Monday, October 7, 2013

एक वचनश्रुति का होना

(प्रिय कवि आलोक श्रीवास्तव के कविता-संग्रह 'दुख का देश और बुद्ध' से...) 
 
बुद्ध का होना 
एक फूल का खिलना  है 
हवा में महक का बिखरना 
और दिशाओं में रंगों का छा जाना है 

बुद्ध का होना 
अपने भीतर होना है 
दुख को समझते हुए जीना 
पता नहीं पृथ्वी पर 
कितने कदम चले बुद्ध ने 
कितने वचन कहे 
कितनी देशना  दी  
पर बुद्ध का होना 
मनुष्य में बुद्ध की संभावना  का होना है 
दुख की सहस्र पुकारों के बीच 
दुख से मुक्ति की एक वचनश्रुति का होना है 

बुद्ध का होना 
धरती का, रंगों का, ऋतुओं का 
राग का होना है... 

(बुद्ध की तस्वीर थाईलैंड प्रवास के दौरान अयुथ्या मठ से.)

Saturday, August 3, 2013

सिनेमा ने दिया जीने का मक़सद

(नसरीन मुन्नी कबीर विदेश में पली-बढ़ीं लेकिन उनका दिल भारत के लिए धड़कता रहा। लंदन में रहकर वे भारतीय फ़िल्में देखतीं और हिन्दी गाने सुनतीं। पढ़ाई के लिए यूरोप गईं तो वहां भी यह सिलसिला बरक़रार रहा। सिनेमा की पढ़ाई के बाद नसरीन लंदन लौट आईं। उन्हें ब्रिटिश फ़िल्म इंस्टीट्यूट' में गवर्नर नियुक्त किया गया। लेकिन भारत और सिनेमा के प्रति प्यार उन्हें बार-बार हिन्दुस्तान खींचकर लाता रहा। नसरीन भारतीय सिनेमा से जुड़ी हस्तियों पर कई डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बना चुकी हैं और किताबें लिख चुकी हैं। ब्रिटेन और यूरोप में भारतीय सिनेमा का परचम लहराने वाली नसरीन हाल में भारत आईं तो अहा ज़िंदगी के लिए उन्होंने ख़ास बातचीत की।)
 

मेरा जन्म हैदराबाद का है। बहुत छोटी थी जब माता-पिता इंग्लैंड जाकर बस गए थे। तब से लंदन में ही हूं। लंदन बहुत ख़ूबसूरत शहर है। यहां काम करने में मज़ा आता है। कला-प्रदर्शनी हो या रंगमंच- सब-कुछ बेहतरीन है। सीखने और करने के लिए बहुत कुछ है यहां। लंदन सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध है। यूं तो मेरे जीवन का ज़्यादातर हिस्सा लंदन में गुज़रा है, लेकिन पैरिस में भी मैंने 18 साल बिताए हैं। मेरी पढ़ाई पैरिस में ही हुई है।
सिनेमा में मास्टर्स करने के बाद मैंने फ्रांस के नामी निर्देशक रॉबर्ट ब्रेसों को जॉइन किया। रॉबर्ट की फ़िल्म फोर नाइट्स ऑफ ए ड्रीमर में बतौर सहायक काम किया। रॉबर्ट फिक्शन फ़िल्मों के बादशाह थे। उनके साथ काम करने के दौरान मुझे समझ आ गया था कि मैं उस फिक्शन को गढ़ने में अच्छी नहीं हूं, जो फ़िल्मों के लिए ज़रूरी है। फ़िल्मों में एक अलग ही दुनिया रचनी पड़ती है। ऐसी दुनिया जो वास्तव में नहीं है, लेकिन वास्तव लगनी चाहिए। मैं समझ गई थी कि मैं असल घटनाओं को रिकॉर्ड करने में बेहतर हूं। इसीलिए मैंने डॉक्यूमेंट्री फ़िल्में बनाने की ठानी।
जल्द समझ आ गया कि फिल्में मेरे बस की नहीं
लंदन में मैंने हिन्दुस्तानी फ़िल्में ख़ूब देखीं। भारत से मेरा ताल्लुक भारतीय खाने और भारतीय सिनेमा के कारण बरक़रार रहा, यह मेरे लिए बड़ी बात थी। विदेश में रह रहे लाखों हिन्दुस्तानियों की तरह मैं भी हिन्दी गाने सुना करती थी... ख़ासतौर से पचास और साठ के दशक के गाने, जो लाजवाब थे। फिर मैंने सोचा कि क्यों न भारतीय फ़िल्मों पर ही रिसर्च करूं। शुरुआत हुई यूरोपीय देशों में भारतीय सिनेमा समारोह आयोजित करने से। इसी कड़ी में मैंने 1983 और 1985 में पैरिस के जॉर्ज पॉम्पिदू सेंटर में भारतीय सिनेमा के महत्वपूर्ण समारोह कराए।
1982 में जब यूनाइटेड किंगडम में चैनल 4 टेलीविज़न की शुरुआत हुई तो मुझे उसमें बतौर सिनेमा सहायक काम करने का प्रस्ताव मिला। तब से चैनल 4 के साथ ही हूं। मैं इस चैनल के लिए भारतीय फ़िल्म शृंखला का आयोजन करती हूं। चैनल 4 पर हर साल 20 भारतीय फ़िल्में दिखाई जाती हैं। 
डॉक्यूमेंट्री फ़िल्मों की बात करूं तो कह सकती हूं कि वृत्त-चित्र और चैनल 4 के लिए भारतीय फ़िल्मों का आयोजन मेरी उपलब्धि रही है। वैसे फ़िल्मों में मैंने हर तरह का काम किया है। चैनल 4 के लिए हिन्दी सिनेमा पर कई सीरीज़ बना चुकी हूं, जैसे- मूवी महल, इन सर्च ऑफ गुरु दत्त, अमिताभ बच्चन के जीवन पर आधारित फॉलो दैट स्टार और लता मंगेशकर पर एक सीरीज़ जो छह भागों में है। इसके अलावा शाहरुख़ पर भी वृत्त-चित्र बना चुकी हूं- द इनर एंड आउटर वर्ल्ड ऑफ शाहरुख़ खान
वृत्त-चित्र का निर्माण किसी भी हस्ती के जीवन को रिकॉर्ड करने का शानदार ज़रिया है। गुरु दत्त और लता मंगेशकर ऐसी हस्तियां हैं जिन्होंने हमारे सांस्कृतिक जीवन को गहरे प्रभावित किया है। इन महान कलाकारों की जीवनगाथा सुनकर फ़िल्म बनाना मेरे लिए फ़ख्र की बात है।
हर कलाकार में है कुछ अलग बात
वृत्त चित्र बनाने के दौरान मेरा रुझान सिनेमा पर किताबें लिखने की तरफ़ हुआ। मैंने जावेद अख़्तर और लता मंगेशकर के जीवन पर किताबें लिखीं। ए.आर. रहमान की जीवनी भी लिखी। ये सब किताबें बातचीत पर आधारित हैं। गुरु दत्त की जीवनी पर भी काम कर चुकी हूं। गुरु दत्त से मैं कभी नहीं मिली, लेकिन उन पर काम करने का अनुभव अलग ही था। वे रहस्यमयी इंसान थे। उनके व्यक्तित्व में कई परतें थीं शायद इसीलिए उनकी फ़िल्मों का जादू अब तक बरक़रार है। उनकी फ़िल्में हर पीढ़ी से संवाद स्थापित करने में सक्षम हैं।
काम के दौरान जिन हस्तियों से भी मैं मिली, सबके साथ बहुत मजा आया। हालांकि सब अनुभव एक-दूसरे से अलग रहे। लता मंगेशकर गज़ब की महिला हैं। वे हाज़िरजवाब और ज़िंदादिल हैं। उनके साथ बैठकर महसूस होता है कि आप एक कमाल की प्रतिभा के साथ हैं। अमिताभ बच्चन ऐसे संजीदा इंसान हैं जिनके व्यक्तित्व में कई रंग हैं। अमिताभ को फ़िल्माते समय वे पूरी टीम के साथ खुले स्वभाव से पेश आते रहे। उन्हें मनमोहन देसाई, प्रकाश मेहरा और मुकुल आनन्द के साथ काम करते हुए देखने में बड़ा मज़ा आया। हमने 1989 में उन पर वृत्त-चित्र बनाया था। उस दौरान वे जहां भी जाते, जनता सब-कुछ भूलकर उन्हें घेरे रहती। मेरे ख़याल से भारतीय सिनेमा में इतना बड़ा सितारा दोबारा शायद ही देखने को मिले। ए.आर. रहमान विनम्र हैं, क़ाबिलियत कूट-कूट कर भरी है उनमें। सबसे प्यारी बात यह है कि वे ईमानदार हैं। रहमान बहुत शांत लेकिन मज़ाकिया हैं। वे आपको कभी भी हंसा सकते हैं। शाहरुख़ खान जोशीले हैं। जब हम लोग शाहरुख़ पर फ़िल्म बना रहे थे तो वे हमसे काफी घुल-मिल गए थे। कैमरे के पीछे काम करने वाले लोगों के साथ वे बहुत आदर से पेश आते हैं। किसी तकनीशियन से कैसे बात करनी है, यह शाहरुख़ बख़ूबी जानते हैं। वे अपने फैन्स के साथ बहुत सलीके से पेश आते हैं। इसीलिए उनके प्रशंसक उन्हें इतना प्यार करते हैं। उस्ताद बिस्मिल्लाह खान सहज और सक्रिय इंसान थे। सिर्फ़ संगीत नहीं, उनकी मौजूदगी भी धन्य कर देने वाली थी। ऐसे कम लोग होते हैं जो इतने हुनरमंद होने पर भी गुरूर नहीं करते, कामयाबी को सर पर नहीं चढ़ने देते। खान साहब में नम्रता थी जो महान कलाकारों की ख़ासियत रही है। गुरु दत्त और बिस्मिल्लाह खान पर बनाए गए वृत्त-चित्रों को मैं अब तक अपना सबसे अच्छा काम मानती हूं।
फिल्मी पत्रकारिता के लिए शोध ज़रूरी है
किसी चीज़ को लेकर जुनून हो तो उस तक पहुंचने के तरीके हम ढूंढ़ ही लेते हैं। फ़िल्मों के साथ भी ऐसा ही है। डायलॉग बुक्स में जो बातचीत है वो हिन्दी, उर्दू, रोमन हिन्दी या अंग्रेज़ी अनुवाद में है। ऐसा प्रयोग पहली बार हुआ है। जिन फ़िल्मों पर मैंने काम किया है वो मुगल-ए-आज़म, आवारा, मदर इंडिया और प्यासा जैसी सदाबहार फ़िल्में हैं। मेरी नई डायलॉग बुक बिमल रॉय की फ़िल्म देवदास पर है।
मेरे ख़याल से किसी चरित्र को समझने के लिए डायलॉग की बहुत बड़ी भूमिका होती है। सिनेमा-प्रेमियों तक फ़िल्म का मूल भाव पहुंचाना डायलॉग से ही संभव है। यह वाकई शानदार तरीका है। अनुवाद के कारण भाषा की समस्या भी आड़े नहीं आती। मुझे ख़ुशी है कि मेरी डायलॉग बुक्स हॉवर्ड, टोक्यो और पैरिस के विश्वविद्यालयों में हिन्दी और उर्दू पढ़ाने के काम में लाई जा रही हैं।
इस क्षेत्र में बड़ी चुनौती यह है कि आप सवाल सही पूछ रहे हैं या नहीं। जिस व्यक्ति-विशेष पर आप काम कर रहे हैं, उसे विश्वास में लेना ज़रूरी है। गहन शोध भी चाहिए ताकि वो आपसे खुलकर बात कर सके। ज़रा सोचिए, जिसने फ़िल्म इंडस्ट्री में बरसों गुज़ारे हों, उसके लिए एक-एक बात याद रखना कितना मुश्किल है। यह पूरी तरह आप पर निर्भर है कि आप उसे कितना और क्या याद दिला पाते हैं।
हिंदी सिनेमा के पास निर्देशक हैं, पटकथा नहीं
हिन्दी सिनेमा के पास मणिरत्नम, दिबाकर बैनर्जी और विशाल भारद्वाज जैसे सशक्त फ़िल्मकार हैं। ये निर्देशक शानदार कहानियां सुनाते हैं, लेकिन बिल्कुल अलग अंदाज़ में। महिलाओं में मेरी पसंदीदा फ़िल्म निर्देशक फ़राह खान हैं। तीसमार खां तो नहीं लेकिन मुझे उनकी ओम शांति ओम औरमैं हूं ना फ़िल्में काफी पसंद आईं। फ़राह मनमोहन देसाई की शैली की फ़िल्में बनाती हैं। वे फ़िल्मों के अलावा गानों का निर्देशन भी अच्छा कर लेती हैं। उनकी कोरियोग्राफी बेहतरीन है। गानों में नई ऊर्जा भरना कोई उनसे सीखे। मुझे फ़राह की आने वाली फ़िल्मों का इंतज़ार है।
अच्छा फ़िल्मकार होने के लिए ज़रूरी है अच्छा किस्सागो होना। साथ ही यह जानना कि उन किस्सों को दृश्यों में किस तरह उतारा जाए। अच्छे फ़िल्मकार को यह इल्म होना ज़रूरी है। फिर, अच्छा अभिनय करवाना और अच्छे अभिनय की परख भी उतनी ही ज़रूरी है। निर्देशक ही वो आख़िरी इंसान है जो शॉट को ओके करता है। इसलिए जब तक निर्देशक में समझ नहीं होगी तब तक अच्छी फ़िल्म बनना नामुमकिन है। फ़िल्म बनाते हुए तुरंत फ़ैसले लेने की क्षमता होनी चाहिए। इसके अलावा अच्छे निर्देशक के लिए अच्छा एडिटर होना ज़रूरी है। 
क्वालिटी की बात करें तो पाश्चात्य और भारतीय सिनेमा के बीच आज भी ज़मीन-आसमान का फर्क़ है। हिन्दी सिनेमा का सबसे कमज़ोर पक्ष उसकी पटकथा है। हिन्दी फ़िल्मों की पटकथा में मौलिकता नहीं है। एडिटिंग में कई ख़ामियां हैं। एडिटिंग या तो बहुत चालू होती है या फिर घिसी-पिटी लीक पर। लेकिन मैं फिर कहूंगी कि यह परिवर्तन का समय है। भारतीय सिनेमा में नए प्रयोग हो रहे हैं। नए फ़िल्मकार ख़ुद को साबित कर सकें, इसके लिए उन्हें समय और मौक़ा मिलना चाहिए।
ईरानी सिनेमा बेहद पसंद है
ख़ाली वक्त में मुझे फ़िल्में देखना पसंद है, ख़ासतौर से यूरोप और हॉलीवुड की फ़िल्में। ईरान का सिनेमा भी बहुत पसंद है। ईरानी फ़िल्म सेपरेशन कमाल की फ़िल्म है। इसके अलावा द आर्टिस्ट भी मेरी पसंदीदा है। यह साइलेंट फ़िल्म है लेकिन इसे देखकर समझ में आता है कि कहने का ढंग अच्छा हो तो कैसे एक साधारण कहानी भी असाधारण बन जाती है।
जब भी भारत आती हूं, यहां से लौटने का मन नहीं करता। यहां आकर बहुत सुक़ून मिलता है मुझे। दरअसल मुझे भारत की ज़िंदादिली पसंद है। यह देश बख़ूबी बताता है कि जीवन में कितने विविध रंग हैं। आर्थिक परेशानी के बावजूद यहां लोग पूरे उत्साह के साथ जीते हैं, एक-दूसरे का सम्मान करते हैं। 

चलते-चलते
जन्मदिन: 19 मई 1949
भारत में पसंदीदा जगह: मुंबई और केरल
पसंदीदा किताबें: सादिक हिदायत की द ब्लाइंड आउल
पसंदीदा फ़िल्में: प्यासाऔर द थर्ड मैन
पसंदीदा निर्देशक: गुरु दत्त और बिली वाइल्डर
पसंदीदा गाने:ये रात ये चांदनी फिर कहां और अभी न जाओ छोड़कर
पसंदीदा अभिनेता/अभिनेत्री: दिलीप कुमार, नरगिस
अवॉर्ड: कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में वूमन अचीवमेंट अवॉर्ड
कोई पुरानी याद: पुरानी हिन्दी फ़िल्में और बीटल्स के गाने
जीवन का टर्निंग पॉइंट: जब मैंने भारतीय सिनेमा पर रिसर्च का काम शुरू किया। लगा कि मुझे जीवन में एक उद्देश्य मिल गया है। 

(दैनिक भास्कर की मासिक पत्रिका 'अहा ज़िंदगी' के अगस्त 2013 अंक में प्रकाशित)

Sunday, July 7, 2013

गुलेरी जयंती पर विशेष

(साहित्य के पुरोधा पंडित चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की आज 130वीं जयंती है। गुलेरी जी की रचनाओं के बारे में इतना सब लिखा, पढ़ा व सुना जा चुका है कि कुछ और कहना सूरज को दीया दिखाने समान है। दो साल पहले पैतृक घर गुलेर जाना हुआ तो मैं गुलेरी जी की निजी डायरी अपने साथ मुंबई ले आई थी। यह वह डायरी है जिसे गुलेरी जी के पौत्र यानी मेरे पिता डॉ. विद्याधर शर्मा गुलेरी अपनी सबसे बड़ी संपत्ति मानते थे। परदादा जी की डायरी पढ़ते हुए उन्हें व्यक्तिगत तौर पर जानने का सौभाग्य मुझे मिला, वहीं उनके अपने शब्दों में उनका परिचय पाकर मैं अभिभूत हो उठी। इसे हिन्दी-साहित्य का दुर्भाग्य माना जाना चाहिए कि पाठकवर्ग गुलेरी जी की उन अधिकांश रचनाओं से वंचित रहा है, जो वे 39 वर्ष की अल्पायु में लिखकर चले गए। प्रतिभापुत्र गुलेरी जी मुख्यतया उसने कहा था कहानी से साहित्य-प्रेमियों में अपनी पहचान रखते हैं, लेकिन कहानी लेखन के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी उनका योगदान अप्रतिम है। भाषा एवं साहित्य से इतर दर्शन, इतिहास, पुरातत्व, धर्म, ज्योतिष, पत्रकारिता व मनोविज्ञान जैसे अनेक विषयों पर गुलेरी जी की गहरी पैठ थी। गुलेरी जी के रचनाकर्म को पाठक अच्छे से जान पाएं, इस कामना के साथ उनका यह लेख, जो मूल अंग्रेजी से अनूदित है।)
गुलेरी जी अपने शब्दों में
मैं पंजाब प्रांत के काँगड़ा जिले में गुलेर नामक ग्राम निवासी सारस्वत ब्राह्मणों के सम्मान्य कुल का वंशज हूँ। ज्योतिष के विद्वान और पंचांग विद्या के कर्ता के रूप में मेरे प्रपितामह की प्रसिद्धि उन दिनों में पटियाला और बनारस तक फैली हुई थी। हमारे वंश के लोग माफी और जागीर की भूमि का उपभोग करते हैं और हम इतिहास-प्रसिद्ध गुलेर के राजा कटोच क्षत्रियों के मुख्य पुरोहित और गुरु हैं। गुलेर के राजा ने मेरे पिताजी को गुरु के रूप में पालकी, गद्दी और ताजीम का सम्मान प्रदान किया था और उनके बाद मुझे भी वही प्रतिष्ठा प्राप्त है।
मेरे पिता पंडित शिवरामजी, अपने समय में बनारस के विशिष्ट संस्कृत विद्वान माने जाते थे और जयपुर के स्वर्गीय महाराजा रामसिंह जी बहादुर ने अपने दरबार के राजपंडित पद के लिए उनका चयन किया था। वे जयपुर दरबार के वरिष्ठ पंडित थे और लगभग 48 वर्ष तक जयपुर के संस्कृत कॉलेज में उपाध्यक्ष एवं संस्कृत, व्याकरण, भाषा विज्ञान और वेदान्त, दर्शन के आचार्य पर प्रतिष्ठित रहे। स्वर्गीय एवं वर्तमान महाराजा तथा समाज के सभी वर्गों के लोगों से प्रखर पाण्डित्य तथा निर्मल चरित्र के कारण उनको महान समादर प्राप्त था। वे जयपुर में संस्कृत अध्ययन के आद्य प्रवर्तकों में थे और उनकी शिष्य मण्डली में देश के बहुत से प्रसिद्ध पंडित हैं तथा तीन को तो भारत सरकार द्वारा महामहोपाध्याय का सम्मान भी प्राप्त हो चुका है।
मेरा जन्म जयपुर में ही हुआ और मैंने महाराज कॉलेज में शिक्षा पाई। स्कूल व कॉलेज की सभी कक्षाओं में मैं सर्वोच्च स्थान एवं पारितोषिक पाता रहा। मैंने माध्यमिक परीक्षा 1897 ई. में द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। सन् 1899 ई. में मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एण्ट्रेन्स परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की और विश्वविद्यालय की इस परीक्षा के वरिष्ठता क्रम में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। जयपुर राज्य में शिक्षा के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व अवसर था। अत: महाराजा साहिब बहादुर की ओर से सार्वजनिक शिक्षा विभाग द्वारा मुझे स्वर्ण पदक प्रदान किया गया। साथ ही, मैंने उसी वर्ष कलकत्ता विश्वविद्यालय से मैट्रिक परीक्षा भी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण की। 1901 ई. में मैं कलकत्ता विश्वविद्यालय की प्रथम वर्ष कला परीक्षा में द्वितीय श्रेणी प्राप्त करके उत्तीर्ण हुआ। इस परीक्षा में अंग्रेजी के अतिरिक्त मेरे विषय तुर्क, ग्रीक और रोमन इतिहास, भौतिकशास्त्र, रसायनशास्त्र, संस्कृत और सामान्य एवं उच्चतर गणित रहे थे। इसके साथ ही मैंने हिन्दी में मौलिक रचना प्रस्तुत करके वैकल्पिक परीक्षा में सफलता प्राप्त की। मेरे एक आचार्य द्वारा मेरे नाम लिखे गये पत्र के उद्धरण से ज्ञात होगा कि मैंने कलकत्ता के सभी परीक्षार्थियों में अंग्रेजी गद्य-लेखन में द्वितीय स्थान प्राप्त किया था।
विद्यार्थी अवस्था में ही स्वर्गीय कर्नल स्विन्टन जैकब और कैप्टन ए.एफ. गैरट आर.ई.एम. ने मुझे जयपुरस्थ ज्योतिष यंत्रालय के यंत्रोद्धार के निमित्त सहायक के रूप में चुन लिया था। कठिन एवं मौलिक कार्य में मैंने जो सहायता की, उसमें मेरी सफलता को प्रमाणित करते हुए राज्य की ओर से मुझे 200 रु. का पारितोषिक प्रदान किया गया। इसके लिए ऊपरिलिखित दोनों महानुभावों ने जो संलग्न प्रमाणपत्र प्रदान किए हैं, वे साक्षीभूत हैं।
अंग्रेजी, मानसिक एवं नैतिक विज्ञान और संस्कृत विषय लेकर मैंने इलाहाबाद विश्वविद्यालय से 1903 ई. में बी.ए. परीक्षा पास की और विश्वविद्यालय के सफल परीक्षार्थियों में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त किया। जयपुर के महाराजा कॉलेज अथवा राजपूताना के किसी भी कॉलेज से कोई भी परीक्षार्थी अब तक ऐसी सफलता प्राप्त नहीं कर सका था। अत: इन शिक्षालयों के इतिहास में यह एक अभूतपूर्व घटना थी। राज्य की ओर से मुझे पुन: स्वर्णपदक और 300 रु. के मूल्य की पुस्तकें प्रदान करके पुरस्कृत किया गया। उस वर्ष का सर्वश्रेष्ठ विद्यार्थी होने के नाते मैंने नॉर्थ ब्रुक स्वर्णपदक भी प्राप्त किया।
मनोविज्ञान एवं कर्तव्यशास्त्र विषय लेकर मैंने एम.ए. उपाधि के लिए परीक्षा के निमित्त आवश्यकता से भी अधिक अध्ययन किया परन्तु स्वास्थ्य की गड़बड़ी ने मुझे परीक्षा में बैठने का अवसर नहीं दिया।
संस्कृत के विश्रुत विद्वान अपने पिताजी से कई वर्षों तक स्वतंत्र रूप से अध्ययन करने का असाधारण सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था। मैं संस्कृत बहुत अच्छी तरह जानता हूँ और उच्चतर एवं मौलिक शोध को लक्ष्य में रखकर मैंने वैदिक, पौराणिक, साहित्यिक एवं वेदान्तक विषयक संस्कृत साहित्य के अंगों का विशिष्ट अध्ययन किया है। मैंने संस्कृत का आरम्भिक अध्ययन प्राचीन पद्धति से किया जो बहुत ठोस होता है। अंग्रेजी शिक्षा ने मुझे वह कसौटी प्रदान कर दी है जिसका कि पाश्चात्य विद्वान प्राचीन भाषा में संशोधन के उद्देश्य के लिए प्रयोग करते हैं।
मैंने इण्डियन एन्टीक्वेरी एवं अन्य संस्कृत और हिन्दी सावधिक पत्र-पत्रिकाओं को बहुत से विद्वतापूर्ण लेखों द्वारा योगदान दिया है। इण्डियन एन्टीक्वेरी में प्रकाशित मेरे लेखों की विशिष्ट प्राच्य विद्याविदों ने प्रशंसा की है। जब महामहिम ब्रिटिश सम्राट भारत आये तो मैंने उनके लिए संस्कृत में स्वागत गान की रचना की। सुप्रसिद्ध डच विद्वान डॉ. कैलेण्ड (उद्वेच निवासी) ने एतन्निमित्त मेरी बहुत प्रशंसा की। मैंने कतिपय आद्यावधि अप्रकाशित संस्कृत ग्रन्थों की समीक्षा एवं व्याख्यात्मक प्रस्तावना और टिप्पणियों सहित सम्पादन कार्य भी हाथ में लिया है। जयपुर राज्य द्वारा संचालित संस्कृतोपाधि की परीक्षाओं में मैं साहित्य, धर्मशास्त्र और व्याकरण विषयों का परीक्षक होता हूँ तथा राजपूताना मिडिल स्कूल और जयपुर मिडिल स्कूल परीक्षाओं में भी मुझे परीक्षक नियुक्त किया जाता है।
सन् 1904 ई. में कर्नल टी.सी. पियर्स, आई.ए. तत्कालीन रेजीडेन्ट जयपुर की सहमति से मुझे खेतड़ी के अल्पव्यस्क राजा का अभिभावक, अध्यापक नियुक्त किया गया। पियर्स साहब का कश्मीर से लिखा हुआ प्रशंसा-पत्र इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि मेरी कार्यप्रणाली के विषय में उनके मन में कैसी धारणा थी। जब जयपुर दरबार ने मेयो कॉलेज अजमेर के मोतमिद् (रियासत के सामन्तों और प्रशिक्षणार्थियों के अभिभावक) पद का स्तर ऊँचा करने का निर्णय किया तो 1907 ई. में इस पद के लिए मुझे चुना गया। यह चुनाव करते समय रियासत की स्टेट कौंसिल के सचिव ने रेजीडेन्ट जयपुर के नाम यह पत्र लिखा था-
संख्या 2254
जयपुर, दिनांक 21 अक्टूबर, 1916
मेयो कॉलेज के मोतमिद् पद पर किसी अधिक योग्य व्यक्ति की नियुक्ति करके उसका स्तर बढ़ाने का प्रश्न कुछ समय से जयपुर दरबार के विचाराधीन है। अब कौंसिल ने राजा जी खेतड़ी के शिक्षक पं. चन्द्रधर गुलेरी बी.ए. को लाला मिट्ठन लाल के स्थान पर मेयो कॉलेज के मोतमिद् पद को ग्रहण करने के लिए चुना है। पं. चन्द्रधर गुलेरी एक बहुत ही योग्य व्यक्ति हैं और उन्होंने अपने कर्तव्यों का सम्यक पालन करते हुए प्रिंसिपल मेयो कॉलेज को सदैव सन्तुष्ट किया है और अब तक इस संस्था का बहुत कुछ अनुभव प्राप्त कर लिया है, अत: कौंसिल को विश्वास है कि इनकी नियुक्त के विषय में प्रिंसिपल मेयो कॉलेज, अजमेर की सहमति प्राप्त हो जायेगी।
मेयो कॉलेज में लगभग 15 वर्ष बहुत लंबे समय तक में विविध श्रेणियों को अवैतनिक रूप से विभिन्न विषय पढ़ाता रहा हूँ। तदन्तर सन् 1916 में मुझे महामहोपाध्याय पंडित शिवनारायण के स्थान पर हैड पंडित मेयो कॉलेज के पद पर नियुक्ति के लिए चुना गया और हिन्दी व संस्कृत का अध्यापन कार्य मुझे सौंपा गया। कक्षा में, छात्रावास में और क्रीड़ा-क्षेत्र में अपने विद्यार्थियों के मानसिक, नैतिक, बौद्धिक और शारीरिक विकास की दिशा में मैंने जिस परिणाम में और जिस स्तर पर कार्य किया है उसके विषय में प्रिंसिपल महोदय ही अपना मत दे सकते हैं कि वह उनके मनोनुकूल है या नहीं।
मैंने प्राचीन एवं आधुनिक गद्य तथा पद्यात्मक हिन्दी सहित्य का विशिष्ट अध्ययन किया है और पाली, प्राकृत तथा अपभ्रंश भाषाओं से इसके विकास के संबंध में भी अनुशीलन किया है। इतिहास और पुरातत्व विषयों में मेरी अभिरुचि है और अपने नाम से, बिना नाम के अथवा अन्य विद्वानों के साथ जो लेख आदि प्रकाशित किए हैं, वे सर्वनिवेदित हैं।
मैं हिन्दी का प्रसिद्ध लेखक हूँ और साहित्यिक जगत में आलोचक और विद्वान के रूप में मेरी ख्याति है। नागरी प्रचारिणी सभा काशी की प्रबंधकारिणी परिषद् का मैं कई वर्षों तक सदस्य रहा हूँ। जयपुर के रेजीडेन्ट कर्नल शावर्स द्वारा लिखित नोट्स ऑन जयपुर’ पुस्तक में मेरा यथेष्ट योगदान है। युद्ध काल में मैंने सम्राट की सेनाओं की विजय के सम्बन्ध में एक संस्कृत प्रार्थना लिखी थी जो प्रति दिन विद्यालयों में दोहराई जाती थी। युद्धकाल में प्रिंसिपल मेयो कॉलेज पब्लिसिटी बोर्ड, अजमेर मेरवाड़ा बार गजट में हिन्दी संस्करण के सम्पादन में अकेले ही उनकी सहायता की थी और साथ ही अंग्रेजी संस्करण में भी लेख लिखता था। अजमेर मेरवाड़ा गजट के हिन्दी संस्करण की शैली और साहित्यिक स्तर का अपेक्षाकृत अधिक समादर था।
चन्द्रधर गुलेरी
जुलाई 8, 1917 


(दैनिक जागरण और दिव्य हिमाचल में क्रमश: 7 व 8 जुलाई, 2013 को प्रकाशित)

Monday, May 13, 2013

कौन सी कविताएं

(प्रिय कविताओं में से एक नरेश सक्सेना की यह कविता, साथ में एडवर्ड मुंच
का चित्र 'मेलनकली'.)
जैसे चिड़ियों की उड़ान में
शामिल होते हैं पेड़
क्या कविताएं होंगी मुसीबत में हमारे साथ?

जैसे युद्ध में काम आए
सैनिक की वर्दी और शस्त्रों के साथ
ख़ून में डूबी मिलती है उसके बच्चे की तस्वीर
क्या कोई पंक्ति डूबेगी ख़ून में?

जैसे चिड़ियों की उड़ान में
शामिल होते हैं पेड़
मुसीबत के वक़्त कौन सी कविताएं होंगी हमारे साथ
लड़ाई के लिए उठे हाथों में
कौन से शब्द होंगे?
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