Saturday, September 11, 2010

दो यात्राएं

(हाल में कूर्ग से लौटी हूं। कर्नाटक के वेस्टर्न घाट्स 
में प्यारा-सा हिल-स्टेशन, जो अलग-थलग संस्कृति 
और ख़ूबसूरती लिए है। यात्रा-वृत्तांत लिख रही हूं, 
जल्द पोस्ट करूंगी। लेकिन कूर्ग का हैंगओवर है कि 
उतरता ही नहीं, इधर विष्णु जी की यह कविता पढ़ 
मन और हरा हो गया है।)

मैं एक यात्रा में
एक और यात्रा करता हूं
एक जगह से 
एक और जगह पहुंच जाता हूं

कुछ और लोगों से मिलकर 
कुछ और लोगों से मिलने चला जाता हूं
कुछ और पहाड़ों कुछ और नदियों को देख
कुछ और पहाड़ों कुछ और नदियों पर 
मुग्ध हो जाता हूं

इस यात्रा में मेरा कुछ ख़र्च नहीं होता
जबकि वहां मेरा कोई मेज़बान भी नहीं होता
इस यात्रा में मेरा कोई सामान नहीं खोता
पसीना बिल्कुल नहीं आता
न भूख लगती है, न प्यास
कितनी ही दूर चला जाऊं
थकने का नाम नहीं लेता

मैं दो यात्राओं से लौटता हूं
और सिर्फ़ एक का टिकट 
फाड़कर फेंकता हूं।

-विष्णु नागर के संग्रह 'घर के बाहर घर' से

Saturday, August 7, 2010

कोई-कोई दिन

कोई-कोई दिन कितना
अलसाया हुआ होता है
सुस्त, निठल्ला
नाकाम-सा

लेकिन मैं
कुछ न करते हुए भी
काम कर रही होती हूं 

जैसे 
बिस्तर पर लेटे
करवटें बदलना
कई सौ बार

यादों की पैरहन उधेड़ 
सिल लेना उसमें 
ख़ुद को 

अरसा पुराने ख़्वाबों को
नए डिज़ाइन में
बुनने की कोशिश करना 

फैंटेसी फ्लाइट में
बिना सीट बैल्ट के
बैठना
हिचकोले खाना जमकर
टाइम-अप के डर से
फिर
नीचे उतर आना

ज़हन में कुलबुलाते
उच्छृंखल विचारों पर 
नकेल डालना ताकि 
सब-कुछ बना रहे 
ऐसा ही
ख़ूबसूरत

बहुत सारे काम बाकी हैं 
और आंखें उनींदी हो चली हैं 
शाम का धुंधलका भी 
छा गया है बाहर। 
-माधवी

Wednesday, August 4, 2010

एक जीवन एकरस

एक लय
एक ताल 

एक झरोखा
एक चांद 

एक ख़ामोशी
एक चुभन 

एक हंसी
एक रुदन 

एक जीवन
एकरस जीवन।
-माधवी

Sunday, August 1, 2010

मुझे नहीं परवाह

कुछ जली, कुछ बुझी 
कुछ जड़, कुछ चेतन
थमी-सी कुछ, कुछ रौ में हूं मैं

एक-भाव की क़वायद में
ख़ुद के हूं ख़िलाफ़ मैं

मुखर, कभी मौन हूं
सोच के झंझावात में 
विचारशून्य
अजनबी, मैं परस्त कौन हूं

ग़मग़ीन किसी बात पर
ख़ुश-ख़याली में हर बात पर

सर्द कभी, कभी गरम
तल्ख़ कभी, कभी नरम 

भाव मन के सारे 
मौसमों के मानिंद 
क्यों हैं आजकल।
-माधवी
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