Thursday, February 27, 2014

मातृभाषा

(निरन्तर व्यस्तता के बीच पढ़ने-लिखने का क्रम लगभग टूटा रहा. किताबें तो दूर, नियम से अख़बार तक बांचने की मोहलत नहीं मिली. प्रयास था कि कुछ समय चुराकर लिखना-पढ़ना हो जाएगा पर न ऐसा समय आया, न मन:स्थिति. उम्मीद इंसान का सबसे बड़ा अस्त्र है, जो न टूटे तो सब संभव है. इस आशा के साथ केदारनाथ सिंह की कविता 'मातृभाषा' और पाब्लो पिकासो की कलाकृति 'फार्मर्स वाइफ ऑन ए स्टेपलैडर'.)
जैसे चींटियां लौटती हैं बिलों में
कठफोड़वा लौटता है
काठ के पास
वायुयान लौटते हैं एक के बाद एक
लाल आसमान में डैने पसारे हुए
हवाई अड्डे की ओर

ओ मेरी भाषा
मैं लौटता हूं तुम में
जब चुप रहते-रहते
अकड़ जाती है मेरी जीभ
दुखने लगती है
मेरी आत्मा।

Sunday, February 2, 2014

सौ साल पहले उसने कहा था

('उसने कहा था' कहानी पर बनी फ़िल्म का एक पोस्टर)
पांचवीं कक्षा में थी जब मुझे पहली बार उसने कहा था कहानी पढ़ने को दी गई, तब केवल यह पता था कि यह कहानी मेरे परदादा पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी ने लिखी है। फिर दो-तीन साल बाद दूरदर्शन पर उसने कहा था फ़िल्म देखने का अवसर मिला। फिर कई बार कहानी पढ़ी और हर बार इससे एक नई समझ और नई दृष्टि मिली।
उसके बाद उसने कहा था और गुलेरी जी की शेष रचनाओं को पढ़ने का जो सिलसिला चला, वो आज तक जारी है। उसने कहा था इतनी बार पढ़ी है कि उसके किरदार परिवार का हिस्सा लगते हैं। किसी कहानी का इस तरह गहरे प्रभावित कर जाना कम होता है। यह भी कमाल की बात है कि 100 साल पहले लिखी गई किसी कहानी का आकर्षण और प्रासंगिकता आज भी कायम है। उसने कहा था मेरे लिए मात्र एक कहानी नहीं, जीती-जागती कलाकृति है। 

(अमर उजाला के 'धरोहर' कॉलम में 2 फरवरी 2014 को प्रकाशित)

Wednesday, January 29, 2014

ओ मेरे पिता

(मृत्यु पर कविताएं पढ़ते हुए कवि एकांत श्रीवास्तव की यह कविता हाथ लगी. 
साथ में गुस्ताव क्लिम्ट की कलाकृति 'ट्री ऑफ लाइफ'.) 
मायावी सरोवर की तरह 
अदृश्‍य हो गए पिता 
रह गए हम
पानी की खोज में भटकते पक्षी
 

ओ मेरे आकाश पिता
टूट गए हम
तुम्‍हारी नीलिमा में टंके
झिलमिल तारे
 

ओ मेरे जंगल पिता
सूख गए हम
तुम्‍हारी हरियाली में बहते
कलकल झरने
 

ओ मेरे काल पिता
बीत गए तुम
रह गए हम
तुम्‍हारे कैलेण्‍डर की
उदास तारीखें
 

हम झेलेंगे दुःख
पोंछेंगे आंसू
और तुम्‍हारे रास्‍ते पर चलकर
बनेंगे सरोवर, आकाश, जंगल और काल
ताकि हरी हो घर की एक-एक डाल।

Monday, October 7, 2013

एक वचनश्रुति का होना

(प्रिय कवि आलोक श्रीवास्तव के कविता-संग्रह 'दुख का देश और बुद्ध' से...) 
 
बुद्ध का होना 
एक फूल का खिलना  है 
हवा में महक का बिखरना 
और दिशाओं में रंगों का छा जाना है 

बुद्ध का होना 
अपने भीतर होना है 
दुख को समझते हुए जीना 
पता नहीं पृथ्वी पर 
कितने कदम चले बुद्ध ने 
कितने वचन कहे 
कितनी देशना  दी  
पर बुद्ध का होना 
मनुष्य में बुद्ध की संभावना  का होना है 
दुख की सहस्र पुकारों के बीच 
दुख से मुक्ति की एक वचनश्रुति का होना है 

बुद्ध का होना 
धरती का, रंगों का, ऋतुओं का 
राग का होना है... 

(बुद्ध की तस्वीर थाईलैंड प्रवास के दौरान अयुथ्या मठ से.)
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