Monday, May 16, 2011

उठो जलपरी


उठो जलपरी
डर है
बन न जाओ
तुम प्रस्तर
एक दिन


उठो जलपरी
डर है
हो न जाओ
तुम भग्न
एक दिन


उठो जलपरी
डर है
मिल न जाओ
तुम रेत में
एक दिन


उठो जलपरी
चलो
हो जाएं हम
सदा के लिए

जलमग्न
!
-माधवी 

(तस्वीर तिरुवनंतपुरम से श्याम सुंदर जी के सौजन्य से)

Sunday, May 8, 2011

मातृ दिवस पर

मैं नहीं जानता
क्योंकि नहीं देखा है कभी 
पर जो भी
जहां भी लीपता होता है
गोबर के घर-आंगन

जो भी
जहां भी प्रतिदिन दुआरे बनाता होता है
आटे-कुमकुम से अल्पना

जो भी
जहां भी लोहे की कड़ाही में छौंकता होता है
मेथी की भाजी

जो भी
जहां भी चिंता भरी आंखें लिये निहारता होता है
दूर तक का पथ 
वही
हां, वही है मां।
-श्रीनरेश मेहता

Friday, May 6, 2011

स्तवक

जल्द इकट्ठे करो
वो तमाम गीत
जो याद हैं तुम्हें

उछालो उन्हें
सूरज की तरफ
 

इससे पहले कि
पिघल जाएं वो
बर्फ़ की तरह।

-Translation of one of the poems by American poet/novelist 

Langston Hughes

Wednesday, May 4, 2011

फाल्गुनी

 
जिन दिनों मैं कविता नहीं लिखता
उन दिनों
वह-
वनों में जाकर
वृक्षों के फूल
और वनस्पतियों की सुगंध बनी
फाल्गुनी हो जाती है
और मुझे भी
अरण्य की यह उत्सवता चैत्र बना देती है।

और फिर एक दिन
जब द्वार पर दस्तक देता
वन-
इस फाल्गुनी के साथ
उपस्थित हो कहने लगता है-

"लो सम्हालो अपनी यह कविता
मैं भी तो कुछ दिन तुम्हारी तरह
निश्चिंत रहना चाहता हूं।"

और वह मुझे अपनी आरण्यकता सौंप
बदले में मेरा पतझर लेकर
सामने की पगडंडियां उतरने लगता है।

मैं इस आरण्यकता से इतना ही कह पाता हूं-
"स्वागत है फाल्गुनी!"

"नहीं फाल्गुनी मैं वन में थी
यहां नहीं
यहां तो मैं तुम्हारी कविता हूं।"

और वह अपने पर से वन उतार
शब्द पहनने लगती है।

-श्रीनरेश मेहता 

(चित्र: श्रीनरेश मेहता)
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