Sunday, July 7, 2013

गुलेरी जयंती पर विशेष

(साहित्य के पुरोधा पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की आज 130वीं जयंती है। गुलेरी जी की रचनाओं के बारे में इतना सब लिखा, पढ़ा व सुना जा चुका है कि कुछ और कहना सूरज को दीया दिखाने समान है। दो साल पहले पैतृक घर गुलेर जाना हुआ तो मैं गुलेरी जी की निजी डायरी अपने साथ मुंबई ले आई थी। यह वह डायरी है जिसे गुलेरी जी के पौत्र यानी मेरे पिता डॉ. विद्याधर शर्मा गुलेरी अपनी सबसे बड़ी संपत्ति मानते थे। परदादा जी की डायरी पढ़ते हुए उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानने का सौभाग्य मुझे मिला, वहीं उनके अपने शब्दों में उनका परिचय पाकर मैं अभिभूत हो उठी। इसे हिन्दी-साहित्य का दुर्भाग्य माना जाना चाहिए कि पाठकवर्ग गुलेरी जी की उन अधिकांश रचनाओं से वंचित रहा है, जो वे 39 वर्ष की अल्पायु में लिखकर चले गए। प्रतिभापुत्र गुलेरी जी मुख्यतया उसने कहा था कहानी से साहित्य-प्रेमियों में अपनी पहचान रखते हैं, लेकिन कहानी लेखन के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी उनका योगदान अप्रतिम है। भाषा एवं साहित्य से इतर दर्शन, इतिहास, पुरातत्व, धर्म, ज्योतिष, पत्रकारिता व मनोविज्ञान जैसे अनेक विषयों पर गुलेरी जी की गहरी पैठ थी। गुलेरी जी के रचनाकर्म को पाठक अच्छे से जान पाएं, इस कामना के साथ उनका यह लेख, जो मूल अंग्रेजी से अनूदित है।)
गुलेरी जी अपने शब्दों में
मैं पंजाब प्रांत के काँगड़ा जिले में गुलेर नामक ग्राम निवासी सारस्वत ब्राह्मणों के सम्मान्य कुल का वंशज हूँ। ज्योतिष के विद्वान और पंचांग विद्या के कर्ता के रूप में मेरे प्रपितामह की प्रसिद्धि उन दिनों में पटियाला और बनारस तक फैली हुई थी। हमारे वंश के लोग माफी और जागीर की भूमि का उपभोग करते हैं और हम इतिहास-प्रसिद्ध गुलेर के राजा कटोच क्षत्रियों के मुख्य पुरोहित और गुरु हैं। गुलेर के राजा ने मेरे पिताजी को गुरु के रूप में पालकी, गद्दी और ताजीम का सम्मान प्रदान किया था और उनके बाद मुझे भी वही प्रतिष्ठा प्राप्त है।
मेरे पिता पंडित शिवरामजी, अपने समय में बनारस के विशिष्ट संस्कृत विद्वान माने जाते थे और जयपुर के स्वर्गीय महाराजा रामसिंह जी बहादुर ने अपने दरबार के राजपंडित पद के लिए उनका चयन किया था। वे जयपुर दरबार के वरिष्ठ पंडित थे और लगभग 48 वर्ष तक जयपुर के संस्कृत कॉलेज में उपाध्यक्ष एवं संस्कृत, व्याकरण, भाषा विज्ञान और वेदान्त, दर्शन के आचार्य पर प्रतिष्ठित रहे। स्वर्गीय एवं वर्तमान महाराजा तथा समाज के सभी वर्गों के लोगों से प्रखर पाण्डित्य तथा निर्मल चरित्र के कारण उनको महान समादर प्राप्त था। वे जयपुर में संस्कृत अध्ययन के आद्य प्रवर्तकों में थे और उनकी शिष्य मण्डली में देश के बहुत से प्रसिद्ध पंडित हैं तथा तीन को तो भारत सरकार द्वारा महामहोपाध्याय का सम्मान भी प्राप्त हो चुका है।
मेरा जन्म जयपुर में ही हुआ और मैंने महाराज कॉलेज में शिक्षा पाई। स्कूल व कॉलेज की सभी कक्षाओं में मैं सर्वोच्च स्थान एवं पारितोषिक पाता रहा। मैंने माध्यमिक परीक्षा 1897 ई. में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1899 ई. में मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एण्ट्रेन्स परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और विश्वविद्यालय की इस परीक्षा के वरिष्ठता क्रम में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। जयपुर राज्य में शिक्षा के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व अवसर था। अत: महाराजा साहिब बहादुर की ओर से सार्वजनिक शिक्षा विभाग द्वारा मुझे स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। साथ ही, मैंने उसी वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1901 ई. में मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रथम वर्ष कला परीक्षा में द्वितीय श्रेणी प्राप्त करके उत्तीर्ण हुआ। इस परीक्षा में अंग्रेजी के अतिरिक्त मेरे विषय तुर्क, ग्रीक और रोमन इतिहास, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, संस्कृत और सामान्य एवं उच्चतर गणित रहे थे। इसके साथ ही मैंने हिन्दी में मौलिक रचना प्रस्तुत करके वैकल्पिक परीक्षा में सफलता प्राप्त की। मेरे एक आचार्य द्वारा मेरे नाम लिखे गये पत्र के उद्धरण से ज्ञात होगा कि मैंने कलकत्ता के सभी परीक्षार्थियों में अंग्रेजी गद्य-लेखन में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था।
विद्यार्थी अवस्था में ही स्वर्गीय कर्नल स्विन्टन जैकब और कैप्टन ए.एफ. गैरट आर.ई.एम. ने मुझे जयपुरस्थ ज्योतिष यंत्रालय के यंत्रोद्धार के निमित्त सहायक के रूप में चुन लिया था। कठिन एवं मौलिक कार्य में मैंने जो सहायता की, उसमें मेरी सफलता को प्रमाणित करते हुए राज्य की ओर से मुझे 200 रु. का पारितोषिक प्रदान किया गया। इसके लिए ऊपरिलिखित दोनों महानुभावों ने जो संलग्न प्रमाणपत्र प्रदान किए हैं, वे साक्षीभूत हैं।
अंग्रेजी, मानसिक एवं नैतिक विज्ञान और संस्कृत विषय लेकर मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1903 ई. में बी.ए. परीक्षा पास की और विश्वविद्यालय के सफल परीक्षार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। जयपुर के महाराजा कॉलेज अथवा राजपूताना के किसी भी कॉलेज से कोई भी परीक्षार्थी अब तक ऐसी सफलता प्राप्त नहीं कर सका था। अत: इन शिक्षालयों के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना थी। राज्य की ओर से मुझे पुन: स्वर्णपदक और 300 रु. के मूल्य की पुस्तकें प्रदान करके पुरस्कृत किया गया। उस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने के नाते मैंने नॉर्थ ब्रुक स्वर्णपदक भी प्राप्त किया।
मनोविज्ञान एवं कर्तव्यशास्त्र विषय लेकर मैंने एम.ए. उपाधि के लिए परीक्षा के निमित्त आवश्यकता से भी अधिक अध्ययन किया परन्तु स्वास्थ्य की गड़बड़ी ने मुझे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया।
संस्कृत के विश्रुत विद्वान अपने पिताजी से कई वर्षों तक स्वतंत्र रूप से अध्ययन करने का असाधारण सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था। मैं संस्कृत बहुत अच्छी तरह जानता हूँ और उच्चतर एवं मौलिक शोध को लक्ष्य में रखकर मैंने वैदिक, पौराणिक, साहित्यिक एवं वेदान्तक विषयक संस्कृत साहित्य के अंगों का विशिष्ट अध्ययन किया है। मैंने संस्कृत का आरम्भिक अध्ययन प्राचीन पद्धति से किया जो बहुत ठोस होता है। अंग्रेजी शिक्षा ने मुझे वह कसौटी प्रदान कर दी है जिसका कि पाश्चात्य विद्वान प्राचीन भाषा में संशोधन के उद्देश्य के लिए प्रयोग करते हैं।
मैंने इण्डियन एन्टीक्वेरी एवं अन्य संस्कृत और हिन्दी सावधिक पत्र-पत्रिकाओं को बहुत से विद्वतापूर्ण लेखों द्वारा योगदान दिया है। इण्डियन एन्टीक्वेरी में प्रकाशित मेरे लेखों की विशिष्ट प्राच्य विद्याविदों ने प्रशंसा की है। जब महामहिम ब्रिटिश सम्राट भारत आये तो मैंने उनके लिए संस्कृत में स्वागत गान की रचना की। सुप्रसिद्ध डच विद्वान डॉ. कैलेण्ड (उद्वेच निवासी) ने एतन्निमित्त मेरी बहुत प्रशंसा की। मैंने कतिपय आद्यावधि अप्रकाशित संस्कृत ग्रन्थों की समीक्षा एवं व्याख्यात्मक प्रस्तावना और टिप्पणियों सहित सम्पादन कार्य भी हाथ में लिया है। जयपुर राज्य द्वारा संचालित संस्कृतोपाधि की परीक्षाओं में मैं साहित्य, धर्मशास्त्र और व्याकरण विषयों का परीक्षक होता हूँ तथा राजपूताना मिडिल स्कूल और जयपुर मिडिल स्कूल परीक्षाओं में भी मुझे परीक्षक नियुक्त किया जाता है।
सन् 1904 ई. में कर्नल टी.सी. पियर्स, आई.ए. तत्कालीन रेजीडेन्ट जयपुर की सहमति से मुझे खेतड़ी के अल्पव्यस्क राजा का अभिभावक, अध्यापक नियुक्त किया गया। पियर्स साहब का कश्मीर से लिखा हुआ प्रशंसा-पत्र इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि मेरी कार्यप्रणाली के विषय में उनके मन में कैसी धारणा थी। जब जयपुर दरबार ने मेयो कॉलेज अजमेर के मोतमिद् (रियासत के सामन्तों और प्रशिक्षणार्थियों के अभिभावक) पद का स्तर ऊँचा करने का निर्णय किया तो 1907 ई. में इस पद के लिए मुझे चुना गया। यह चुनाव करते समय रियासत की स्टेट कौंसिल के सचिव ने रेजीडेन्ट जयपुर के नाम यह पत्र लिखा था-
संख्या 2254
जयपुर, दिनांक 21 अक्टूबर, 1916
मेयो कॉलेज के मोतमिद् पद पर किसी अधिक योग्य व्यक्ति की नियुक्ति करके उसका स्तर बढ़ाने का प्रश्न कुछ समय से जयपुर दरबार के विचाराधीन है। अब कौंसिल ने राजा जी खेतड़ी के शिक्षक पं. चन्द्रधर गुलेरी बी.ए. को लाला मिट्ठन लाल के स्थान पर मेयो कॉलेज के मोतमिद् पद को ग्रहण करने के लिए चुना है। पं. चन्द्रधर गुलेरी एक बहुत ही योग्य व्यक्ति हैं और उन्होंने अपने कर्तव्यों का सम्यक पालन करते हुए प्रिंसिपल मेयो कॉलेज को सदैव सन्तुष्ट किया है और अब तक इस संस्था का बहुत कुछ अनुभव प्राप्त कर लिया है, अत: कौंसिल को विश्वास है कि इनकी नियुक्त के विषय में प्रिंसिपल मेयो कॉलेज, अजमेर की सहमति प्राप्त हो जायेगी।
मेयो कॉलेज में लगभग 15 वर्ष बहुत लंबे समय तक में विविध श्रेणियों को अवैतनिक रूप से विभिन्न विषय पढ़ाता रहा हूँ। तदन्तर सन् 1916 में मुझे महामहोपाध्याय पंडित शिवनारायण के स्थान पर हैड पंडित मेयो कॉलेज के पद पर नियुक्ति के लिए चुना गया और हिन्दी व संस्कृत का अध्यापन कार्य मुझे सौंपा गया। कक्षा में, छात्रावास में और क्रीड़ा-क्षेत्र में अपने विद्यार्थियों के मानसिक, नैतिक, बौद्धिक और शारीरिक विकास की दिशा में मैंने जिस परिणाम में और जिस स्तर पर कार्य किया है उसके विषय में प्रिंसिपल महोदय ही अपना मत दे सकते हैं कि वह उनके मनोनुकूल है या नहीं।
मैंने प्राचीन एवं आधुनिक गद्य तथा पद्यात्मक हिन्दी सहित्य का विशिष्ट अध्ययन किया है और पाली, प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं से इसके विकास के संबंध में भी अनुशीलन किया है। इतिहास और पुरातत्व विषयों में मेरी अभिरुचि है और अपने नाम से, बिना नाम के अथवा अन्य विद्वानों के साथ जो लेख आदि प्रकाशित किए हैं, वे सर्वनिवेदित हैं।
मैं हिन्दी का प्रसिद्ध लेखक हूँ और साहित्यिक जगत में आलोचक और विद्वान के रूप में मेरी ख्याति है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी की प्रबंधकारिणी परिषद् का मैं कई वर्षों तक सदस्य रहा हूँ। जयपुर के रेजीडेन्ट कर्नल शावर्स द्वारा लिखित नोट्स ऑन जयपुर’ पुस्तक में मेरा यथेष्ट योगदान है। युद्ध काल में मैंने सम्राट की सेनाओं की विजय के सम्बन्ध में एक संस्कृत प्रार्थना लिखी थी जो प्रति दिन विद्यालयों में दोहराई जाती थी। युद्धकाल में प्रिंसिपल मेयो कॉलेज पब्लिसिटी बोर्ड, अजमेर मेरवाड़ा बार गजट में हिन्दी संस्करण के सम्पादन में अकेले ही उनकी सहायता की थी और साथ ही अंग्रेजी संस्करण में भी लेख लिखता था। अजमेर मेरवाड़ा गजट के हिन्दी संस्करण की शैली और साहित्यिक स्तर का अपेक्षाकृत अधिक समादर था।
चन्द्रधर गुलेरी
जुलाई 8, 1917 


(दैनिक जागरण और दिव्य हिमाचल में क्रमश: 7 व 8 जुलाई, 2013 को प्रकाशित)

Monday, May 13, 2013

कौन सी कविताएं

(प्रिय कविताओं में से एक नरेश सक्सेना की यह कविता, साथ में एडवर्ड मुंच
का चित्र 'मेलनकली'.)
जैसे चिड़ियों की उड़ान में
शामिल होते हैं पेड़
क्या कविताएं होंगी मुसीबत में हमारे साथ?

जैसे युद्ध में काम आए
सैनिक की वर्दी और शस्त्रों के साथ
ख़ून में डूबी मिलती है उसके बच्चे की तस्वीर
क्या कोई पंक्ति डूबेगी ख़ून में?

जैसे चिड़ियों की उड़ान में
शामिल होते हैं पेड़
मुसीबत के वक़्त कौन सी कविताएं होंगी हमारे साथ
लड़ाई के लिए उठे हाथों में
कौन से शब्द होंगे?

Thursday, March 21, 2013

एक अच्छी कविता लिखने के लिए

(विश्व कविता दिवस पर राइनेर मारिया रिल्के का गद्य, गणेश पाइन की कलाकृति के साथ. अनुवाद राजी सेठ का.)
"...कविता मात्र आवेग नहीं... अनुभव है। एक अच्छी कविता लिखने के लिए तुम्हें बहुत-से नगर और नागरिक और वस्तुएं देखनी-जाननी चाहिए। बहुत-से पशु और पक्षी... पक्षियों के उड़ने का ढब। नन्हें फूलों के किसी कोरे प्रात में खिलने की मुद्रा। अज्ञात प्रदेशों और अनजानी सड़कों को पलटकर देखने का स्वाद। औचक के मिलन। कब से प्रस्तावित बिछोह। बचपन के निपट अजाने दिनों के अनबूझे रहस्य। माता-पिता, जिन्हें आहत करना पड़ा था, क्योंकि उनके जुटाए सुख उस घड़ी आत्मसात् नहीं हो पाए थे। आमूल बदल देने वाली छुटपन की रुग्णताएं। ख़ामोश कमरों में दुबके दिन। समुद्र की प्रात। समुद्र ख़ुद। सब समुद्र। सितारों से होड़ लगाती यात्रा की गतिवान रातें। नहीं, इतना भर ही नहीं। उद्दाम रातों की नेहभरी स्मृतियां... प्रसव में छटपटाती औरत की चीखें। पीला आलोक। निद्रा में उभरती सद्य:प्रसूता। मरणासन्न के सिरहाने ठिठके क्षण। मृतक के साथ खुली खिड़की वाले कमरे में गुज़ारी रात्रि और छिटका शोर। नहीं, इन सब यादों में तिर जाना काफी नहीं। तुम्हें और भी कुछ चाहिए- इस स्मृति संपदा को भुला देने का बल। इनके लौटने को देखने का अनन्त धीरज।... जानते हुए कि इस बार जब वे आएंगी, तो यादें नहीं होंगी। हमारे ही रक्त, भाव और मुद्रा में घुल चुकी अनाम धपधप होगी। जो अचानक अनूठे शब्दों में फूटकर किसी भी घड़ी बोल देना चाहेगी अपने-आप..."

Saturday, February 23, 2013

सुरों से जगाता हूं अलख

(वे कहते हैं कि मैं अपने संगीत को बयां नहीं कर सकता, मेरा संगीत मुझे बयां करता है। आप उनका संगीत सुनते हैं तो समझ जाते हैं कि वे ऐसा क्यों कह रहे हैं। उनके हर गीत को सुनकर गाने वाले की एक छवि मन में अभरती है, यह छवि कैलाश खेर की है। कैलाश अलग हैं, अद्भुत हैं, और उनमें कुछ ऐसा है जो किसी और में नहीं है। उनके बारे में और ज़्यादा जानने की इच्छा हमेशा रहती है, इसी इच्छा के चलते हम पहुंचे उनके घर...)

नौ वर्ष के करियर में आप 800 से ज़्यादा कन्सर्ट कर चुके हैं, कैसा लगता है?
यह ख़ुशी और हैरानी की बात है। साल 2002 में जब मेरी संगीत यात्रा का आरंभ हुआ था, तब मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि यह यात्रा इतनी गतिशील और प्रगतिशील होगी, और देखते ही देखते मैं इस मुकाम तक पहुंच जाऊंगा। किसी कन्सर्ट में जाता हूं तो लोगों की भीड़ और उनकी ऊर्जा देखकर विस्मित रह जाता हूं। यह संगीत का असर है। संगीत, जिसमें मनोरंजन के साथ-साथ एक रोशनी है, सीख है। हर साल मेरे लाइव शो होते हैं और इनकी संख्या बढ़ती ही जा रही है।
आपके बैंड कैलासा की उत्पत्ति कब हुई?
कैलासा संस्कृत का शब्द है, जिसका अर्थ है- दिव्यता।कैलासा की उत्पत्ति साल 2004 में हुई। इससे पहले 2003 में मेरा एक फ़िल्मी गाना अल्लाह के बंदे आ चुका था। गाना लोकप्रिय हुआ और इसे कई अवॉर्ड मिले। फ़िल्म इंडस्ट्री में मेरी मौजूदगी दर्ज हो चुकी थी और मुझे लाइव शो के लिए बुलाया जाने लगा था। मेरी हमेशा यह इच्छा थी कि मेरी सोच का एक बैंड होना चाहिए जिसमें भारतीयता हो, लेकिन गुणवत्ता के स्तर पर वो पूरे विश्व के मानसपटल पर अपना प्रभाव छोड़ सके। आत्मिक चाह थी तो ईश्वरीय राह निकलने लगी। धीरे-धीरे मैं मनपंसद संगीतज्ञों से मिलता गया और वो चुम्बक की तरह साथ जुड़ते गए। आप पवित्र मन से कुछ चाहें तो पवित्रता आपकी ओर आकर्षित होने लगती है। आज कैलासा में कुल 14 सदस्य हैं।
हाल ही में हमने कुल्लू में परफॉर्म किया था, जहां क़रीब 50 हज़ार लोगों की भीड़ थी। लोग दूर-दूर से बसों-ट्रकों में भरकर आए थे। अब संगीत के प्रति प्रशासनिक अमला भी उदार, या कहें कि जागरुक होने लगा है। व्यवस्था अच्छी हो तो परफॉर्म करने में भी आनन्द आता है। लोगों में संगीत के प्रति आस्था बढ़ रही है। संगीतकारों के लिए यह दौर अद्भुत है।
नई एलबम रंगीलेके बाद आप 60 देशों की यात्रा कर चुके हैं। कैसा अनुभव रहा?
जनवरी 2012 में अमिताभ बच्चन ने रंगीले एलबम का लोकार्पण किया था। लगभग उसी समय तय हो गया था कि मार्च से हमें विश्वयात्रा पर जाना है। लेकिन यह यात्रा कितनी लंबी होगी, इसका अंदाज़ा नहीं था। शुरुआत अफ्रीका से हुई। उसके बाद हम बांग्लादेश, पाकिस्तान, यूरोप, इंग्लैंड, कनाडा, अमेरिका और उत्तरी अमेरिका होते हुए भारत वापस आए। फिर मॉरिशस, ऑस्ट्रेलिया, ओमान और सिंगापुर गए। इस तरह पूरा वर्ष देशाटन करते हुए बीता है। यह साल मेरे लिए बहुत पावन रहा। मेरी मां ने इसी वर्ष प्राण त्यागे हैं। मां का जाना बड़े सुक़ून से हुआ। वो ऐसे गईं जैसे कोई संत अपनी देह छोड़कर जाता है। पिता भी ऐसे ही गए थे। मैं इसे मरना नहीं, मोक्ष कहता हूं। जब किसी बुज़ुर्ग की मृत्यु होती है तो वो अपना आशीर्वाद हमें देकर जाता है। बड़े-बूढ़े शरीर त्यागकर सिर्फ़ संसार से विदा लेते हैं, लेकिन उनका आशीष हमारे साथ रहता है। 13 फरवरी को मां की मृत्यु हुई, 14 फरवरी को मेरी शादी की सालगिरह होती है। मेरे जीवन में तिथियों और स्थितियों के विघटन बड़े अद्भुत रहे हैं।
आपने देश-विदेश में परफॉर्म किया है। सबसे अच्छा रिस्पॉन्स कहां मिला?
हर जगह अच्छा रिस्पॉन्स मिलता है। लेकिन कुछ क्षण या अनुभव ऐसे होते हैं जो भुलाए नहीं भूलते। शिकागो में एक शो हुआ था, जिसमें बिल क्लिंटन और उनकी पत्नी हिलेरी क्लिंटन आए हुए थे। हर गाने पर दोनों मुस्कराते और बच्चों की तरह तालियां पीटते। दोनों इतनी श्रद्धा से बैठे हमें सुन रहे थे कि लग ही नहीं रहा था कि ये लोग भी वीवीआईपी का तमगा ढोते हैं। जबकि हमारे देश में वीआपी सामने तो होते हैं, लेकिन उनका दिमाग कहीं और ही होता है।
एक बार अटलांटा में शो के दौरान एक बुज़ुर्ग महिला ने आकर मेरे पैर छुए। मैं हैरान रह गया। वो महिला क़रीब 80 साल की रही होंगी। फिर उन्होंने एक पत्र लिखकर स्टेज पर रखा। मुझे लगा कि किसी गाने की फ़रमाइश होगी। पत्र में लिखा था, मैं तुम्हारी दादी की उम्र की हूं, लेकिन मेरी भारतीय संस्कृति और कला में इतनी आस्था है कि मुझे तुम्हारे अंदर भगवान दिखता है। ऐसा लगता है जैसे साक्षात् भगवान गा रहा हो।
कई बार हम श्रोताओं को स्टेज पर नाचने-गाने के लिए आमंत्रित करते हैं ताकि वो कार्यक्रम से जुड़ सकें। इंग्लैंड में गाने के दौरान एक युवती मेरे पास आकर पूछने लगी, कैन आई हग यू?’ मैंने मस्ती में कहा, हां... हग लो। हिन्दी-अंग्रेज़ी के फ्यूज़न में कई बार शब्द सुनने में अच्छे नहीं लगते, लेकिन भावनाएं शुद्ध हों तो वो पल यादगार बन जाते हैं। मेरी बात सुनकर सब हंसने लगे। गाना रोकना पड़ा और पांच मिनट तक हम सब हंसते रहे। मैंने कभी कल्पना नहीं की थी कि तेरी दीवानी, तौबा-तौबा, जाणा जोगी दे नाल या अगड़ बम-बबम, बम लहरी जैसे गाने इतने चर्चित होंगे। देश-दुनिया में जो लोग हिन्दी भाषा नहीं समझते, उन पर भी मेरे गानों का बेतरह असर हुआ है। यह ईश्वरीय संयोजन है, और मैं माध्यम हूं। कुछ मिले न मिले, मुझे प्रेम बहुत सच्चे दिल से मिलता है। और जब मैं उस प्रेम का भक्षण करता हूं, उसका आह्वान करता हूं, तो उसके प्रति मेरा भी कुछ दायित्व बनता है। यह दायित्व मेरी मुस्कान में दिखता है कि मैं भी आपके प्रति उतना ही कटिबद्ध हूं, जितने आप हैं।
आप मेरठ से हैं। वहां के मशहूर नौचंदी मेले में गाने का मौक़ा मिला है?
दो बार बुलावा आया, लेकिन अस्पष्टता के कारण बात बन नहीं पाई। चूंकि यह प्रशासन का मेला होता है तो प्रशासन बुलाए, या फिर कोई एनजीओ या ट्रस्ट दिलचस्पी ले तो मैं हाज़िर हूं। नौचंदी मेले का बड़ा नाम है, और मेरा जन्म भी मेरठ का है, तो दिल से चाहता हूं कि मैं वहां जाकर गाऊं। एक बार मेरे गाने को लेकर वहां के किसी संस्थान से विज्ञापन भी आने शुरू हो गए थे, लेकिन कार्यक्रम सिरे नहीं चढ़ा। लेकिन मुझे विश्वास है कि किसी विशेष, अनूठे मुहूर्त में मुझे अपनी जन्मस्थली में गाने का अवसर ज़रूर मिलेगा।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आपका बचपन बीता है। वहां लोक संगीत का बोलबाला है। प्लेबैक सिंगिंग करते समय, जोकि लोक गायकी से बिल्कुल अलग विधा है, किस तरह सामंजस्य बिठाते हैं?
उत्तर प्रदेश में रहते हुए मैंने लोक संगीत के बहुत सारे प्रकार सुने... जैसे स्वांग, ढोला, और एक ऐसा प्रकार जो बैरागी या जोगी गाते हैं। मेरे पिता निर्गुण संगीत गाते थे। वो एकतारा बजाकर गाते थे। मां भी गाती थीं। हालांकि दोनों शौक़िया तौर पर गाते थे, लेकिन ऐसा कि पेशेवर गायकों को भी टक्कर दे दें। मैंने उनसे बहुत कुछ सीखा और समझा है। फिर हम दिल्ली आ गए, लेकिन दिल्ली आकर भी सब-कुछ वैसा ही रहा। घर में गांव जैसा ही माहौल और वही जीवनशैली रही। सो, अपने प्रदेश की गायकी और वहां के संगीत का प्रभाव मुझ पर हमेशा रहा है। यही मेरे संगीत पर भी दिखता है।
मैंने नहीं सोचा था कि फ़िल्मों में गाऊंगा, न ऐसी कोई चाहत थी। मैं यहां एलबम बनाने के लिए आया था। लेकिन लोगों ने आवाज़ सुनकर पसंद की तो फ़िल्म, टेलीविज़न, विज्ञापन, हर जगह से काम की बाढ़-सी आ गई। अब तक 400 फ़िल्मों के लिए गाने और 600 से ज़्यादा विज्ञापन फ़िल्मों के लिए जिंगल गा चुका हूं।
आपने संघर्ष का दौर भी देखा है। किस तरह की मुश्किलें आईं और उनसे किस तरह उबरे?
जब मुंबई आया था, तब मैं 29 साल का था, अब 39 साल का हूं। लोग 15-16 साल की उम्र में सुपरस्टार और रॉकस्टार बनने का सपना संजोए होते हैं। मैं इस मामले में लेटलतीफ़ रहा। लेकिन यह मेरी नियति थी, जो ईश्वर ने मेरे लिए तय कर रखी थी। एक समय ऐसा था जब मेरा जूता फट गया था। मेरे पास पैसे थे, लेकिन मैं उन्हें संभलकर ख़र्च कर रहा था क्योंकि मुझे ज़्यादा समय तक मुंबई में बने रहना था। मेरे पास 6 हज़ार रुपए थे और मुझे पूरा एक साल काटना था। मैं सिर्फ़ जीने के लिए खाता था, और कोई ख़र्चा नहीं था। मोबाइल फ़ोन हमेशा रिचार्ज कराकर रखता था क्योंकि काम के लिए लोगों से बात करनी होती थी। मेरे पास एक मोटरसाइकिल भी थी, जिसमें हमेशा पेट्रोल भराकर रखता था क्योंकि काम की तलाश में जाना होता था। एक बार किसी ने काम के सिलसिले में बुलाया। वहां बस से पहुंचना सुविधाजनक था तो मैं बस में चढ़ गया। बरसात के दिन थे और जूते का तल्ला फटा होने के कारण मेरे कपड़े ख़राब हो चुके थे। बस में साथ खड़े आदमी ने बताया कि आपके सारे कपड़े ख़राब हो गए हैं। यह सुनकर मैं ख़ूब हंसा और सोचा कि भगवान कैसी परीक्षा ले रहा है। मैं इतने उत्साह से उस व्यक्ति से मिलने जा रहा था और अब जाना मुमकिन नहीं था।
वो परीक्षा के दिन थे। मुझे यह सिखाया जा रहा था कि उत्साह रख, उत्तेजना पाल, लेकिन धीरज भी रख। सब्र सबसे बड़ी उत्तेजना है। आप जितने सब्र और धैर्य से काम लेंगे, मुश्किलों को गले लगाएंगे, एक समय के बाद आपका जीवन उतना ही सरल होगा। संघर्ष की स्थिति कुछ देने के लिए आती है, लेकिन हम उस स्थिति में डगमगा जाते हैं और लेने लायक नहीं बचते। आप ख़ुद भगवान भी बनें और भक्त भी, यह संभव नहीं है। 
फ़िल्मों में गाना आसान है या विज्ञापनों के लिए जिंगल?
जिंगल गाना ज़्यादा चुनौती से भरा है। किसी भी जिंगल को तीस, चालीस या ज़्यादा-से-ज़्यादा साठ सेकेंड में गाना होता है, जैसे एक मिनट में कोई जादू करना हो। जितनी देर में आलाप लेते हैं, उतनी देर में समय ख़त्म हो जाता है। कम वक़्त में गहरा काम करना होता है
संगीत के क्षेत्र में इन दिनों कई प्रयोग हो रहे हैं, क्या कहेंगे?
यह प्रयोगवादी युग है। यह दौर संगीत के लिए बहुत अच्छा है। जो भी प्रयोग दिखाई दे रहे हैं वो हमारे जीवन के विभिन्न रसों से प्रेरित होकर हो रहे हैं। इसीलिए खुलापन भी आया है। पहले एक जैसी सोच और एक तरीके के गाने बनते थे, अब ऐसा नहीं है। जैसे हम हर दिन नए कपड़े पहनते हैं, संगीत में भी वही नयापन, वही परिवर्तन चाहते हैं। संगीत को लेकर हमारी सोच बदली है, विचार बदले हैं, और व्यवस्थाएं भी बदली हैं। इस बदलाव का फ़ायदा नए संगीतकारों को हो रहा है। आने वाले समय में संगीत में और भी बदलाव आएंगे। समय के साथ मनुष्य को ढलते रहना चाहिए।
आप गायक हैं, गीतकार हैं और संगीतकार भी। किस भूमिका में ज़्यादा संतुष्टि मिलती है?
तीनों भूमिकाएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। लिखना भी उतना ही प्रेरणादायक है, जितना धुन बनाना। संगीत की रचना भी उतनी ही प्रेरणा देती है जितनी गायकी। शरीर में हड्डियों का होना भी उतना ही आवश्यक है, जितना कि मांस और रक्त का होना। ऐसा ढांचा, जो एक-दूसरे के बिना पूरा नहीं दिखता। हां, गाना सर्वोपरि है। यह मुख की तरह है और सबसे पहली दृष्टि मुख पर पड़ती है। गायकी मेरे लिए मुख्य है। मैं उसकी वजह से ही जाना जाता हूं और ख़ुशकिस्मत हूं कि लोग मेरे गानों का इंतज़ार करते हैं।
प्रेरणास्रोत कौन है?
मेरे मां-पिताजी जिन्होंने साधारण होते हुए भी असाधारण जीवन जिया है। मेरे पिता ऐसे गांव में जन्मे, जहां हर दूसरा इंसान गुस्से में होता है, किसी-न-किसी कुंठा में रहता है, और हर तीसरा आदमी अपराधी है। लेकिन पिताजी की ऊर्जा अलग थी। उन्हें बहुत सम्मान मिलता था। कालान्तर में जीवन में अन्य तत्व भी जुड़ते गए, जो मेरी प्रेरणा बने... जैसे वृक्ष, नदियां, सूर्य, पर्वत और समुद्र। संगीत में कुछ करने का विचार सबसे पहले ऋषिकेश में गंगा के तट पर आया। काम के लिए यहां मुंबई में, महासागर की शरण में आ गया। यह सोचकर आया था कि सफ़ल नहीं हुआ तो इसमें ही समा जाऊंगा। लेकिन किस्मत ने साथ दिया और ऐसी नौबत नहीं आई।
शीतल से आपकी मुलाक़ात कहां और कैसे हुई?
शीतल भी कश्मीरी मूल की हैं। हमारी अरेंज्ड मैरिज हुई है। किसी पारिवारिक मित्र के माध्यम से यह रिश्ता आया था। फिर कुछ ऐसे योग बने कि एक संत ने इस रिश्ते का प्रवर्तन किया। ईश्वर का उपकार है कि शीतल संगीत की अच्छी समझ रखती है, अच्छा संगीत सुनती है। जिस साल शादी हुई, उसी साल 28 दिसंबर को बेटे कबीर का जन्म हुआ।
कबीर में भी गायकी के जरासीम हैं?
कबीर में संगीत के तत्व दिखते हैं। उसमें गायकी के पूरे लक्षण हैं। बहुत गहरे गाने भी वो तल्लीन होकर सुनता, गुनगुनाता है। लेकिन मैं उस पर अपनी बात नहीं थोपता। उसके स्वरूप को देखकर बस हंसता रहता हूं। ऐसा लगता है जैसे कबीर मुझे सिखाने के लिए आया है, या वो मुझे पाल रहा है।
ख़ाली वक़्त में क्या करते हैं?
पिछले आठ साल से ख़ाली समय नहीं मिला है। हंसी की बात यह है कि फरवरी 2013 में मेरी शादी को चार साल हो जाएंगे, लेकिन अभी तक हनीमून भी नहीं मनाया है। शीतल कभी-कभार रोष प्रकट करती है, लेकिन फिर हालात को समझकर चुप हो जाती है। वैसे, लोनावला में अपना खेत है। वहां छह गाय रखी हुई हैं, जिनके छह बछड़े हैं। पेड़-पौधे, प्रकृति... सब-कुछ है वहां। वक़्त मिलने पर कबीर को वहीं ले जाता हूं। 
पसंदीदा गाना?
आज मेरे पिया घर आवेंगे, ऐ री सखी मंगल गाओ री, धरती-अंबर सजाओ री और छाप तिलक सब छीनी।
मुंबई में प्रिय जगह?
समन्दर किनारे बना यह घर।
सबसे बड़ा सपना?
कोई सपना नहीं है। सिर्फ़ इस बात में विश्वास है कि जाहि विधि राखे राम, ताहि विधि रहिए। यह चाहता हूं कि अच्छा संगीत बनता रहे। दुनिया में अच्छी सोच पैदा हो, लोगों को अच्छा सीखने को मिले। मन में बहुत कुछ है जो संगीत के ज़रिए बांटने की इच्छा है।  

(दैनिक भास्कर की मासिक पत्रिका 'अहा ज़िंदगी' के फरवरी 2013, वसंत अंक में प्रकाशित)
Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...