Thursday, September 1, 2011
Tuesday, August 23, 2011
मैं उसे
(अशोक वाजपेयी के संग्रह 'उम्मीद का दूसरा नाम से'
एक प्रेम कविता)
एक प्रेम कविता)
मैं उसे पुकारना चाहता हूं
संसार की हज़ारों भाषाओं और बोलियों में
मैं हरेक भाषा में उसके नाम का
अनुवाद करना चाहता हूं
अनुवाद करना चाहता हूं
मैं संसार की तमाम भाषाओं में
प्रेम, प्रतीक्षा, कामना के
प्रेम, प्रतीक्षा, कामना के
पर्याय खोजकर
उनका उच्चारण करना चाहता हूं
उनका उच्चारण करना चाहता हूं
ताकि उससे हज़ारों शब्दों में प्रेम
हज़ारों शब्दों से उसकी प्रतीक्षा
और कामना कर सकूं
हज़ारों शब्दों से उसकी प्रतीक्षा
और कामना कर सकूं
उस अकेली अद्वितीया को
हज़ारों नामों से घेर सकूं।
हज़ारों नामों से घेर सकूं।
Friday, August 12, 2011
'लिखने से अकेलापन पैदा होता है'
जब मैं व्यवसायिक रूप से लेखक बना तो दिनचर्या सबसे बड़ी मुसीबत बन गई। इससे पहले जर्नलिस्ट था, तो रातों को काम करना पड़ता था। चालीस साल की उम्र में मैंने पूरा समय लिखने का सोचा तो पहले-पहल सुबह 9 बजे से 2 बजे तक लिखता था। फिर मेरे बेटे स्कूले से घर आ जाते थे। मुझे कड़ी मेहनत की आदत थी इसलिए पूरी शाम ज़ाया करने के अपराधबोध में शाम को भी लिखने की कोशिश की। फिर मैंने पाया कि शाम का किया सारा काम मुझे सुबह दोबारा करना पड़ता था। इसलिए लिखने का काम अब मैं सिर्फ़ सुबह 9 से 2.30 बजे तक करता हूं। शाम को साक्षात्कार, मिलना-जुलना, बाकी काम।
दूसरी समस्या मुझे यह है कि मैं सिर्फ़ अपने परिचित माहौल में ही लिख सकता हूं, जिसमें मेरे काम की गर्माइश मैंने ख़ुद पैदा की हो। मैं किसी और के टाईपराईटर पर या होटलों में नहीं लिख पाता। यह समस्या इसलिए बढ़ जाती है जब यात्रा के दौरान काम रुक जाता है। नि:संदेह यह बहाने काम न करने के लिए हम ख़ुद गढ़ते हैं। हर माहौल में आप 'Inspiration' की उम्मीद करते हैं। इस शब्द को रुमानी लोगों ने बहुत भुनाया है। मार्क्सवादी लोग इस शब्द में ज़्यादा विश्वास नहीं करते। फिर भी, जो हो, मेरा यह मानना है कि आप एक मन:स्थिति में ही आसानी से लिख पाते हैं और चीज़ें ख़ुद-ब-ख़ुद उतरती जाती हैं। उस समय सारे बहाने- जैसे कि परिचित माहौल या घर में ही लिख पाना इत्यादि- ग़ायब हो जाते हैं। वह क्षण तब आता है जब आपके विचारों में सही थीम और उसे निभा सकने का तरीका स्पष्ट होता है। फिर वह आपका मनपसन्द होना चाहिए। आपकी नापसन्दगी का काम करना सबसे ख़राब तरह का काम है।
पहला पैराग्राफ सबसे कठिन होता है। मैंने कई बार पहला पैराग्राफ लिखने में महीनों लगाए हैं। वह एक बार ठीक उतर जाए तो फिर बाकी आसान है। पहले पैराग्राफ में आप पूरी किताब की समस्याओं को सुलझाते हैं। थीम परिभाषित होता है, स्टाईल और फिर लय। मेरे साथ तो पहला पैराग्राफ नमूना होता है बाकी किताब का। इसलिए कई दफ़ा उपन्यास लिखने से अधिक कठिन काम कहानी लिखना होता है।
लिखने से अकेलापन पैदा होता है, वह शक्ति का अकेलापन है। लेखक कई बार यथार्थ को दिखाने की कोशिश में उसे वास्तविकता से अलग कर देता है- अपने ही Ivory Tower निर्मित कर लेता है। जर्नलिज़्म उसके लिए इस स्थिति में ढाल की तरह काम आता है। मैं कुछ जर्नलिज़्म करता रहता हूं ताकि वह मुझे वास्तविकता से जोड़े रखे, ख़ासकर राजनीति से। One Hundred Years of Solitude के बाद मुझे वह एकाकीपन महसूस हुआ जो प्रसिद्धि से पैदा होता है। मेरे मित्रों ने मुझे उससे उबरने में मदद की।
-'अन्यथा' से साभार
Monday, August 8, 2011
कवि रूमी को पढ़ते हुए
(आज रूसी कवि अनातोली परपरा की एक कविता)
कवि ने कहा मुझसे
"अन्धकार है मूर्खता
और
प्रकाश बुद्धिमत्ता"
और
प्रकाश बुद्धिमत्ता"
कोई अन्त नहीं जिनका
लेकिन जब नहीं होती
जीवन में कविता
बुद्धिमत्ता बदल जाती है
मूर्खता में
और मूर्खता
ले लेती है जगह मूर्खता की।
(अनुवाद: लीलाधर मंडलोई)
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