारों का लेखक समझकर तुझे अपने घर में घुसने दिया और तेरा विश्वास और सत्कार किया था। *प्रच्छन्नपापिन्! *वकदाम्भिक! *बिड़ालव्रतिक! मैंने तेरी सारी बातें सुन ली हैं।" चाचाजी आकर लाल-लाल आंखें दिखाते हुए, क्रोध से कांपते हुए कहने लगे- "शैतान, तुझे यहां आकर मायाजाल फैलाने का स्थान मिला। ओफ! मैं तेरी पुस्तक से छला गया। पवित्र जीवन की प्रशंसा में फार्मों के फार्म काले करने वाले, तेरा ऐसा हृदय! कपटी! विष के घड़े-" 
उनका धाराप्रवाह बंद ही नहीं होता था, पर कमला की गालियां और थीं और चाचाजी की और। मैंने भी गुस्से में आकर कहा, "बाबू साहब, जबान संभालकर बोलिए। आपने अपनी कन्या को शिक्षा दी है और सभ्यता सिखाई है, मैंने भी शिक्षा पाई है और कुछ सभ्यता सीखी है। आप धर्म-सुधारक हैं। यदि मैं उसके गुण और रूपों पर आसक्त हो गया, तो अपना पवित्र प्रणय उसे क्यों न बताऊं? पुराने ढर्रे के पिता दुराग्रही होते सुने गए हैं। आपने क्यों सुधार का नाम लजाया है?" 
"तुम सुधार का नाम मत लो। तुम तो पापी हो। 'सुखमय जीवन' के कर्ता होकर-" 
"भाड़ में जाए 'सुखमय जीवन'! उसी के मारे नाकों दम है!! 'सुखमय जीवन' के कर्ता ने क्या शपथ खा ली है कि जनम-भर क्वांरा ही रहे? क्या उसके प्रेमभाव नहीं हो सकता? क्या उसमें हृदय नहीं होता?" 
"हें, जनम-भर क्वांरा?" 
"हें काहे की? मैं तो आपकी पुत्री से निवेदन कर रहा था कि जैसे उसने मेरा हृदय हर लिया है वैसे यदि अपना हाथ मुझे दे तो उसके साथ 'सुखमय जीवन' के उन आदर्शों को प्रत्यक्ष करूं, जो अभी तक मेरी कल्पना में हैं। पीछे हम दोनों आपकी आज्ञा मांगने आते। आप तो पहले ही दुर्वासा बन गए।" 
"तो आपका विवाह नहीं हुआ? आपकी पुस्तक से तो जान पड़ता है कि आप कई वर्षों के गृहस्थ-जीवन का अनुभव रखते हैं। तो कमला की माता ही सच्ची थीं।" 
इतनी बातें हुई थीं, पर न मालूम क्यों मैंने कमला का हाथ नहीं छोड़ा था। इतनी गर्मी के साथ शास्त्रार्थ हो चुका था, परंतु वह हाथ जो क्रोध के कारण लाल हो गया था, मेरे हाथ में ही पकड़ा हुआ था। अब उसमें सात्विक भाव का पसीना आ गया था और कमला ने लज्जा से आंखें नीची कर ली थीं। विवाह के पीछे कमला कहा करती है कि न मालूम विधाता की किस कला से उस समय मैंने तुम्हें झटककर अपना हाथ नहीं खैंच लिया। मैंने कमला के दोनों हाथ खैंचकर अपने हाथों के सम्पुट में ले लिए (और उसने उन्हें हटाया नहीं!) और इस तरह चारों हाथ जोड़कर वृद्ध से कहा- 
"चाचाजी, उस निकम्मी पोथी का नाम मत लीजिए। बेशक, कमला की मां सच्ची हैं। पुरुषों की अपेक्षा स्त्रियां अधिक पहचान कर सकती हैं कि कौन अनुभव की बातें कर रहा है और कौन गप्पे हांक रहा है। आपकी आज्ञा हो तो कमला और मैं दोनों सच्चे सुखमय जीवन का आरंभ करें। दस वर्ष पीछे मैं जो पोथी लिखूंगा, उसमें किताबी बातें न होंगी, केवल अनुभव की बातें होंगी।" 
वृद्ध ने जेब से रूमाल निकालकर चश्मा पोंछा और अपनी आंखें पोंछीं। आंखों पर कमला की माता की विजय होने के क्षोभ के आंसू थे, या घर बैठी पुत्री को योग्य पात्र मिलने के हर्ष के आंसू, राम जाने। 
उन्होंने मुस्कराकर कमला से कहा, "दोनों मेरे पीछे-पीछे चले आओ। कमला! तेरी मां ही सच कहती थी।" वृद्ध बंगले की ओर चलने लगे। उनकी पीठ फिरते ही कमला ने आंखें मूंदकर मेरे कंधे पर सिर रख दिया। 

*जिसके पाप ढके हुए हों
*बगुले की तरह छल करने वाला
*बिल्ली की तरह व्रत रखने वाला

Wednesday, July 7, 2010

उसने कहा था

पं चन्द्रधर शर्मा गुलेरी
                   (1883-1922)
   
(आज गुलेरी जयंती है। आज, 7 जुलाई को पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का जन्म हुआ था। गुलेरी जी हिन्दी कहानी के जनक माने जाते हैं। उन्होंने कई कहानियां लिखीं, मगर हिन्दी कथा के इतिहास में मील का पत्थर साबित हुई 'उसने कहा था'। सन् 1960 में निर्माता बिमल राय इसी नाम से मोनी भट्टाचार्य के निर्देशन में फ़िल्म बना चुके हैं, जिसमें सुनील दत्त और नंदा ने काम किया है। 
हिमाचल प्रदेश में कांगड़ा ज़िले के गुलेर गांव में गुलेरी जी का पैतृक आवास है। हिमाचल सरकार का भाषा एवं संस्कृति विभाग हर साल शिमला में गुलेरी जयंती का आयोजन करता है। पिता जी के साथ मुझे कई बार इस आयोजन में जाने का अवसर मिला। उनकी कालजयी रचना को यहां साझा कर रही हूं। ब्लॉग के माध्यम से गुलेरी जी को श्रद्धांजलि देने की छोटी-सी कोशिश भर है।)                                         

 (1)
बड़े-बड़े शहरों के इक्के-गाड़ी वालों की जबान के कोड़ों से जिनकी पीठ छिल गई है और कान पक गए हैं, उनसे हमारी प्रार्थना है कि अमृतसर के बम्बूकार्ट वालों की बोली का मरहम लगावें। जबकि बड़े शहरों की चौड़ी सड़कों पर घोड़े की पीठ चाबुक से धुनते हुए इक्के वाले कभी घोड़े की नानी से अपना निकट संबंध स्थिर करते हैं, कभी राह चलते पैदलों की आंखों के न होने पर तरस खाते हैं, कभी उनके पैरों की अंगुलियों के पोरे को चीथकर अपने ही को सताया हुआ बताते हैं और संसार-भर की ग्लानि, निराशा और क्षोभ के अवतार बने नाक की सीध चले जाते हैं, तब अमृतसर में उनकी बिरादरी वाले तंग चक्करदार गलियों में, हर-एक लड्ढी वाले के लिए ठहरकर, सब्र का समुद्र उमड़ा कर, ‘बचो, खालसाजी', 'हटो भाई जी', 'ठहरना भाई जी', 'आने दो लाला जी', 'हटो बा'छा' कहते हुए सफेद फेंटों, खच्चरों और बत्तकों, गन्ने और खोमचे और भारे वालों के जंगल में से राह खेते हैं। क्या मजाल है कि जी और साहब बिना सुने किसी को हटना पड़े। यह बात नहीं कि उनकी जीभ चलती ही नहीं; चलती है पर मीठी छुरी की तरह महीन मार करती हुई। यदि कोई बुढ़िया बार-बार चितौनी देने पर भी लीक से नहीं हटती, तो उनकी बचनावली के ये नमूने हैं- 
हट जा, जीणे जोगिए; हट जा, करमां वालिए; हट जा, पुत्तां प्यारिए; बच जा, लंबी वालिए। समष्टि में इसका अर्थ है कि तू जीने योग्य है, तू भाग्यों वाली है, पुत्रों को प्यारी है, लंबी उमर तेरे सामने है, तू क्यों मेरे पहिये के नीचे आना चाहती है? बच जा। 
ऐसे बम्बूकार्ट वालों के बीच में होकर एक लड़का और एक लड़की चौक की एक दुकान पर आ मिले। उसके बालों और इसके ढीले सुथने से जान पड़ता था कि दोनों सिख हैं। वह अपने मामा के केश धोने के लिए दही लेने आया था और यह रसोई के लिए बड़ियां। दुकानदार एक परदेसी से गुथ रहा था, जो सेर-भर गीले पापड़ों की गड्डी को गिने बिना हटता न था।
''तेरे घर कहां है?''
''मगरे में; और तेरे?''
''मांझे में, -यहां कहां रहती है?''
''अतरसिंह की बैठक में; वेह मेरे मामा होते हैं।''
''मैं भी मामा के आया हूं, उनका घर गुरु बजार में है।''
इतने में दुकानदार निबटा, और इनका सौदा देने लगा। सौदा लेकर दोनों साथ-साथ चले। कुछ दूर जा कर लड़के ने मुस्करा कर पूछा, ''तेरी कुड़माई हो गई?''
इस पर लड़की कुछ आंखें चढ़ा कर 'धत्' कह कर दौड़ गई और लड़का मुंह देखता रह गया।
दूसरे-तीसरे दिन सब्जीवाले के यहां या दूधवाले के यहां अकस्मात् दोनों मिल जाते। महीना-भर यही हाल रहा। दो-तीन बार लड़के ने फिर पूछा,
‘तेरी कुड़माई हो गई?’
और उत्तर में वही 'धत्' मिला। एक दिन जब फिर लड़के ने वैसे ही हंसी में चिढ़ाने के लिये पूछा तो लड़की, लड़के की संभावना के विरूद्ध बोली, ''हां, हो गई।''
''कब?''
''कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।'' लड़की भाग गई। लड़के ने घर की सीध ली। रास्ते में एक लड़के को मोरी में ढकेल दिया, एक छावड़ी वाले की दिन-भर की कमाई खोई, एक कुत्ते पर पत्थर मारा और एक गोभीवाले के ठेले में दूध उंडेल दिया। सामने नहाकर आती हुई किसी वैष्णवी से टकरा कर अंधे की उपाधि पाई। तब कहीं घर पहुंचा। 

(2)
“राम-राम, यह भी कोई लड़ाई है! दिन-रात खंदकों में बैठे हड्डियां अकड़ गईं। लुधियाना से दस गुना जाड़ा और मेंह और बरफ ऊपर से। पिंडलियों तक कीचड़ में धंसे हुए हैं। गनीम कहीं दिखता नहीं - घंटे-दो-घंटे में कान के परदे फाड़ने वाले धमाके के साथ सारी खंदक हिल जाती है और सौ-सौ गज धरती उछल पड़ी है।
इस गैबी गोले से बचे तो काई लड़ै। नगरकोट का जलजला सुना था, यहां दिन में पचीस जलजले होते हैं। जो कहीं खंदक से बाहर साफा या कुहनी निकल गई, तो चटाक् से गोली लगती है। न मालूम बेईमान मट्टी में लेटे हुए हैं या घास की पत्तियों में छिपे रहते हैं।”
“लहनासिंह, और तीन दिन हैं। चार तो खंदक में बिता ही दिये। परसों रिलीफ आ जायेगी और फिर सात दिन की छुट्टी। अपने हाथों झटका करेंगे और पेट-भर खाकर सो रहेंगे। उसी फरंगी मेम के बाग में- मखमल का-सा हरा घास है। फल और दूध की वर्षा कर देती है। लाख कहते हैं, दाम लेती नहीं। कहती है, तुम राजा हो, मेरे मुल्क को बचाने आये हो।”
“चार दिन तक एक पलक नींद नहीं मिली। बिना फेरे घोड़ा बिगड़ता है और बिना लड़े सिपाही। मुझे तो संगीन चढ़ाकर मार्च का हुकम मिल जाए। फिर सात जरमनों को अकेला मारकर न लौटूं तो मुझे दरबार साहब की देहली पर मत्था टेकना नसीब न हो। पाजी कहीं के, कलों के घोड़े - संगीन देखते ही मुंह फाड़ देते हैं, और पैर पकड़ने लगते हैं। यों अंधेरे में तीस-तीस मन का गोला फैंकते हैं। उस दिन धावा किया था - चार मील तक एक जर्मन नहीं छोडा था। पीछे जनरल ने हट आने का कमान दिया, नहीं तो...”
“नहीं तो सीधे बर्लिन पहुंच जाते! क्यों?” सूबेदार हजारासिंह ने मुस्कराकर कहा- “लड़ाई के मामले जमादार या नायक के चलाये नहीं चलते। बड़े अफसर दूर की सोचते हैं। तीन सौ मील का सामना है। एक तरफ बढ़ गए तो क्या होगा?”
“सूबेदार जी, सच है,” लहनसिंह बोला- “पर करें क्या? हड्डियों-हड्डियों में तो जाड़ा धंस गया है। सूर्य निकलता नहीं और खाई में दोनों तरफ से चंबे की बावलियों के-से सोते झर रहे हैं। एक धावा हो जाए तो गरमी आ जाए।”
“उदमी, उठ, सिगड़ी में कोले डाल। वजीरा, तुम चार जने बाल्टियां लेकर खाई का पानी बाहर फेंको। महासिंह, शाम हो गई है, खाई के दरवाजे का पहरा बदला दो।” कहते हुए सूबेदार खंदक में चक्कर लगाने लगे।
वजीरासिंह पलटन का विदूषक था। बाल्टी गंदला पानी भर कर खाई के बाहर फेंकता हुआ बोला- “मैं पाधा बन गया हूं। करो जर्मनी के बादशाह का तर्पण!” इस पर सब खिलखिला पड़े और उदासी के बादल फट गये।
लहनासिंह ने दूसरी बाल्टी उसके हाथ में भरकर देकर कहा - “अपनी बाड़ी के खरबूजों में पानी दो। ऐसा खाद का पानी पंजाब-भर में नहीं मिलेगा।”
“हां, देश क्या है, स्वर्ग है। मैं तो लड़ाई के बाद सरकार से दस घुमा जमीन यहां मांग लूंगा और फलों के बूटे लगाऊंगा।”
“लाड़ी होरां को भी यहां बुला लोगे? या वही दूध पिलाने वाली फरंगी मेम...”
“चुप कर। यहां वालों को शरम नहीं।”
“देस देस की चाल है। आज तक मैं उसे समझा न सका कि सिख तमाखू नहीं पीते। वह सिगरेट देने में हठ करती है, ओठों में लगाना चाहती है, और मैं पीछे हटता हूं तो समझती है कि राजा बुरा मान गया, अब मेरे मुल्क के लिये लड़ैगा नहीं।”
“अच्छा, अब बोधासिंह कैसा है?”
“अच्छा है।”
“जैसे मैं जानता ही न होऊं! रात-भर तुम अपने कंबल उसे उढ़ाते हो और आप सिगड़ी के सहारे गुजर करते हो। उसके पहरे पर आप पहरा दे आते हो। अपने सूखे लकड़ी क़े तख्तों पर उसे सुलाते हो, आप कीचड़ में पड़े रहते हो। कहीं तुम न मंदे पड़ जाना। जाड़ा क्या है, मौत है और 'निमोनिया' से मरने वालों को 'मुरब्बे' नहीं मिला करते।”
“मेरा डर मत करो। मैं तो बुलेल की खड्ड के किनारे मरूंगा। भाई कीरतसिंह की गोदी पर मेरा सिर होगा और मेरे हाथ के लगाये हुए आंगन के आम के पेड़ की छाया होगी।”
वजीरासिंह ने त्योरी चढ़ाकर कहा- “क्या मरने-मराने की बात लगाई है? मरें जर्मनी और तुरक! हां, भाइयो, कैसे-"
दिल्ली शहर तें पिशोर नुं जांदिए,
कर लेणा लौंगां दा बपार मड़िए;
कर लेणा नादेड़ा सौदा अड़िए --
(ओय) लाणा चटाका कदुए नुं।
कद्दू बणया वे मजेदार गोरिये,
हुण लाणा चटाका कदुए नुं।।
कौन जानता था कि दाढ़ियों वाले, घरबारी सिख ऐसा लुच्चों का गीत गाएंगे, पर सारी खंदक इस गीत से गूंज उठी और सिपाही फिर ताजा हो गये मानो चार दिन से सोते और मौज ही करते रहे हों!

(3)
दो पहर रात गई है। अंधेरा है। सुनसान मची हुई है। बोधसिंह तीन खाली बिसकुटों के टिनों पर अपने दोनों कंबल बिछाकर और लहनासिंह के दो कंबल और एक बरानकोट ओढ़कर सो रहा है। लहनासिंह पहरे पर खड़ा हुआ है। एक आंख खाई के मुंह पर है और एक बोधसिंह के दुबले शरीर पर। बोधसिंह कराहा।
“क्यों बोधा भाई¸ क्या है?”
“पानी पिला दो।”
लहनासिंह ने कटोरा उसके मुंह से लगाकर पूछा - “कहो, कैसे हो?” 
पानी पीकर बोधा बोला- “कंपनी छूट रही है। रोम-रोम में तार दौड़ रहे हैं। दांत बज रहे हैं।”
“अच्छा¸ मेरी जरसी पहन लो !”
“और तुम?”
“मेरे पास सिगड़ी है और मुझे गर्मी लगती है; पसीना आ रहा है।”
“ना¸ मैं नहीं पहनता, चार दिन से तुम मेरे लिए...”
“हां¸ याद आई। मेरे पास दूसरी गरम जरसी है। आज सवेरे ही आई है। विलायत से बुन-बुनकर भेज रही हैं मेमें¸ गुरु उनका भला करें।” यों कहकर लहना अपना कोट उतारकर जरसी उतारने लगा।
“सच कहते हो?”
“और नहीं झूठ?” यों कहकर नांहीं करते बोधा को उसने जबरदस्ती जरसी पहना दी और आप खाकी कोट और जीन का कुरता भर पहनकर पहरे पर आ खड़ा हुआ। मेम की जरसी की कथा केवल कथा थी।
आधा घंटा बीता। इतने में खाई के मुंह से आवाज आई- “सूबेदार हजारासिंह।”
“कौन लपटन साहब? हुकुम हुजूर !” -कहकर सूबेदार तनकर फौजी सलाम करके सामने हुआ।
“देखो¸ इसी दम धावा करना होगा। मील-भर की दूरी पर पूरब के कोने में एक जर्मन खाई है। उसमें पचास से ज्यादा जर्मन नहीं हैं। इन पेड़ों के नीचे-नीचे दो खेत काटकर रास्ता है। तीन-चार घुमाव हैं। जहां मोड़ है वहां पंद्रह जवान खड़े कर आया हूं। तुम यहां दस आदमी छोड़कर सबको साथ ले उनसे जा मिलो। खंदक छीनकर वहीं¸ जब तक दूसरा हुक्म न मिले, डटे रहो। हम यहां रहेगा।”
“जो हुक्म।”
चुपचाप सब तैयार हो गये। बोधा भी कंबल उतारकर चलने लगा। तब लहनासिंह ने उसे रोका। लहनासिंह आगे हुआ तो बोधा के बाप सूबेदार ने उंगली से बोधा की ओर इशारा किया। लहनासिंह समझकर चुप हो गया। पीछे दस आदमी कौन रहें¸ इस पर बड़ी हुज्जत हुई। कोई रहना न चाहता था। समझा-बुझाकर सूबेदार ने मार्च किया। लपटन साहब लहना की सिगड़ी के पास मुंह फेरकर खड़े हो गये और जेब से सिगरेट निकालकर सुलगाने लगे। दस मिनट बाद उनने लहना की ओर हाथ बढ़ाकर कहा- “ लो तुम भी पियो।”
आंख पलकते-पलकते लहनासिंह सब समझ गया। मुंह का भाव छिपाकर बोला - “लाओ, साहब!” हाथ आगे करते उसने सिगड़ी के उजास में साहब का मुंह देखा। बाल देखे। मथा ठनका। लपटन साहब के पट्टियों वाले बाल एक दिन में ही कहां उड़ गए और उनकी जगह कैदियों के-से कटे हुए बाल कहां से आ गए?”
शायद साहब पिये हुए हैं और उन्हें बाल कटवाने का मौका मिल गया है! लहनासिंह ने जांचना चाहा। लपटन साहब पांच वर्ष से उसकी रेजिमेंट में रहे थे।
“क्यों साहब¸ हम लोग हिन्दुस्तान कब जायेंगे?”
“लड़ाई खत्म होने पर। क्यों, यह देश पसंद नहीं?”
“नहीं साहब¸ वह शिकार के मजे यहां कहां? याद है, पारसाल नकली लड़ाई के पीछे हम-आप जगाधरी के जिले में शिकार करने गये थे!
'हां-हां...'
'वही जब आप खोते पर सवार थे और आपका खानसामा अब्दुल्ला रास्ते के एक मन्दिर में जल चढ़ाने को रह गया था!'
'बेशक, पाजी कहीं का-’
सामने से वह नीलगाय निकली कि ऐसी बड़ी मैंने कभी नही देखी। और आपकी एक गोली कंधे में लगी और पुट्‌ठे में निकली। ऐसे अफसर के साथ शिकार खेलने में मजा है। क्यों साहब¸ शिमले से तैयार होकर उस नीलगाय का सिर आ गया था न? आपने कहा था कि रजमंट की मैस में लगायेंगे।
‘हां, पर मैंने वह विलायत भेज दिया-’
“ऐसे बड़े-बड़े सींग! दो-दो फुट के तो होंगे?”
“हां¸ लहनासिंह¸ दो फुट चार इंच के थे। तुमने सिगरेट नहीं पिया?”
“पीता हूं साहब¸ दियासलाई ले आता हूं।” कहकर लहनासिंह खंदक में घुसा। अब उसे संदेह नहीं रहा था। उसने झटपट विचार किया कि क्या करना चाहिए।
अंधेरे में किसी सोने वाले से टकराया। “कौन? वजीरासिंह?”
“हां¸ क्यों लहना? क्या कयामत आ गई? जरा तो आंख लगने दी होती?”

(4)
“होश में आओ। कयामत आई है और लपटन साहब की वर्दी पहन कर आई है।”
“क्या?”
“लपटन साहब या तो मारे गये हैं या कैद हो गए हैं। उनकी वर्दी पहनकर कोई जर्मन आया है। सूबेदार ने इसका मुंह नहीं देखा। मैंने देखा और बातें की हैं। सोहरा साफ उर्दू बोलता है¸ पर किताबी उर्दू। और मुझे पीने को सिगरेट दिया है।”
“तो अब!”
“अब मारे गए। धोखा है। सूबेदार होरां कीचड़ में चक्कर काटते फिरेंगे और यहां खाई पर धावा होगा। उठो, एक काम करो। पलटन के पैरों के निशान देखते-देखते दौड़ जाओ। अभी बहुत दूर नहीं गए होंगे। सूबेदार से कहो कि एकदम लौट आवें। खंदक की बात सब झूठ है। चले जाओ¸ खंदक के पीछे से निकल जाओ। पत्ता तक न खड़के। देर मत करो।”
“हुकम तो यह है कि यहीं-- ”
“ऐसी-तैसी हुकुम की! मेरा हुकुम- जमादार लहनासिंह, जो इस बख्त यहां सबसे बड़ा अफसर है¸ उसका हुकुम है। मैं लपटन साहब की खबर लेता हूं।”
“पर यहां तो सिर्फ तुम आठ ही हो।”
“आठ नहीं¸ दस लाख। एक-एक अकालिया सिख सवा लाख के बराबर होता है। चले जाओ।”
लौटकर खाई के मुहाने पर लहनासिंह दीवाल से चिपक गया। उसने देखा कि लपटन साहब ने जेब से तीन बेल के बराबर गोले निकाले। तीनों को जगह-जगह खंदक की दीवालों में घुसेड़ दिया और तीनों में एक तार-सा बांध दिया। तार के आगे एक सूत की एक गुत्थी थी¸ जिसे सिगड़ी के पास रखा। और बाहर की तरफ जाकर एक दियासलाई जलाकर गुत्थी पर रखने ही वाला था कि इतने में बिजली की तरह दोनों हाथों से उल्टी बंदूक को उठाकर लहनासिंह ने साहब की कुहनी पर तानकर दे मारा। धमाके के साथ साहब के हाथ से दियासलाई गिर पड़ी। लहनासिंह ने एक कुंदा साहब की गर्दन पर मारा और साहब 'आख! मीन गौट्‌ट' कहते हुए चित्त हो गये। लहनासिंह ने तीनों गोले बीनकर खंदक के बाहर फैंके और साहब को घसीटकर सिगड़ी के पास लिटाया। जेबों की तलाशी ली। तीन-चार लिफाफे और एक डायरी निकालकर उन्हें अपनी जेब के हवाले किया।
साहब की मूर्छा हटी! लहनासिंह हंसकर बोला- “क्यों लपटन साहब! मिजाज कैसा है? आज मैंने बहुत बातें सीखीं। यह सीखा कि सिख सिगरेट पीते हैं। यह सीखा कि जगाधरी के जिले में नीलगायें होती हैं और उनके दो फुट चार इंच के सींग होते हैं। यह सीखा कि मुसलमान खानसामा मंदिरों में पानी चढ़ाते हैं और लपटन साहब खोते पर चढ़ते हैं। पर यह तो कहो, ऐसी साफ उर्दू कहां से सीख आये? हमारे लपटन साहब तो बिना 'डैम' के पांच लफ्ज भी नहीं बोला करते थे।”
लहना ने पतलून के जेबों की तलाशी नहीं ली थी। साहब ने मानो जाड़े से बचने के लिए¸ दोनों हाथ जेबों में डाले।
लहनासिंह कहता गया- “चालाक तो बड़े हो पर मांझे का लहना इतने बरस लपटन साहब के साथ रहा है। उसे चकमा देने के लिये चार आंखें चाहिएं। तीन महीने हुए, एक तुरकी मौलवी मेरे गांव आया था। औरतों को बच्चे होने के ताबीज बांटता था और बच्चों को दवाई देता था। चौधरी के बड़ के नीचे मंजा बिछाकर हुक्का पीता रहता था और कहता था कि जर्मनी वाले बड़े पंडित हैं। वेद पढ़-पढ़ कर उनमें से विमान चलाने की विद्या जान गये हैं। गौ को नहीं मारते। हिंदुस्तान में आ जायेंगे तो गोहत्या बंद कर देंगे। मंडी के बनियों को बहकाता था कि डाकखाने से रुपए निकाल लो; सरकार का राज आने वाला है। डाकबाबू पोल्हूराम भी डर गया था। मैंने मुल्ला जी की दाढ़ी मूंड दी थी और गांव से बाहर निकालकर कहा था कि जो मेरे गांव में अब पैर रक्खा तो-”
साहब की जेब में से पिस्तौल चली और लहना की जांघ में गोली लगी। इधर लहना की हैनरी मार्टिनी के दो फायरों ने साहब की कपालक्रिया कर दी। धड़ाका सुनकर सब दौड़ आये।
बोधा चिल्लाया- “क्या है?”
लहनासिंह ने उसे तो यह कहकर सुला दिया कि 'एक हड़का हुआ कुत्ता आया था, मार दिया' और औरों को सब हाल कह दिया। सब बंदूकें लेकर तैयार हो गये। लहना ने साफा फाड़कर घाव के दोनों तरफ पट्टियां कसकर बांधी। घाव मांस में ही था और पट्टियों के कसने से लहू निकलना बंद हो गया।
इतने में सत्तर जर्मन चिल्लाकर खाई में घुस पड़े। सिखों की बंदूकों की बाढ़ ने पहले धावे को रोका। दूसरे को रोका। पर यहां थे आठ। (लहनासिंह तक-तक कर मार रहा था- वह खड़ा था और¸ और लेटे हुए थे) और वे सत्तर। अपने मुर्दा भाइयों के शरीर पर चढ़कर जर्मन आगे घुसे आते थे।
अचानक आवाज आई 'वाह गुरुजी का खालसा, वाह गुरुजी की फतह!!' और धड़ाधड़ बंदूकों के फायर जर्मनों की पीठ पर पड़ने लगे। ऐन मौके पर जर्मन दो चक्की के पाटों में आ गये। पीछे से सूबेदार हजारासिंह के जवान आग बरसाते थे और सामने लहनासिंह के साथियों के संगीन चल रहे थे। पास आने पर पीछे वालों ने भी संगीन पिरोना शुरू कर दिया।
एक किलकारी और- 'अकाल सिक्खां दी फौज आई! वाह गुरुजी दी फतह! वाह गुरुजी दा खालसा! सत श्री अकाल पुरुख!!!' और लड़ाई खतम हो गई। तिरसठ जर्मन या तो खेत रहे थे या कराह रहे थे। सिखों में पंद्रह के प्राण गये। सूबेदार के दाहिने कंधे में से गोली आर-पार निकल गई। लहनासिंह की पसली में एक गोली लगी। उसने घाव को खंदक की गीली मिट्टी से पूर लिया और बाकी का साफा कसकर कमरबंद की तरह लपेट लिया। किसी को खबर न पड़ी कि लहना के दूसरा घाव- भारी घाव लगा है।
लड़ाई के समय चांद निकल आया था, ऐसा चांद कि जिसके प्रकाश से संस्कृत-कवियों का दिया हुआ 'क्षयी' नाम सार्थक होता है। और हवा ऐसी चल रही थी जैसी कि बाणभट्‌ट की भाषा में 'दंतवीणोपदेशाचार्य’ कहलाती। वजीरासिंह कह रहा था कि कैसे मन-मन भर फ्रांस की भूमि मेरे बूटों से चिपक रही थी जब मैं दौड़ा-दौड़ा सूबेदार के पीछे गया था। सूबेदार लहनासिंह से सारा हाल सुन और कागजात पाकर उसकी तुरतबुद्धि को सराह रहे थे और कह रहे थे कि तू न होता तो आज सब मारे जाते।
इस लड़ाई की आवाज तीन मील दाहिनी ओर की खाई वालों ने सुन ली थी। उनने पीछे टैलीफोन कर दिया था। वहां से झटपट दो डाक्टर और दो बीमारों को ढोने की गाडियां चलीं, जो एक-डेढ़ घंटे के अंदर-अंदर आ पहुंचीं। फील्ड अस्पताल नजदीक था। सुबह होते-होते वहां पहुंच जाएंगे¸ इसलिये मामूली पट्टी बांधकर एक गाड़ी में घायल लिटाये गये और दूसरी में लाशें रखी गईं। सूबेदार ने लहनासिंह की जांघ में पट्टी बंधवाना चाही। पर उसने यह कहकर टाल दिया कि थोड़ा घाव है, सबेरे देखा जायेगा। बोधासिंह ज्वर में बर्रा रहा था। वह गाड़ी में लिटाया गया। लहना को छोड़कर सूबेदार जाते नहीं थे। यह देख लहना ने कहा- “तुम्हें बोधा की कसम है, और सूबेदारनी जी की सौगंध है जो इस गाड़ी में न चले जाओ।”
“और तुम?”
“मेरे लिये वहां पहुंचकर गाड़ी भेज देना। और जर्मन मुरदों के लिये भी तो गाड़ियां आती होंगी। मेरा हाल बुरा नहीं है। देखते नहीं, मैं खड़ा हूं? वजीरासिंह मेरे पास है ही।”
“अच्छा, पर..”
“बोधा गाड़ी पर लेट गया? भला! आप भी चढ़ जाओ। सुनिये तो, सूबेदारनी होरां को चिठ्ठी लिखो तो मेरा मत्था टेकना लिख देना। और जब घर जाओ तो कह देना कि जो उनने कहा था वह मैंने कर दिया।”
गाड़ियां चल पड़ी थीं। सूबेदार ने चढ़ते-चढ़ते लहना का हाथ पकड़कर कहा- “तैंने मेरे और बोधा के प्राण बचाए हैं। लिखना कैसा, साथ ही घर चलेंगे। अपनी सूबेदारनी को तू ही कह देना। उसने क्या कहा था?”
“अब आप गाड़ी पर चढ़ जाओ। मैंने जो कहा, वह लिख देना और कह भी देना।”
गाड़ी के जाते ही लहना लेट गया। “वजीरा पानी पिला दे और मेरा कमरबंद खोल दे। तर हो रहा है।”
मृत्यु के कुछ समय पहले स्मृति बहुत साफ हो जाती है। जनम-भर की घटनाएं एक-एक करके सामने आती हैं। सारे दृश्यों के रंग साफ होते हैं, समय की धुन्ध बिल्कुल उन पर से हट जाती है।


लहनासिंह बारह वर्ष का है। अमृतसर में मामा के यहां आया हुआ है। दही वाले के यहां, सब्जीवाले के यहां, हर कहीं, उसे एक आठ वर्ष की लड़की मिल जाती है। जब वह पूछता है कि 'तेरी कुड़माई हो गई?' वो ‘धत्‌’ कहकर भाग जाती है। एक दिन उसने वैसे ही पूछा तो उसने कहा- "हां, कल हो गई¸ देखते नहीं यह रेशम के फूलों वाला सालू!" सुनते ही लहनासिंह को दु:ख हुआ। क्रोध हुआ। क्यों हुआ?
“वजीरासिंह¸ पानी पिला दे।”
पचीस वर्ष बीत गये। लहनासिंह नं. 77 रैफल्स में जमादार हो गया है। उस आठ वर्ष की कन्या का ध्यान ही न रहा। न मालूम वह कभी मिली थी, या नहीं। सात दिन की छुट्टी लेकर जमीन के मुकद्दमे की पैरवी करने वह अपने घर गया। वहां रेजिमेंट के अफसर की चिठ्ठी मिली कि फौज लाम पर जाती है। फौरन चले आओ। साथ ही सूबेदार हजारासिंह की चिठ्ठी मिली कि मैं और बोधासिंह भी लाम पर जाते हैं। लौटते हुए हमारे घर होते जाना। साथ ही चलेंगे। सूबेदार का गांव रास्ते में पड़ता था और सूबेदार उसे बहुत चाहता था। लहनासिंह सूबेदार के यहां पहुंचा।
जब चलने लगे¸ तब सूबेदार बेड़े में से निकलकर आया। बोला- “लहना, सूबेदारनी तुमको जानती है। बुलाती है, जा मिल आ।” लहनासिंह भीतर पहुंचा। सूबेदारनी मुझे जानती है? कब से? रेजिमेंट के क्वार्टरों में तो कभी सूबेदार के घर के लोग रहे नहीं। दरवाजे पर जाकर 'मत्था टेकना' कहा। असीस सुनी। लहनासिंह चुप।
"मुझे पहचाना?"
“नहीं।”
'तेरी कुड़माई हो गई? - 'धत्'‌ - 'कल हो गई' - 'देखते नहीं, रेशमी बूटों वाला सालू - अमृतसर में.. '
भावों की टकराहट से मूर्छा खुली। करवट बदली। पसली का घाव बह निकला।
'वजीरा¸ पानी पिला' -‘उसने कहा था।'
स्वप्न चल रहा है। सूबेदारनी कह रही है- “मैंने तेरे को आते ही पहचान लिया। एक काम कहती हूं। मेरे तो भाग फूट गए। सरकार ने बहादुरी का खिताब दिया है, लायलपुर में जमीन दी है¸ आज नमकहलाली का मौका आया है। पर सरकार ने हम तीमियों की एक घघरिया पलटन क्यों न बना दी जो मैं भी सूबेदार जी के साथ चली जाती? एक बेटा है। फौज में भरती हुए उसे एक ही बरस हुआ। इसके पीछे चार और हुए¸ पर एक भी नहीं जिया।" सूबेदारनी रोने लगी। ‘अब दोनों जाते हैं। मेरे भाग! तुम्हें याद है, एक दिन तांगेवाले का घोड़ा दही वाले की दुकान के पास बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाये थे, आप घोड़े की लातों में चले गए थे और मुझे उठाकर दुकान के तख्ते पर खड़ा कर दिया था। ऐसे इन दोनों को बचाना। यह मेरी भिक्षा है। तुम्हारे आगे मैं आंचल पसारती हूं।'
रोती-रोती सूबेदारनी ओबरी में चली गई। लहना भी आंसू पोंछता हुआ बाहर आया।
‘वजीरा, पानी पिला’ - 'उसने कहा था।' 
लहना का सिर अपनी गोदी में लिटाए वजीरासिंह बैठा है। जब मांगता है¸ तब पानी पिला देता है। आध घंटे तक लहना गुम रहा। फिर बोला- 
“कौन! कीरतसिंह?”
वजीरा ने कुछ समझकर कहा, “हां।”
“भइया, मुझे और ऊंचा कर ले। बस पट्ट पर मेरा सिर रख ले।” 
वजीरा ने वैसे ही किया।
“हां, अब ठीक है। पानी पिला दे। बस, अब के हाड़ में यह आम खूब फलैगा। चाचा-भतीजा दोनों यहीं बैठकर आम खाना। जितना बड़ा तेरा भतीजा है, उतना ही यह आम है। जिस महीने उसका जन्म हुआ था¸ उसी महीने में मैंने इसे लगाया था।”
वजीरासिंह के आंसू टप-टप पड़ रहे थे।
कुछ दिन पीछे लोगों ने अखबारों में पढ़ा- 
फ्रांस और बेल्जियम - 68 वीं सूची - मैदान में घावों से मरा - नं. 77 सिख राइफल्स - जमादार लहनासिंह।
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