Showing posts with label यात्राएं. Show all posts
Showing posts with label यात्राएं. Show all posts

Sunday, January 29, 2012

किला जो कहता है चार सदियों की दास्तां

(गोवा का नाम लेते ही बेशुमार रंगों से भरे समुद्र तटों की छवि ज़हन में उभरने लगती है। लेकिन सूरज, रेत और समंदर का मेल ही गोवा की तस्वीर मुकम्मल करने के लिए काफी नहीं। यहां की ऐतिहासिक विरासत भी ख़ुद में बहुत कुछ समेटे हुए है। इसी विरासत का हिस्सा है अग्वादा किला। इस बार गोवा जाना हुआ तो अग्वादा से रू-ब-रू होने का मौक़ा मिल गया।)

गोवा में 42वां अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव इफ्फी शुरू होने में एक दिन शेष था और हम वहां जाने के ख़याल से ही उत्साहित थे। रजिस्ट्रेशन महीना भर पहले हो चुका था। लखनऊ से मेरी दोस्त प्रतिभा भी पहुंच चुकी थी। यात्रा की रूपरेखा तैयार कर हमने मुंबई से गोवा के लिए उड़ान भरी। तक़रीबन 45 मिनट बाद खिड़की से बाहर झांका तो दूर-दूर तक पानी का सैलाब, रंग-बिरंगे घर और हरियाली नज़र आई। दृश्य देखते ही समझ आ गया कि हम गोवा पहुंचने वाले हैं। गोवा एयरपोर्ट पर कार्गो से आने वाले सूटकेस का इंतज़ार भी हमें भारी पड़ रहा था। एयरपोर्ट से बाहर आए तो इफ्फी के रंग-बिरंगे बैनर देखकर मन और मचल उठा। टैक्सी में गोवा की रौनक़ देखते हुए हम उत्तरी गोवा पहुंचे। यहां अरपोरा इलाके में हमारे ठहरने की व्यवस्था थी। अरपोरा, राजधानी पणजी से 15 किलोमीटर दूर है। इफ्फी पणजी में होने वाला था। आने-जाने में असुविधा न हो, इसलिए हमने दोपहिया वाहन किराए पर लिया और अगले पांच दिन के लिए निश्चिंत हो गए। 
इससे पहले कि आप कुछ सोचें, बता दूं कि मैं यहां इफ्फीकी नहीं बल्कि गोवा की ऐतिहासिक धरोहर की बात करने जा रही हूं। एक ऐसे किले की बात, जो देश के सबसे पुराने और संरक्षित किलों में से है। 
अग्वादा किला.. इसे देखने की हसरत जाने कब से थी! बिंदास माहौल और इफ्फी के ख़ुमार के बीच दिन जितनी तेज़ी से बीत रहे थे, यह इच्छा उतनी ही बलवती होती जा रही थी। इफ्फी से वक़्त चुराना आसान नहीं था, लेकिन पहली ही फ़ुर्सत में हमने अग्वादा किले का रुख़ कर लिया। 
इतिहास के गलियारों से
उत्तरी गोवा की बारदेज़ तहसील में है अग्वादा किला। यह अरपोरा से 8 किलोमीटर दूर है। अरपोरा से कैंडोलिम और सिन्क्वेरिम समुद्रतट की तरफ़ जाने वाली सड़क किले तक ले जाती है। फोर्ट रोड पर चहल-पहल भरे बाज़ार हैं, तो कई अच्छे विदेशी रेस्तरां और कैफे भी। बाज़ार पार करने के बाद हल्की चढ़ाई है। रास्ता थोड़ा घुमावदार हो जाता है, लेकिन ख़ूबसूरत नज़ारे यहां भी साथ नहीं छोड़ते। ट्रैफिक न के बराबर है और सड़क के दोनों तरफ झाड़ियां हैं। हम स्कूटर पर थे इसलिए अग्वादा पहुंचने में ज़्यादा वक़्त नहीं लगा। 
अग्वादा पुर्तगाली भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है- पानी का स्थल। मांडवी नदी के मुहाने पर बसा अग्वादा किला 1612 ईसवी में तैयार हुआ था। इसे पुर्तगालियों ने बनवाया था। हर किले की तरह इस किले का निर्माण भी दुश्मनों से सुरक्षा के लिए किया गया। लेकिन एक मक़सद और था- यूरोप से आने वाले जहाज़ों के लिए ताज़ा पानी मुहैया कराना। किले में पानी जमा रहे, इसके लिए यहां एक विशाल टंकी बनवाई गई। इसे संभालने के लिए 16 बड़े स्तंभों का प्रयोग किया गया। टंकी की भंडारण क्षमता कई लाख गैलन है। इसमें पानी एकत्र करने के लिए प्राकृतिक झरनों की मदद ली जाती थी। मज़े की बात है कि ये झरने किले के अंदर ही थे। 17वीं और 18वीं शताब्दी में दूर-दराज़ से आने वाले जहाज़ यहां रुकते और ताज़े पानी का स्टॉक लेकर आगे बढ़ जाते। यक़ीन नहीं होता कि सामान्य-सा दिखने वाला किला किसी ज़माने में पानी का इतना बड़ा स्रोत रहा होगा! किले के प्रांगण में प्रवेश करते हैं तो टंकी सामने दिखाई देती है। इस पर खड़े होकर चारों तरफ़ नज़र दौड़ाएं तो लगेगा जैसे लंबी आयताकार दीवार ने आपको घेरा हुआ है। एक कोने पर सफ़ेद रंग का लाइट हाउस तो दूसरे किनारे पर मांडवी नदी है। ये दोनों किले की ख़ूबसूरती में भरपूर इज़ाफ़ा करते हैं। एक स्थानीय महिला से पता चला कि फ़िल्म भूतनाथ की शूटिंग इसी किले में हुई थी। यहां परम शांति है और सुकून चाहने वालों के लिए किसी सौगात से कम नहीं है यह जगह। बाहरी छोर पर बैठी प्रतिभा आराम की मुद्रा में आ चुकी थी, लेकिन मैं थी कि निकल पड़ी किले का जायज़ा लेने के लिए। 
अग्वादा किले की बाहरी दीवार लगभग ढह चुकी है। अंदर की दीवारें मज़बूत हैं जो तीन तरफ़ से चौड़ी खाई से घिरी हैं। चौथा छोर नदी की तरफ़ खुलता है। किले की संरचना कुछ ऐसी है कि इसे दो भागों में बांट सकते हैं- एक ऊपरी और दूसरा निचला भाग। किले के ऊपरी हिस्से में पानी की टंकी, लाइट हाउस, बारूद रखने का कक्ष और बुर्ज हैं, जबकि निचला हिस्सा पुर्तगाली जहाजों की गोदी के रूप में इस्तेमाल किया जाता था। ख़ास बात यह कि अग्वादा देश का एकमात्र किला है जिस पर किसी का आधिपत्य नहीं हो सका। यही वजह है कि पुर्तगाली किलों में अग्वादा सबसे अहम है। 
पुराने दीप स्तंभों में से एक
लाइट हाउस किला परिसर में है जो बाहर से ही दिखना शुरू हो जाता है। इसकी चार मंज़िलें हैं। वर्ष 1864 में पुर्तगाल से आने वाले जहाज़ों को दिशा दिखाने के लिए इसे बनवाया गया था। अगर कहा जाए कि किले की शान लाइट हाउस है तो ग़लत नहीं होगा। अग्वादा लाइट हाउस देश के सबसे पुराने लाइट हाउस में से है। हालांकि बहुत-से लोगों का मानना है कि यह एशिया का सबसे पहला दीप स्तंभ है। 1976 में इसका इस्तेमाल पूरी तरह से बंद कर दिया गया था।

सेंट्रल जेल भी
अब बात अग्वादा जेल की। किले के निचले भाग को, जो बाकी हिस्सों के मुक़ाबले बेहतर हालत में है, जेल में तब्दील कर दिया गया है। यह अब गोवा की सेन्ट्रल जेल है जिसमें नशीली दवाओं के कारोबार से जुड़े लोगों को रखा जाता है। सैलानियों को यहां आने की इजाज़त नहीं है। अग्वादा से क़रीब एक किलोमीटर पहले सिन्क्वेरिम तट है। बारदेज़ से आते हुए बाईं तरफ़ कई मोटरबोट हैं, जो डॉल्फिन पॉइंट जाने के लिए खड़ी रहती हैं। बोट में बैठकर डॉल्फिन्स के ऊपर आने का इंतज़ार अलग अनुभव देता है। पानी से उचककर जितनी तेज़ी से वो बाहर आती हैं, उतनी ही फुर्ती से गुम भी हो जाती हैं। यहीं किनारे पर आप सेन्ट्रल जेल देख सकते हैं। किले और लाइट हाउस का ऊपरी हिस्सा यहां से साफ़ नज़र आता है। अग्वादा जाने से पहले हम डॉल्फिन पॉइंट होकर आए थे। वहां एक ख़ूबसूरत बंगला भी देखने को मिला। मोटरबोट वाले ने बताया कि वो बंगला हीरा व्यापारी जिम्मी गज़दर का है। इस बंगले में ‘हसीना मान जाएगी समेत कई फ़िल्मों की शूटिंग हो चुकी है। 
अग्वादा किले के बंद होने का वक़्त हो चला था। प्रतिभा की ख़्वाहिश थी कि समंदर किनारे बैठ, सूरज को ढलते हुए देखा जाए। सूर्यास्त में ज़्यादा समय नहीं बचा था, इसलिए अग्वादा को हमने अलविदा कहा और अपने स्कूटर को कैंडोलिम बीच की दिशा में घुमा दिया।
जाने से पहले...
1. टैक्सी या निजी वाहन से जाना बेहतर है। गोवा में दोपहिया वाहन सबसे अच्छा विकल्प है। अपनी सुविधा के अनुसार स्कूटर या बाइक किराए पर ले सकते हैं। एक दिन का किराया लगभग 250 रुपए है जो दिसंबर के आख़िरी हफ़्ते में 500 रुपए तक हो जाता है। 
2. समुद्र तट से सटा होने के कारण उमस अपेक्षाकृत ज़्यादा है। पानी साथ लेकर चलें। किले के सामने खाने-पीने के कुछ स्टॉल हैं, लेकिन महंगे हैं। 
3. यहां जाने के लिए नवंबर से मार्च का समय अनुकूल है। 
4. तीखी धूप से बचने के लिए हैट साथ रखें। सन-स्क्रीन लोशन का प्रयोग भी कर सकते हैं। 
5. अग्वादा किला सप्ताह भर खुला रहता है और इसे देखने के लिए प्रवेश शुल्क नहीं है। 


(दैनिक जागरण के 'यात्रा' परिशिष्ट में 29 जनवरी 2012 को प्रकाशित)

Sunday, November 27, 2011

चलिए गुजरात के इकलौते हिल स्टेशन...

(शिमला, मसूरी, नैनीताल, ऊटी, डलहौज़ी, दार्जीलिंग, खज्जियार, कुल्लू, मनाली, श्रीनगर... ये कुछ नाम हैं जो ज़हन में आते हैं जब किसी हिल स्टेशन पर जाकर छुट्टियां बिताने की बात हो। लेकिन इन बड़े-बड़े नामों के अलावा भी कुछ पहाड़ी इलाके हैं जिनका बहुत कम ज़िक्र होता है, ऐसे इलाके जो न सिर्फ़ आबो-हवा बल्कि भोजन, कला व संस्कृति के लिहाज़ से भी ख़ास हैं। इन्हीं में से एक है सापूतारा। कम भीड़ और सुक़ून-भरी इस जगह पर आकर लगता है कि हम एक सदी पीछे चले गए हों।)
मुंबई से हम अलस्सुबह गुजरात एक्सप्रेस से बिलीमोरा स्टेशन के लिए रवाना हुए। हमारे पास तीन ही दिन थे और यह पूरा समय हम प्रकृति के सान्निध्य में बिताना चाहते थे। साढ़े तीन घंटे बाद हम बिलीमोरा जंक्शन पर थे। बिलीमोरा गुजरात के नवसारी ज़िले में है और सापूतारा यहां से 113 किलोमीटर की दूरी पर है। बिलीमोरा से सापूतारा के लिए नैरोगेज लाइन है, जो वघई स्टेशन तक जाती है। लेकिन बिलीमोरा के मुख्य रेलवे स्टेशन पर एक सज्जन ने हमें टॉय ट्रेन न पकड़ने की सलाह दी क्योंकि वो वघई तक पहुंचने में काफी वक़्त ले लेती है। अब सापूतारा जाने के लिए हमारे पास सिर्फ़ बस या टैक्सी का विकल्प बचा था। टैक्सी के बजाय हमने बस का इंतज़ार करना मुनासिब समझा। लेकिन काफी देर बाद भी सापूतारा के लिए कोई बस नहीं मिली तो सब्र जवाब देने लगा। एक बस आई लेकिन वो भी वांसदा तक की थी। हम उसमें चढ़े और वांसदा उतरकर सापूतारा के लिए दूसरी बस ले ली। सापूतारा पहुंचे तो शाम के चार बजे चुके थे। आर्टिस्ट विलेज पहुंचकर कहीं जाने की इच्छा नहीं हुई।
अगली सुबह गुनगुनी धूप ने हमारा स्वागत किया। गुलाबी ठंड और साफ-सुथरी हवा के बीच तरो-ताज़ा महसूस हो रहा था। नाश्ते के बाद हम घूमने निकल पड़े।
डांग ज़िले में सहयाद्रि पर्वत श्रृंखला से घिरा एक छोटा-सा कस्बा है सापूतारा, जिसकी शोभा में चार चांद लगाती है झील। झील के आस-पास कुछ होटल हैं। सूरत-नासिक हाईवे से जुड़े होने के कारण यहां चहल-पहल रहती है, जो सप्ताहांत में बढ़ जाती है। हाईवे के किनारे खाने-पीने के कई स्टॉल हैं जो देर रात तक खुले रहते हैं। यहां कोई घर या बंगला देखने को नहीं मिला। कुछ दफ़्तर, होटल और व्यवसायिक केन्द्र हैं लेकिन रिहायश नहीं है। करीब तीन किलोमीटर दूर मालेगांव है। यह आदिवासी बहुल क्षेत्र है और सापूतारा में छोटे-मोटे काम करने वाले ज़्यादातर लोग इसी गांव से हैं।
सापूतारा की आबो-हवा ऐसी है कि यहां से लौटने का मन नहीं करता। हर हिल स्टेशन की तरह यहां भी बहुत सारे पॉइंट हैं, जैसे सनराइज़, सनसेट और सुसाइड पॉइंट। खड़ी चढ़ाई के बाद हम एक सपाट मैदान पर पहुंचे तो पता चला कि यह टेबल पॉइंट था, जो कुछ अलग-सा लगा। लगा, जैसे क़ुदरत ने कोई बड़ी मेज़ लाकर यहां रख दी हो। यहीं चुलबुल पाण्डे से मिलने का मौक़ा भी मिला। मैं किसी फ़िल्मी चरित्र की नहीं बल्कि रेगिस्तान के हीरो की बात कर रही हूं। चुलबुल उस ऊंट का नाम था जिस पर बैठकर हमने टेबल पॉइंट का चक्कर लगाया।
पुष्पक पर एक शाम 
टेबल पॉइंट के पास ही पुष्पक रोपवे है लेकिन पुष्पक की सवारी आसान नहीं, इसके लिए लंबी लाइन में लगना पड़ता है। दो घंटे कतार में खड़े रहने के बाद हमें पुष्पक में बैठने का अवसर मिला। धीरे-से सरकने वाली ट्रॉली देखते-ही-देखते हवा से बातें करने लगी। आसमान में झूलते हुए कांच की खिड़की से सापूतारा को देखने का अनुभव अलग ही है। कहते हैं सीता को हरने के बाद रावण पुष्पक विमान में ही लंका गया था। पुष्पक रोपवे में बैठे ऐसा लग रहा था जैसे हमें भी कोई चुराकर अपने साथ दूर गगन में लिए जा रहा हो। सापूतारा का विहंगम नज़ारा देखकर दिल नहीं भरा कि चक्कर पूरा हो गया। फिर लाइन में लगने की हिम्मत नहीं थी तो हम वापस लौट आए। सापूतारा में सैलानियों के लिए 'पुष्पक' मुख्य आकर्षण है। यह होटल वेती का निजी रोपवे है। आसमान की सैर के बाद हमने सापूतारा झील में नौकायन का आनन्द लिया। यहां हर तरह की नौकाएं हैं... पैडल से चलने वाली, चप्पू से चलने वाली, दो सीटों वाली और परिवार के लिए बड़ी नौका भी। झील के पिछली तरफ मधुमक्खी पालन केन्द्र है। यहां से ताज़ा शहद ख़रीद सकते हैं। पास ही एक संग्रहालय है, छुट्टी में बंद होने के कारण हम उसे नहीं देख पाए।
अलग है काठियावाड़ी खाने का स्वाद
अगर आपने काठियावाड़ी खाना नहीं खाया है तो आप कुछ खो रहे हैं। इस खाने का स्वाद एक बार स्वाद-ग्रंथियों तक पहुंच जाए तो फिर भुलाना आसान नहीं, क्योंकि यह आम भारतीय खाने से काफी अलग है। इसका ज़ायका तो अलग है ही, पकाने का तरीका भी जुदा है। काठियावाड़ी खाना बनाने के लिए पारंपरिक विधि उपयोग में लाई जाती है। खाना पकाने में ज़्यादातर लकड़ी की आग का इस्तेमाल होता है। रोटी बनाने के लिए मिट्टी की तवड़ी है। तड़के में है... प्याज़, टमाटर और खूब सारे मसालों के साथ तेल व लहसुन का ज़बरदस्त मेल! मसालों की सुगंध और देसी ख़ूशबू के साथ लिपटा स्वादिष्ट भोजन... जो किसी के मुंह में भी पानी लाने के लिए काफी है... है न? हां, यदि आप सादा भोजन पसंद करने वाले हैं या सेहत के फिक्रमंद हैं तो काठियावाड़ी भोजन थोड़ा गरिष्ठ हो सकता है। लेकिन इतना लज़्ज़तदार खाना छोड़ना समझदारी नहीं है और कभी-कभार इसे खा लेने में कोई हर्ज़ भी नहीं! यही सोचकर हमने तीन दिन तक काठियावाड़ी खाने का भरपूर स्वाद लिया। हाईवे के किनारे कई रेस्तरां हैं जहां कम दाम में ठेठ काठियावाड़ी खाने का मज़ा लिया जा सकता है।
ज़रूर चखें
लसनिया बटाका (लहसुनी आलू), उड़द की दाल, भरेला रींगना (भरवां बैंगन) या रींगना भर्थो (बैंगन का भुर्था)... इन व्यंजनों का स्वाद लाजवाब है, जिसे दूना करने के लिए है- सफेद गुड़ व घी के साथ परोसे जाने वाला बाजरना रोटला। आप सोच रहे होंगे कि बाजरना रोटला क्या है! यह है बाजरे की रोटी, जिसे इस अंचल में बड़े शौक से खाया जाता है। रोटी के अलावा काठियावाड़ी मसाला खिचड़ी है। और हां, वघेरला दही (दही तड़का), फरसाण (नमकीन भुजिया), पापड़, तली हुई हरी मिर्च व कांदा (प्याज़) तो खाने के साथ है ही! 
...और आर्टिस्ट विलेज
सापूतारा बस स्टैण्ड से पैदल दूरी पर है गांधर्वपुर आर्टिस्ट विलेज, विज्ञापनों की होड़ और चमक-दमक से दूर। अगर आप यहां सड़क चलते हुए किसी शख़्स से आर्टिस्ट विलेज के बारे में पूछें तो वो शायद ही इसका पता बता पाए। बस-स्टैण्ड से नासिक रोड वाले हाईवे की बाईं तरफ एक छोटी सड़क है जो आर्टिस्ट विलेज की ओर जाती है। बाहर से देखने पर यह शांत, अलसाई हुई जगह लगती है लेकिन अंदर दाख़िल होते ही यक़ीन हो जाता है कि यह कोई आम जगह नहीं बल्कि कला प्रेमियों का ठिकाना है। यहां हम सूर्या गोस्वामी और चन्द्रकान्त परमार से मिले, जिन्होंने दिल खोलकर हमारा इस्तकबाल किया। ये दोनों दोस्त हैं और आर्टिस्ट विलेज के कर्ता-धर्ता भी। बड़ौदा स्कूल ऑफ फाइन आर्ट्स से पढ़ाई के बाद दोनों ने फ़ैसला किया कि वे अपना जीवन कला को समर्पित करेंगे। 25 साल पहले शहर की चकाचौंध और नौकरी का मोह छोड़ इन्होंने सापूतारा में आर्टिस्ट विलेज की नींव रखी। बरसों की मेहनत व कला के प्रति विश्वास रंग लाया, और अब आर्टिस्ट विलेज में बाक़ायदा आर्ट कैम्प लगते हैं। 
यहां कलाकारों के लिए स्टूडियो हैं जिनमें वो चित्र, हस्तशिल्प व मूर्तिशिल्प जैसी कलाओं के जौहर दिखाते हैं। फीस मामूली है, यही वजह है कि दूर-दूर से आए कलाकार यहां इत्मीनान से कला साधना करते हैं। स्कूल-कॉलेज में पढ़ने वाले बच्चों के लिए भी यह अच्छा केन्द्र है। ख़ास बात यह है कि आर्टिस्ट विलेज में स्थानीय आदिवासियों को हस्तकला दिखाने का भरपूर मौक़ा मिलता है। इतना ही नहीं, उनके हाथों से बना सामान यहां बेचने के लिए रखा जाता है। विलेज में लोगों के ठहरने की सुविधा भी है।
कुछ ख़ास
सापूतारा के प्राकृतिक सौंदर्य को अप्रतिम नहीं कहा जा सकता लेकिन इसकी अपनी विशेषताएं हैं। पहली बात यह कि सापूतारा को गुजरात का इकलौता हिल स्टेशन होने का गौरव प्राप्त है। दूसरा, यह इलाका भील, डांग और वारली जैसी जनजातियों का बसेरा है। वैसे वारली से कुछ याद आया आपको? जी हां, यह वही जनजाति है जिसने दुनिया भर में मशहूर वारली चित्रकला शैली को जन्म दिया है। आप किसी भी वारली चित्र में इस जनजाति के सरल जीवन की झलक देख सकते हैं। वारली चित्र अमूमन पिसे हुए चावलों की लेई से बनते हैं और उनमें महिलाएं, पुरुष, पेड़ और पक्षी शामिल होते हैं। यहां एक और कला का ज़िक्र लाज़िमी है। सापूतारा में आख़िरी शाम हमें वो कला देखने को मिली, जिसके बिना हमारी यात्रा अधूरी रहती। हम रात का खाना खाकर लौट रहे थे कि कानों में शहनाई और ढोलक की मद्धम आवाज़ घुलने लगी। आवाज़ कहीं दूर से आ रही थी, जिसके पीछे-पीछे चलते हुए हम आ पहुंचे एक होटल के लॉन में। यहां जो नज़ारा देखने को मिला वो अद्भुत था। भील जनजाति का एक दल हमारे सामने मस्ती से थिरक रहा था। यह डांगी नृत्य था, जिसमें महिलाओं व पुरुषों की संख्या लगभग बराबर रहती है। डांगी नृत्य की ख़ासियत है कि इसमें नाच के साथ-साथ करतब भी ख़ूब होते हैं। ढोलक की थाप और शहनाई के सुर के साथ क़दमताल मिलाते हुए भील ऐसे नाच रहे थे जैसे किसी उत्सव में शरीक़ हों। महिलाओं के बनिस्बत पुरुषों ने ज़्यादा चमकीले वस्त्र पहने हुए थे। जोश से भरा लेकिन सधा हुआ वो नाच हमें मदहोश कर देने के लिए काफी था। लोकधुनों पर लुभावना नृत्य चलता रहा और हम अपलक उसे देखते रहे। तंद्रा तब टूटी जब आस-पास तालियों की गड़गड़ाहट होने लगी। हमने भी तालियों के साथ आदिवासियों का शुक्रिया अदा किया उस शानदार प्रदर्शन के लिए। हमारी सापूतारा यात्रा का आगाज़ बहुत अच्छा नहीं था लेकिन कहते हैं कि अंत भला तो सब भला।
याद रहे... 
कहीं भी जाने का प्रोग्राम हो, उस जगह के बारे में पहले इंटरनेट पर जानकारी ले लेना बेहतर है। बेशक़, लेकिन कई दफ़ा इंटरनेट से मिली मदद अधूरी होती है या फिर फ़ायदेमंद साबित नहीं होती। इंटरनेट खंगालिए ज़रूर, लेकिन इससे मिली हर जानकारी पर आंख मूंद कर भरोसा करने के लिए नहीं। मसलन, अगर आप इंटरनेट पर सापूतारा के लिए नज़दीकी रेलवे स्टेशन ढूंढते हैं तो वो बिलीमोरा है; वहां से आगे दो रास्ते हैं... एक नेरोगेज लाइन जो वघई स्टेशन तक है, वघई से बस या टैक्सी से सापूतारा पहुंच सकते हैं। दूसरा है... बिलीमोरा स्टेशन से सापूतारा के लिए सीधा सड़क मार्ग। मज़े की बात है कि ज़्यादातर वेबसाइटों पर यही सुझाव मिलता है, यहां तक कि गुजरात टूरिज़्म की साईट पर भी। लेकिन सापूतारा पहुंचने के बाद हमें पता चला कि वहां पहुंचने के लिए नासिक वाला रास्ता ज़्यादा अच्छा है। असल में सापूतारा के लिए नासिक रोड सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन है। यहां से सापूतारा सिर्फ़ 70 किलोमीटर दूर है, बस या टैक्सी लेकर आसानी से पहुंच सकते हैं। यह रास्ता सुविधाजनक है और कम समय लेने वाला भी।
कब व कहां
मानसून में जाएं। बारिश में सापूतारा की छटा देख मन बाग-बाग होना तय है। सापूतारा के आसपास कई झरने हैं। ख़ासतौर पर गिरा जलप्रपात, जो यहां से क़रीब 52 किलोमीटर दूर है। इसके मोहपाश में बंधे बिना आप नहीं रह पाएंगे। 
सापूतारा में कई होटल हैं लेकिन हो सकता है कि पीक सीज़न में वो आपके बजट के लिए मुफ़ीद न रहें। कम किराए और बेहतर सुविधा के लिए गुजरात टूरिज़्म का तोरण हिल रिज़ॉर्ट है। लेकिन इसके लिए आपको बुकिंग काफी पहले करानी होगी। मालेगांव में भी रुक सकते हैं। आदिवासियों के साथ रहना निश्चित रूप से एक अलग अनुभव होगा। 
सनद रहे... 
1. नज़दीकी रेलवे स्टेशन नासिक रोड है। 
2. नासिक से नियमित बसें हैं जो दो घंटे में सापूतारा पहुंचा देती हैं। 
3. इस इलाक़े में सांप ज़्यादा हैं इसलिए सुनसान जगह पर घूमते हुए सावधानी बरतें। 
4. आर्टिस्ट विलेज से आदिवासी हस्तशिल्प की चीज़ें ख़रीद सकते हैं। 
5. आर्टिस्ट विलेज में कैम्प के लिए सूर्या गोस्वामी से बात कर सकते हैं। फोन नंबर है- +919426555809 
6. एटीएम न होने के कारण समस्या हो सकती है, इसलिए ज़रूरत के मुताबिक नक़दी साथ लेकर चलें। 
7. सापूतारा के आस-पास घूमने लायक कई जगह हैं। बच्चे साथ हों तो वांसदा नेशनल पार्क जा सकते हैं। 
8. नज़दीकी एयरपोर्ट सूरत है, सापूतारा यहां से 165 किलोमीटर दूर है। 

(दैनिक जागरण के 'यात्रा' परिशिष्ट में 27 नवम्बर 2011 को प्रकाशित)

Sunday, July 31, 2011

कोंकण किनारे इक ख़ूबसूरत पड़ाव

(आपने यूं तो कई समुद्र तट देखे होंगे लेकिन मैं जिस बीच के बारे में आपको बताने जा रही हूं वो अपने आप में अनूठा है। एक साफ-सुथरा तट, जहां सफेद मखमली रेत है और पारदर्शी पानी है और लोगों का हुजूम? अरे नहीं, वो बिल्कुल नहीं है। बहुत कम लोग हैं जो इस बीच से वाकिफ़ होंगे। यही वजह है कि गंदगी और भीड़ से यह आज भी अछूता है...)

मुम्बई की आपाधापी से दूर, कहीं सुक़ून भरा वक़्त बिताने का मन हुआ तो हमेशा की तरह पहले गोवा ज़हन में आया। लेकिन तभी गोवा में जुटे रहने वाले जमघट की तस्वीर उभरी और वहां जाने का उत्साह ठंडा पड़ गया। फिर शुरू हुई इंटरनेट पर खोजबीन। मुंबई के आस-पास कोई शांत जगह तलाशते हुए तारकरली पर नज़र जा ठहरी। नाम परिचित-सा लगा। तस्वीरें देखकर याद आया कि हमारे फिल्मकार मित्र परेश कामदार ने तारकरली का ज़िक्र किया था, जो हाल में वहां से लौटे थे।
लहलहाते खेतों, ख़ूबसूरत पहाड़ियों और सुरंगों के बीच से गुज़रती हुई ट्रेन हमें कुछ देर में कुडाल स्टेशन पहुंचाने वाली थी। कुडाल महाराष्ट्र के सिंधुदुर्ग ज़िले में है, जो कोंकण रेलवे पर है। यहां से तारकरली क़रीब 45 किलोमीटर दूर है। वैसे, तारकरली जाने के लिए कंकवली या सिंधुदुर्ग रेलवे-स्टेशन भी नज़दीक हैं, लेकिन कम ही ट्रेनें यहां रुकती हैं। इसलिए कुडाल बेहतर विकल्प है। कुडाल स्टेशन पर ऑटो-रिक्शा बहुतायत में हैं जो 350 से 400 रुपए में आपको तारकरली ले जाएंगे।
मछुआरों की बस्ती से
तारकरली के लिए रास्ता मालवण से होकर गुज़रता है। मालवण छोटा लेकिन ख़ूबसूरत क़स्बा है। सड़कें पतली व साफ-सुथरी हैं और ट्रैफिक न के बराबर। सड़क के दोनों तरफ छोटी-छोटी दुकानें हैं और ऊपर घर, जो कोंकणी शैली में बने हैं। यहां कदम रखते ही लगता है जैसे मछुआरों की किसी बस्ती में आ गए हों; हवा पर हावी मछलियों की गंध और जाल व टोकरी लेकर यहां-वहां घूमते मछुआरे। मालवण के ज्यादातर लोग मछुआरे हैं जिनकी कमाई मछलियों की बिक्री पर निर्भर है। आय के दूसरे साधन आम और काजू हैं। इनकी कोंकण क्षेत्र में अच्छी पैदावार है। आप यहां आएं तो आम व काजू ज़रूर खरीदें। आपने अलफांसो आम का नाम सुना है न? इसका घर मालवण में ही है। आप मालवण आकर हापुस आम मांग लीजिए.. यही अलफांसो है। रस से भरा और शाही मिठास वाला आम!!
तारकरली का ख़ूबसूरत तट
मालवण से तारकरली जाने वाला रास्ता बेहद ख़ूबसूरत है। लगता है गोवा के किसी इलाक़े में घूम रहे हों। यहां रहने वाले कोंकणी भी गोवा वालों की तरह ख़ुशमिजाज़ हैं। मेहमाननवाज़ी के मामले में भी आप इन्हें अव्वल पाएंगे। तारकरली में हमने महाराष्ट्र टूरिज़्म के रिज़ॉर्ट में चेक-इन किया। इंटरनेट पर बुकिंग करवा चुके थे इसलिए वहां पहुंचकर हमें ज़्यादा औपचारिकता नहीं निभानी पड़ी। मानसून के बावजूद रिज़ॉर्ट भरा हुआ था। हमारी ख़ुशकिस्मती थी कि हमें समुद्र के सामने वाला कमरा मिल गया। रिज़ॉर्ट में घूमते हुए लगा जैसे किसी जंगल में हों। क़ुदरत के इतने क़रीब आकर सफर की सारी थकान जाती रही। चारों तरफ सुरु (चीड़ से मिलता-जुलता वृक्ष) के लंबे, अनगिनत पेड़ और उनसे छनकर गिरती सूरज की रोशनी; दूसरी तरफ़ नज़र आया चमचमाता बीच जो रिज़ॉर्ट की शान बढ़ाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। कुछ कदम चलते ही हम समुद्र-तट पर थे। सुनसान तट पर सफेद, मुलायम रेत बिछी थी जो धूप में चमकने पर और ख़ूबसूरत लग रही थी। मानसून का मौसम न हो तो यहां पानी बिल्कुल साफ होता है। इतना पारदर्शी कि आप समुद्र के कई फुट नीचे तक देख सकते हैं। इसमें दो राय नहीं कि तारकरली हमारे देश के सबसे ख़ूबसूरत तटों में से एक है। 
रिज़ॉर्ट में बने घर कोंकणी शैली के हैं। हर कमरे के बाहर नल की सुविधा है ताकि आप बीच से लौटकर फ्रेश हो सकें। अगर थक गए हों तो हैमक यानी पेड़ों से बंधे झूले में सुस्ता सकते हैं। यहां एक और चीज़ अच्छी लगी कि कमरों में बिस्तर सीमेंट के बने हुए हैं। ज़ाहिर है, उनकी मेन्टेनेंस की ज़रूरत नहीं पड़ती होगी, लेकिन कमरों की मेन्टेनेंस में कमी लगी। खाना ठीक है पर वो आपको रूम में नहीं बल्कि रेस्तरां जाने पर ही मिलेगा। बेहतरीन लोकेशन के कारण रिज़ॉर्ट की ये कमियां बहुत ज़्यादा नहीं खलतीं। आप यहां आएं तो एमटीडीसी की हाउसबोट में ठहरें, जो बेशक़ एक अलग अनुभव होगा।
जहां मिलती है सागर से नदी
मालवण से 14 किलोमीटर दूर देवबाग है। करली नदी के मुहाने पर बसा छोटा-सा गांव जहां क़ुदरत ज़्यादा मेहरबान लगती है। चारों तरफ सिर्फ़ हरियाली है। देवबाग में बोटिंग के बिना तारकरली का ट्रिप अधूरा है। हम जिस बोट में बैठे, उसका मल्लाह आशिक नाम का शर्मीला-सा लड़का था। आशिक कॉलेज में पढ़ता है और खाली वक़्त में अपने पिता की बोट चलाता है। वो हमें सुनामी आयलैंड दिखाने वाला था। बातों-बातों में पता चला कि गाना, तैराकी और सैलानियों को घुमाना आशिक के पसंदीदा काम हैं। बोट चलाते हुए आशिक ने हमें एक मराठी गाना सुनाया जिसे सुनकर अनायास
द ग्रेट गैम्बलर फिल्म के गाने वो कश्ती वाला क्या गा रहा है…’ की याद आ गई। गाने व दिलक़श नज़ारे का लुत्फ़ उठाते हुए हम सुनामी आयलैंड पहुंचे। 2004 में आई सुनामी की वजह से यह आयलैंड उभरा था, इसीलिए स्थानीय लोग इसे सुनामी आयलैंड कहते हैं। क़ुदरत का एक और नमूना आप यहां देख सकते हैं- नदी और सागर का संगम। एक तरफ शांत बहती करली नदी तो दूसरी तरफ दहाड़ें मारता अरब सागर जैसे नदी को पूरी तरह अपने आगोश में ले लेना चाहता हो। नदी व सागर के बीच मौजूद टापू ऐसे लग रहा था मानो पानी में किसी ने रेत का बिस्तर बिछा रखा हो। आशिक ने बताया कि दीपावली के समय यहां उत्सव का माहौल होता है। उस दौरान टापू पर अस्थाई रेस्तरां खड़े किए जाते हैं और लोग दूर-दूर से यहां आते हैं। हमारा लौटने का बिल्कुल मूड नहीं था लेकिन तेज़ बारिश के आसार लगे और हमें उल्टे पांव भागना पड़ा। लौटते हुए एक दिलचस्प वाक़या हुआ। हमें पानी के अंदर कुछहलचल होती दिखाई दी। ध्यान से देखने पर एक काला-सा जीव नज़र आया। इस बीच नदी किनारे कुछ गांव वाले इकट्ठा हो गए थे, जो उसी तरफ इशारा करते हुए शोर मचा रहे थे। आशिक ने हमें बताया कि एक कछुआ भटककर नदी में आ गया है। यह बहुत बड़ा समुद्री कछुआ था। समुद्री कछुए खारे पानी में रहने के आदी होते हैं। नदी में आकर वो कछुआ शायद घायल हो गया था और ठीक से तैर नहीं पा रहा था। जाल की मदद से हमने उस कछुए को बाहर निकाला और बोट में डालकर वापस समुद्र में छोड़ आए। थोड़ी देर पहले संघर्ष करता एक कछुआ, अब लहरों में शान से हिचकोले खाता हुआ ओझल हो चुका था। उसे घर लौटता देख हमें बेहद ख़ुशी हुई।
एक रॉक गार्डन यहां भी 
देवबाग से हम मालवण के रॉक गार्डन पहुंचे। चंडीगढ़ के रॉक गार्डन की तरह यहां कलाकृतियां तो नहीं दिखती, लेकिन आराम से बैठकर समन्दर की लहरों का मज़ा लिया जा सकता है। समन्दर के बिल्कुल किनारे, चट्टान पर बने इस गार्डन का रख-रखाव अच्छा है। रॉक गार्डन से कुछ ही दूर श्री ब्रह्मानंद स्वामी की समाधि है। समाधि एक प्राचीन गुफा के अंदर बनी हुई है। बाहर एक तालाब है और आस-पास का इलाक़ा काफी शांति व सुक़ून भरा है। 
याद रहेगा मालवणी खाने का स्वाद
तारकरली लौटते समय हमारी मुलाक़ात अजीत भोगवेकर से हुई। अजीत पेशे से बस ड्राइवर हैं और तारकरली में छोटा-सा होटल भी चलाते हैं। उनके होटल का नाम गणपत प्रसाद है। शाकाहारी हो या मांसाहारी, गणपत में आपको हर तरह का भोजन मिलेगा। घर जैसा साफ-सुथरा और लज़ीज़ खाना- आप बेशक़ खाना चाहेंगे.. है न! वैसे, मालवण का ज़िक्र खाने के बिना अधूरा है। मालवणी मसालों से तैयार भोजन का स्वाद देर तक रहता है। ख़ास बात यह कि मालवणी खाना नारियल के बिना पूरा नहीं होता; तक़रीबन हर सब्ज़ी व दाल में इसका इस्तेमाल होता है। नारियल के अलावा मछली व चावल भी खाने में शामिल रहते हैं। अगर आप सी-फूड के शौकीन हैं तो यहां से निराश होकर नहीं लौटेंगे। सी-फूड में मछली, झींगे और केकड़े की कई किस्में यहां मिल जाएंगी। हमारे दिन की शुरुआत घावण-चटनी से हुई । घावण एक तरह की रोटी है जो चावलों से बनती है। इसे आमतौर पर नारियल और हरी मिर्च की चटनी के साथ परोसा जाता है। घावण-चटनी हमें काफी स्वाद लगी। इसके बाद कुछ खाने की ज़रूरत महसूस नहीं हुई और तारकरली के बीच पर हम दिनभर बेफिक्री से सुस्ताते रहे।
कब शाम ढली और कब सूरज समन्दर में डूबा, पता ही नहीं चला। रिज़ॉर्ट से दो मिनट की दूरी पर गणपत होटल है। वहां से फोन पर डिनर का ऑर्डर देकर हम होटल की तरफ बढ़ गए। कुछ देर में ही भोजन तैयार मिला। मटकी दाल, नारियल-आलू-मेथी की भाजी, चावल, गरमा-गरम रोटियां और सोल कढ़ी से सजी मालवणी थाली.. देखते ही मुंह में पानी आ गया। सोल कढ़ी कोकम (महाराष्ट्र का मीठा फल) व नारियल के दूध से मिलकर बनती है, जो पाचक होती है। 
अरब सागर में इठलाता सिंधुदुर्ग
सिंधुदुर्ग यानि समुद्र पर बना किला। बड़ी शिलाओं व कई हज़ार किलो लोहे की छड़ों के सहारे पानी में खड़ी एक बेमिसाल इमारत, जिसे मराठा शासक शिवाजी ने सन् 1664 में बनवाया था। अरब सागर में 48 एकड़ में फैला यह किला देखने लायक है। किले के भीतर जाकर उसकी शान-ओ-शौक़त तो हम नहीं देख पाए लेकिन उससे जुड़े कई दिलचस्प किस्से सुनने को मिले। स्थानीय लोगों ने बताया कि किले की देख-रेख करने वाले किलेदारों की पीढ़ी के कुछ परिवार आज भी किले में रहते हैं। कठिन रहन-सहन और सुख-सुविधाओं के अभाव के बावजूद वो लोग वहीं रहना पसंद करते हैं। दो मुस्लिम परिवार भी हैं जिनकी ख़ास ड्यूटी है- शाम को प्रार्थना के समय नगाड़े बजाना। कहते हैं कि शिवाजी ने ख़ुद उनके पूर्वजों को यह काम सौंपा था जो बदस्तूर जारी है। किले में शिवाजी का मंदिर है जो उनके पुत्र राजाराम ने बनवाया था। शिवाजी का देश में यह इकलौता मंदिर है। मान्यता है कि किले में एक सुरंग है जो कई किलोमीटर लंबी है। समुद्र के अंदर से होती हुई यह सुरंग पास के गांव में निकलती है। 
समुद्र किनारे खड़े हम दूर से ही किले को एकटक निहारते रहे। अंदर जाने का कोई साधन नहीं था क्योंकि मानसून के दौरान किले में जाने की पाबंदी है। बोटवालों को सख़्त निर्देश है कि वहां किसी को न लेकर जाएं। सिंधुदुर्ग को अपलक देखते और इससे जुड़े रहस्यों के बारे में सोचते-सोचते, फिर से मालवण आने का निश्चय कर हम मुंबई लौट चले। 
जाने से पहले...
1. तारकरली जाने के लिए सबसे नज़दीकी रेलवे स्टेशन कुडाल है जो कोंकण रेलवे का अहम स्टेशन है। स्टेशन से तारकरली जाने के लिए बसें तो हैं ही, ऑटो भी मिलते हैं। 
2. मालवण के लिए हर आधे घंटे में बस है। मालवण पहुंचकर तारकरली के लिए ऑटो करें तो सस्ता पड़ेगा। तारकरली यहां से सिर्फ़ 7 किलोमीटर दूर है। 
3. हवाई-मार्ग से जाना हो तो गोवा का डेबोलिम एयरपोर्ट सबसे नज़दीक है। 
4. स्नॉर्क्लिंग, स्कूबा डाइविंग और स्विमिंग का आनन्द लेना चाहते हैं तो मानसून में तारकरली आने से बचें। इस दौरान सिंधुदुर्ग किला और डॉल्फिन प्वायंट भी बंद रहते हैं। 
5. समुद्र-तटों पर लाइफ-गार्ड की व्यवस्था नहीं है इसलिए पानी के खेलों के दौरान सावधानी बरतें। 
6. गणेश चतुर्थी, रामनवमी और दीपावली पर मालवण की छटा देखते ही बनती है। बेहतर होगा यदि इन त्योहारों के समय जाने का प्रोग्राम बनाएं। 
7. तारकरली बीच पर किसी रिज़ॉर्ट में ठहरें ताकि अपने प्रवास का पूरा लुत्फ़ ले सकें। 
8. महाराष्ट्र में दो हाउसबोट हैं जो तारकरली में ही हैं। हाउसबोट में ठहरने के लिए महाराष्ट्र टूरिज़्म से संपर्क कर सकते हैं। इंटरनेट पर बुकिंग करा लें तो बेहतर है। 

(दैनिक जागरण के 'यात्रा' परिशिष्ट में 31 जुलाई 2011 को प्रकाशित)

Monday, April 25, 2011

चलें दक्षिण के मैकलोडगंज

(मैं यहां बायलाकूपे की चर्चा शुरू करूं तो शायद आप मेरी बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं देंगे.. लेकिन अगर कहूं कि मैं दक्षिण के मैकलोडगंज के बारे में कुछ कहना चाहती हूं तो आप यक़ीनन मेरी बात ग़ौर से सुनने लगेंगे.. है न? और लीजिए, जैसे ही मैं दक्षिण के मैकलोडगंज का शब्दचित्र आपके सामने बांधने लगी हूं, मेरी आंखों के आगे वही वैभवशाली भवन आकार लेने लगा है जिसे देखकर मेरे मुंह से एक ही शब्द निकला था... वाह! इसके साथ ही कानों में गूंजने लगी हैं मन्त्रोच्चार की ध्वनियां.. जिन्हें सुनते ही मेरा सारा तनाव बह निकला और मुझे लगा कि मैं ध्यान के सागर में गोते लगा रही हूं।) 
  
मैं आपसे फिलहाल एक ऐसी बस्ती की बात कर रही हूं जिसे भारत में तिब्बती विस्थापितों का दूसरा सबसे बड़ा ठिकाना कहा जा सकता है.. है तो यह कर्नाटक के मैसूर ज़िले में, लेकिन मैसूर से यहां तक पहुंचने में क़रीब दो घंटे का वक़्त लग जाता है। बहुत कम लोग होंगे जो मैसूर जाने के दौरान बायलाकूपे आते होंगे। अक़्सर लोग जब कूर्ग घूमने जाते हैं, तब बायलाकूपे का रुख़ करते हैं। जब आप कूर्ग से मैसूर जाते हैं, तो कूर्ग के कुशलनगर से बाहर निकलते ही दायीं तरफ का मोड़ आपको पांच किलोमीटर के सफर के बाद बायलाकूपे तक ले जाता है। हम भी उन लोगों में से थे जो कूर्ग की ख़ूबसूरती को दिलो-ज़हन में बसाने के बाद बायलाकूपे जाने की इच्छा को दबा नहीं पाए।
बायलाकूपे की बस्ती में
कुशलनगर के बस-स्टॉप से ऑटो लेकर हम चल दिए गोल्डन टेम्पल। बायलाकूपे में कई बड़े मठ हैं, जिनमें से एक नामद्रोलिंग है। मूल नामद्रोलिंग मठ तिब्बत में है। यहां बने नामद्रोलिंग को स्थानीय लोग गोल्डन टेम्पल कहते हैं। बायलाकूपे की सीमा में प्रवेश करते ही हवा में लहलहाते तिब्बती प्रार्थना-ध्वजों ने हमारा स्वागत किया। गोल्डन टेम्पल ले जाने वाली सड़क के दोनों तरफ़ हरे-भरे खेत हैं। शहर के शोरगुल से दूर, शांत सी यह सड़क दिल को ठण्डक पहुंचाती है। गोल्डन टेम्पल से पहले तिब्बती बाज़ार है। बाज़ार से गुज़रते हुए कुछ ही पलों में हम गोल्डन टेम्पल पहुंच गए।
आस्था का प्रतीक
यह तिब्बती बौद्ध धर्म के निंगमा संप्रदाय का मठ है। निंगमा संप्रदाय की नींव भगवान बुद्ध के अवतार गुरु पद्मसंभव ने रखी थी। गोल्डन टेंपल में प्रवेश करने पर लगा जैसे हम किसी दूसरी दुनिया में आ गए हों। यहां भगवान बुद्ध, पद्मसंभव और अमितायुस (भगवान बुद्ध का ही दूसरा अवतार, जिनका नाम अवलोकितेश्वर भी है) की भव्य मूर्तियां हैं, जो मेरी तरह आपको भी विस्मित कर देंगी। भगवान बुद्ध की ऐसी ही मूर्ति मैंने हिमाचल प्रदेश के मैकलोडगंज में देखी थी। लेकिन इन तीन ख़ूबसूरत प्रतिमाओं ने जैसे मुझ पर जादू कर दिया। दीवारों पर बने तिब्बती देवी-देवताओं के आकर्षक चित्र, मन्त्रोच्चार और मोहक ख़ुशबू ने मुझे काफी समय तक मंत्रमुग्ध रखा। इन यादगार पलों को मैंने अपने कैमरे में सहेज लिया। यह बात अच्छी लगी कि यहां मठों के अंदर फोटो खींचने की मनाही नहीं है इसलिए आप बेफिक़्र होकर फोटोग्राफी कर सकते हैं।

गोल्डन टेम्पल के पीछे पुस्तकालय है।
वहीं मैंने बहुत सारे भिक्षुओं को बातचीत करते हुए देखा। उत्सुकतावश जब एक भिक्षु से बात की तो उसने टूटी-फूटी हिन्दी में तिब्बती समुदाय से जुड़ी कई दिलचस्प बातें मुझे बताईं। जिनमें से एक यह कि हर तिब्बती परिवार के सबसे बड़े पुत्र का भिक्षु बनना अनिवार्य होता है, चाहे उसकी रज़ामंदी हो या नहीं। हालांकि अब इस परंपरा का पालन पूरी तरह से नहीं हो रहा। इसके पीछे यही वजह हो सकती है कि नई पीढ़ी पुरानी परंपराओं का निर्वाह करने में ख़ुद को असहज महसूस करने लगी है।
मठ के आस-पास का इलाक़ा साफ-सुथरा और शांति भरा है। चारों तरफ़ ख़ूबसूरत पार्क हैं और वातावरण में अजीब सा सुक़ून है। दिमाग अपने-आप ही ध्यान की मुद्रा में चला जाता है।
गोल्डन टेम्पल के अलावा दो प्रमुख मठ हैं- सेरा जे और सेरा मे। दोनों मठ गेलुग संप्रदाय के हैं जो तिब्बती बौद्ध धर्म, शिक्षा और संस्कृति के केन्द्र के रूप में दुनिया भर में जाने जाते हैं। 

सेरा जे मठ  
यह मठ तिब्बत के सेरा विश्वविद्यालय की तर्ज पर बना है। सेरा जे एक बड़ी शैक्षिक संस्था है जिसमें देश-विदेश से छात्र पढ़ने आते हैं। बायलाकूपे में इसकी स्थापना गुरू गेशे लोबसांग पाल्देन ने सन् 1970 में की थी। यहां क़रीब 5,000 भिक्षु बौद्ध धर्म की पढ़ाई कर रहे हैं। विश्वविद्यालय के अलावा यहां एक बड़ा तिब्बती अस्पताल भी है, जो इसी मठ की देख-रेख में है।
इतिहास के पन्नों से 
1959 में तिब्बत पर चीनी हमले के बाद हज़ारों तिब्बती बेघर हो गए थे। भारत सरकार ने उन्हें बायालाकूपे में 3000 एकड़ भूमि दी, जहां अब 15 हज़ार से भी ज़्यादा शरणार्थी रह रहे हैं। तिब्बती प्रशासन का हेडक्वार्टर हिमाचल प्रदेश में धर्मशाला के पास मैकलोडगंज में है। मैकलोडगंज के बाद बायलाकूपे तिब्बती विस्थापितों की सबसे बड़ी बस्ती है।  
यह प्रतिबंधित क्षेत्र है। आप चाहें तो पूरा दिन इत्मीनान से बिता सकते हैं लेकिन रात को बायलाकूपे में ठहरने के लिए पहले गृह मंत्रालय से 'प्रोटेक्टिड एरिया परमिट' लेना ज़रूरी है। बहरहाल यहां हर शाम होने वाली डिबेट में शामिल होना न भूलें। बहुत सारे भिक्षु वाद-विवाद के मक़सद से एक नियत स्थान पर एकत्रित होते हैं। एक भिक्षु नाटकीय ढंग से कोई सवाल पूछता है और ज़ोर से ताली बजाता है। दूसरा भिक्षु तुरन्त उठकर उसी लहज़े में जवाब देता है। पूरी डिबेट का कोई निष्कर्ष निकले, यह ज़रूरी नहीं लेकिन इसे देखना काफी दिलचस्प है।
बुद्धं शरणं गच्छामि 
पीले और मैरून रंग के लिबास में हर तरफ़ घूमते हुए भिक्षुओं को देखकर लगा जैसे मैं भारत में नहीं बल्कि तिब्बत में हूं। निर्वासन में रहने के बावजूद किसी तिब्बती के चेहरे पर शिकन नहीं दिखी। जन्मभूमि से दूर रहने वालों के लिए सबसे बड़ा ख़तरा अपनी संस्कृति और परंपरा को खो देने का होता है। लेकिन भारत में रह रहे तिब्बती लोगों ने अपने तौर-तरीक़ों और संस्कृति को काफी हद तक सहेजकर रखा है। प्रार्थना का वक़्त हुआ तो एक बार फिर हम गोल्डन टेम्पल की तरफ बढ़ गए। टेम्पल में रोज़ाना प्रार्थना सभा होती है। सभा शुरू हुई और हॉल में जमा बौद्ध भिक्षुओं ने तीन बार लेटकर नमन किया। फिर शुरू हुआ मन्त्रोच्चार का सिलसिला। मन्त्र पढ़ते हुए वो बच्चे भी दिखे जो कुछ ही देर पहले पार्क में भाग-दौड़ और मस्ती कर रहे थे। भक्ति में लीन वही बच्चे अब बेहद शांत और सौम्य लग रहे थे।
ज़ायका तिब्बत का 
अब पेट-पूजा की बात। अगर आपको भी तिब्बती भोजन पसन्द है तो बायलाकूपे में इसका मज़ा ज़रूर उठाएं। नामद्रोलिंग मठ के बाहर एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स है जहां खाने-पीने की कई दुकानें हैं। तिब्बत के कुछ व्यंजन यहां आज़माए जा सकते हैं जैसे टोफू’ (सोयाबीन के दूध को जमाकर बनाया गया आहार) मोमोज़ और थुक-पा (नूडल्स और सब्जियों से बना सूप)। पीने के लिए पो-चा है। पो-चा बटर टी है, जिसे तिब्बती बो-झा कहते हैं। इसका स्वाद चाय जैसा नहीं बल्कि कुछ कसैलापन लिए होता है। आम चाय यहां स्वीट टीहै। हमने वेज मोमोज़ और थुक-पा का ऑर्डर दिया, जिसे खाकर शॉपिंग के इरादे से हम आगे चल दिए। बाज़ार में फ्री तिब्बतस्लोगन के झोले और चीनी सामान का बहिष्कार करें वाले पोस्टर बिकते हुए दिखे। यहां मोल-भाव खूब होता है और आप ठीक दाम पर तिब्बती सामान ख़रीद सकते हैं.. जैसे कपड़े, सजावटी चीज़ें, मुखौटे और अगरबत्तियां वगैरह। ख़ास तौर से शेज़वान मिर्च जैसे तिब्बती मसाले, जो आमतौर पर आपको बाज़ार में नहीं मिलेंगे।
सूरज अस्त होने को था और पंछी अपने घोंसलो की तरफ लौट रहे थे। लेकिन मेरे ज़हन में
एक सवाल रह-रह कर उठ रहा था कि क्या तिब्बती मूल के लोग कभी अपने वतन लौट पाएंगे? क्या उन्हें उनके मौलिक अधिकार और खोई हुई पहचान वापिस मिलेगी जिसका वो बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं... यह सोचते हुए मैंने भी वापसी की राह पकड़ ली। 

याद रहे...
बायलाकूपे का मौसम सुहावना रहता है। बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले लोग देश-विदेश से यहां साल भर आते रहते हैं। लेकिन बायालकूपे का असली रंग देखना हो तो लोसर (तिब्बती नया साल), सागा दावा (बुद्ध जयंती), नेशनल अपराइसिंग डे (10 मार्च, तिब्बत पर चीन के हमले का दिन) या धर्मगुरू दलाई लामा के जन्मदिवस जैसा कोई अवसर चुनें। 

(दैनिक जागरण के 'यात्रा' परिशिष्ट में 24 अप्रैल 2011 को प्रकाशित)

Wednesday, April 6, 2011

अश्व की वल्गा लो अब थाम, दिख रहा मानसरोवर कूल


मानसरोवर जादू कर देता है, कहीं पढ़ा था। कैलाश-मानसरोवर जाकर लोग सम्मोहित हो जाते हैं, वशीभूत हो बैठते हैं। मैं बिना जाए ही इसके वश में हूं। भले ही वहां की यात्रा नहीं कर सकी हूं, लेकिन कल्पनाओं में हज़ारों फेरे लगाए होंगे कैलाश पर्वत के, डुबकियां लगाई होंगी मानसरोवर में।
कुछ जानकार जब अपनी यात्रा के अनुभव बताते हैं, सुनकर द्वेष होने लगता है। हो भी क्यों न? जगह ही ऐसी है- मंत्रमुग्ध कर देने वाली, कभी न भुलाई जाने वाली। जाने का मन करे, और एक बार जाओ तो लौटने की इच्छा न हो। लौटकर आओ तो बार-बार जाने को दिल उमड़े। छत्तीसगढ़ में मेरे एक परिचित हैं। घूमने-फिरने के शौकीन हैं, कैलाश यात्रा कर चुके हैं। जब-तब बात होती है। अक़सर वो फख़्र से कहते हैं- कैलाश-मानसरोवर की यात्रा के बिना सारी यात्राएं अधूरी हैं, तुम एक बार ज़रूर जाओ। सुनते ही मन में टीस उठती है। जाना है ही, लेकिन बुलावा तो आए। सुना है कि बुलावा न हो तो आप वहां जा नहीं सकते। 
जहां मिलता है ब्रह्म ज्ञान
शिव का धाम है कैलाश-मानसरोवर। देवलोक है। कहते हैं कि मौत के बाद आत्माएं यहीं वास करती हैं। यह वो जगह है जहां ब्रह्म ज्ञान मिलता है। इसीलिए यहां देवता, दानव और ऋषि-मुनि सदियों से तपस्या करते रहे हैं। सैलानियों के अलावा धर्म-कर्म में विश्वास रखने वाले लोग भी आते हैं। हर साल.. हज़ारों की तादाद में। हिन्दुओं के लिए मानसरोवर किसी तीर्थ से कम नहीं है। बौद्ध और बोन (बौद्ध धर्म से भी पुराना धर्म जिसकी उत्पत्ति कैलाश में हुई मानी जाती है) अनुयायियों के लिए इससे पवित्र स्थान कोई नहीं है। जैन लोग भी इस जगह को पूजते हैं। मान्यता है कि जैनियों के पहले तीर्थंकर ऋषभ देव ने सिर्फ़ आठ क़दमों में कैलाश की परिक्रमा कर ली थी।
बहुत कठिन है डगर मानसरोवर की

कैलाश-मानसरोवर की यात्रा जीवन की सबसे मुश्किल यात्राओं में से है। सुदूर हिमालय में तिब्बत की गोद में बसा है मानसरोवर। इस यात्रा के लिए पहले अनुमति नहीं लेनी पड़ती थी। 1920 और 1930 के दशक में पंडित राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत की कई यात्राएं कीं और दिलचस्प यात्रा वृत्तांत लिखे। वो दौर अलग था। लेकिन तिब्बत अब चीन के आधिपत्य में है। इसलिए भारत और चीन सरकार की सहमति ज़रूरी हो गई है। अगर आप किसी ग्रुप के साथ न जा रहे हों तो वीज़ा मिलने की संभावना भी नहीं है।

कैलाश-मानसरोवर जाने के दो नज़दीकी रास्ते हैं। एक उत्तराखंड से होकर और दूसरा नेपाल से। उत्तराखंड के पिथौरागढ़ से धारचूला होते हुए लिपूलेख पास पहुंचते हैं, और फिर तिब्बत। यह यात्रा भारत सरकार के कुमाऊं मंडल विकास निगम की देख-रेख में संपन्न होती है। नेपाल से जाना हो तो प्राइवेट टूर ऑपरेटर अच्छा विकल्प हैं। महंगा होने के बावजूद यह रूट ज़्यादातर यात्रियों की पसंद है। काठमांडू होकर पहले नेपाल-चीन सीमा पर स्थित मैत्री-पुल पहुंचा जाता है। यहां यात्रियों के ज़रूरी क़ागज़ात की जांच होती है। हरी झंडी मिलने पर यात्री तिब्बत के नायलम क्षेत्र की तरफ बढ़ते हैं। फिर दारचेन आता है जो बेस स्टेशन है। यहीं से शुरू होती है विराट कैलाश पर्वत की परिक्रमा।
समुद्रतल से क़रीब 25 हज़ार फीट की ऊंचाई पर है कैलाश पर्वत। यहां तापमान शून्य से बहुत नीचे रहता है। सर्द हवाएं चलती हैं, भारी बर्फ़बारी होती है। इंसान तो दूर, परिंदा भी नज़र नहीं आता। हज़ारों फीट की ऊंचाई और ऑक्सीज़न की कमी के बीच लंबी पैदल यात्रा करनी होती है।
मुक्ति की चाह में 
मान्यता है कि एक बार कैलाश की परिक्रमा कर लें तो सारे पापों का नाश हो जाता है। 10 फेरों में 'कल्पा' यानी एक युग के पाप धुल जाते हैं और 108 फेरे लगाने से निर्वाण मिल जाता है। मज़े की बात है कि एक चक्कर 52 किलोमीटर का है। इसका मतलब यह कि 10 चक्कर लगाने के लिए कई दिन चाहिए और गज़ब की इच्छाशक्ति व स्टेमिना भी। एक और मज़े की बात यह कि कैलाश की संरचना कुछ ऐसी है कि आधी परिक्रमा के दौरान यह दिखता है जबकि आधी में आंखों से ओझल रहता है।
चलिए, वापस चलते हैं परिक्रमा पर। बौद्धों की परिक्रमा ज़्यादा कठिन होती है। मेरे तिब्बती मित्र ताशी वांगचुक बताते हैं कि बौद्ध लेटकर साष्टांग प्रणाम करते हुए कैलाश का चक्कर लगाते हैं। धर्मगुरु दलाई लामा कहते हैं कि
"जब तुम परिक्रमा करते हो, तुम्हारे पैर एक क़दम से दूसरे तक का रास्ता तय करते समय बीच की जगह छोड़ देते हैं, लेकिन जब साष्टांग प्रणाम करते हुए जाते हो तब तुम्हारी देह उस पवित्र धरती को छूती है, उसे अपनी देह के घेरे में बांधती है।"
कैलाश की विशालता स्तब्ध कर देने वाली है। दूर से देखने पर यह पत्थर और बर्फ़ के मिले-जुले पिरामिड जैसा लगता है। उस पर बर्फ़ की सीढ़ियां अचरज में डाल देती हैं। गर्मी के दिनों में जब बर्फ़ चटकती है तो गर्जना होती है। श्रद्धालु मानते हैं कि यह शिव के मृदंग की आवाज़ है। इसे देखना और सुनना दिव्य है, किसी ईश्वरीय अनुभव के जैसा। कैलाश के चरणों में गौरी कुंड है। हल्का हरा रंग लिए हुए यह छोटी सी झील है.. किसी ख़ूबसूरत गहने जैसी। पौराणिक कथाओं की मानें तो इस कुंड में मां पार्वती ने
शिव को पति रूप में पाने के लिए घोर तप किया था।
कैलाश चार नदियों का उद्गम स्थल है- कर्नाली (गंगा की सहायक नदी), सतलुज, ब्रह्मपुत्र और सिंधु। कैलाश की चारों दिशाओं में अलग-अलग जानवरों की आकृतियां नज़र आती हैं। पूर्व दिशा अश्वमुख जैसी है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में शेर और दक्षिण में मोर का मुख है। चारों दिशाओं से एक-एक नदी का उद्गम होता है। कैलाश के कपाल से उतरकर ये नदियां एशिया के अलग-अलग हिस्सों में बहती हैं। 
बात मानसरोवर की 
यह दुनिया में सबसे ऊंची, और ताज़े पानी की इकलौती झील है। ख़ूबसूरत इतनी कि नज़रें न हटें। कहते हैं रात के वक़्त, ख़ासतौर से चांदनी में, यह और ख़ूबसूरत व रहस्यमयी लगती है। मानसरोवर का यह नयनाभिराम नज़ारा मैंने तस्वीरों में ही देखा है- सुंदर, भव्य, और गरिमा से भरा हुआ। झील में नीला, हरा, बैंगनी, और न जाने कौन-कौन से रंग परिलक्षित होते हैं। कुछ लोगों ने इसमें सात रंग भी देखे हैं। पानी में छिटकते इन्द्रधनुषी रंग और उनके बीच शान से तैरते हुए राजहंस.. यह किसी दिवास्वप्न से कम नहीं। यहां बाबा नागार्जुन की एक कविता याद आ रही है, जिसमें उन्होंने कैलाश-मानसरोवर का ख़ूबसूरत ज़िक्र किया है।
"
अमल धवल गिरि के शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है
छोटे-छोटे मोती जैसे
उसके शीतल तुहीन कणों को
मानसरोवर के उन स्वर्णिम
कमलों पर गिरते देखा है
बादल को घिरते देखा है
तुंग हिमालय के कंधों पर
छोटी-बड़ी कई झीलें हैं
उनके श्यामल नील सलिल में
समतल देशों से आ-आकर
पावस की उमस से आकुल
तिक्त-मधुर विषतंतु खोजते
हंसों को तिरते देखा है।"

कुछ लोग कहते हैं कि ब्रह्म मुहूर्त के समय मानसरोवर में सुनहरी राजहंस भी आते हैं। ख़ुशक़िस्मत होगा वो जिसने सुनहरी हंस देखे होंगे।

मानसरोवर के दूसरी तरफ राक्षसताल है। गंगा-चू नाम की एक छोटी नदी इन दोनों झीलों को जोड़ती है। कहते हैं कि रावण ने इस झील के किनारे बैठकर शिव की आराधना की थी, इसलिए इसका नाम रावणताल भी है।

...बैठकर किसी कोने में करो ध्यान
एक बौद्ध प्रार्थना है- "बैठकर किसी कोने में ध्यान करो, यूं कि जैसे तुम कोई घायल पशु हो।" हिन्दू दर्शन कहता है कि शरीर को जितना कष्ट होगा, उतना ही पुण्य भी मिलेगा। हम जब तक़लीफ़ में होते हैं तो आस्था जाग उठती है। हम भगवान को याद करने लगते हैं। मानसरोवर की यात्रा में यह दर्शन सटीक बैठता है। जितना कष्ट, उतनी ही संतुष्टि। स्कंद पुराण में लिखा है- "जैसे ओस सूख जाती है सुबह होने पर, पाप सूख जाते हैं हिमालय दर्शन होने पर।" एकचित्त होकर हिमालय की गोद में बैठें तो भक्तिभाव स्वत: ही फूटेगा और निर्मल हो जाएगा सब।
ऊंचे-ऊंचे शिखर, बर्फ़ से ढके हुए, उदात्त। और उनमें समाया हुआ अजीब-सा खालीपन। ऐसा खालीपन जिसे ख़ुद में भर लेने का मन करे। ऐसा रहस्य जिसे सुलझाने का और उसमें ही समा जाने का दिल करे। कुछ यात्री कैलाश पर सामान छोड़कर आते हैं, अपना या अपने किसी प्रिय का कपड़ा, कोई चीज़, बाल या नाख़ून वगैरह।
कीथ डोमेन की किताब 'द सेक्रेड लाइफ ऑफ तिब्बत' में लिखा है कि "किसी शक्ति-स्थल पर अपने देवता के लिए स्मृति-चिह्न छोड़ आने का अर्थ है उसके लिए अपनी उपस्थिति छोड़ आना, ताकि वह उसे याद रखे विशेषकर जब तीर्थयात्री मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच का रास्ता पार कर रहा हो।" 
मानसरोवर प्रकृति का प्रतीक है। हम सब कितने बौने हो जाते हैं प्रकृति के सामने। प्रकृति के अपने क़ायदे हैं। लेकिन मानसरोवर में कोई क़ायदा नहीं है। बल्कि यहां बंधन टूटते हुए लगते हैं। सब-कुछ स्वच्छंद है। न कोई मंदिर न मूर्ति। न ही पूजा-पाठ करने की विवशता। अगर कुछ है तो सिर्फ़ संकल्प और दृढ़ विश्वास। ऊपरी सत्ता को महसूस करने का खुला मौक़ा है। अडिग रहने की इच्छाशक्ति है... कैलाश पर्वत जैसी अडिग शक्ति।
कैलाश-मानसरोवर की यात्रा में जो परम सुख है, उसे शब्दों में बयां करना मुमकिन नहीं। एक परिचित ने कैलाश-मानसरोवर से लौटकर जो आप-बीती मुझे बताई उसे सुनकर मैं निःशब्द रह गई।
 
एक अलौकिक अनुभव 
कैलाश-मानसरोवर की यात्रा अलौकिक है। इस यात्रा के दौरान कई पल ऐसे आते हैं जब सब थम जाता है। आंखें चुंधियाने लगती हैं, आंसू बहने लगते हैं, अंदर का सारा मैल निकल जाता है, मन की स्लेट साफ हो जाती है। हर कोई निश्छल और निष्कपट हो जाता है। यहां ख़ुद से सामना होता है, अन्तर्मन से साक्षात्कार होता है। यहां आकर कुछ लोग या तो बिल्कुल मौन रहते हैं, या फिर बिलख-बिलख कर रोने लगते हैं। मोह-माया, सांसारिक उलझनें.. सब बेमानी लगते हैं। आत्मशुद्धि होने लगती है। कैथार्सिस (विरेचन) होता है। लामा अंगरिका गोविंदा ने कहा है- "हर तीर्थयात्रा, विशेषकर कैलाश परिक्रमा, में वह क्षण आता है जब यात्री का अहं टूटता है, अपने से रिश्ता टूटता है। और जैसे ही यह होता है, भीतर विराट को ग्रहण करने की रिक्ति आ जाती है।" 
कैलाश-मानसरोवर में हर साल 12 जून को 'सागा दावा' उत्सव मनाया जाता है। तिब्बती कैलेंडर के मुताबिक चौथे महीने के 15वें रोज़ पूर्णमासी के दिन यह उत्सव होता है। कहते हैं इस दिन 'शाक्यमुनि' यानि गौतम बुद्ध का जन्म हुआ और यही वो दिन है जब उन्हें निर्वाण प्राप्त हुआ था। ज़्यादातर श्रद्धालु इसी समय कैलाश यात्रा पसंद करते हैं। इस दिन तिब्बती मूल के लोग 'तारबुचे' यानि प्रार्थना-डंडिका पर ध्वज लहराकर पारंपरिक नृत्य करते हैं। सागा दावा के दिन बौद्ध मांसाहार से दूर रहते हैं। 
कहते हैं कि आप जितने ऊंचे होते जाते हैं, उतने ही अकेले भी। बिल्कुल सत्य है। आध्यात्मिक यात्रा में यह बात उतनी ही खरी बैठती है जितनी जीवन की दूसरी यात्राओं में। सबकी अपनी-अपनी यात्राएं हैं, अपनी-अपनी चढ़ाइयां हैं। किसी के लिए रुपए-पैसे की अहमियत है और भौतिकवादी चढ़ाई ही सब-कुछ है, तो कुछ लोग हैं जो अध्यात्मिक ऊंचाइयों को पाकर ही संतुष्ट होते हैं।
मानसरोवर एक अंतर्यात्रा है, अल्टीमेट जर्नी है। कहते हैं, वहां जाकर मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष मिले या न मिले, कैलाश यात्रा पर ज़रूर जाना है। एक बार उस ऊंचाई तक पहुंचना है। पक्का यक़ीन है कि मैं जल्द ही ख़ुद को कैलाश के समक्ष नतसिर होते हुए देखूंगी।
-माधवी 

('अहा ज़िंदगी' पत्रिका के अप्रैल 2011 'यात्रा विशेषांक' में प्रकाशित, चित्र गूगल से)
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...